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परिचय
जयपुर राज्य के शेखावादी प्रांत मे खेतड़ी राज्य है। वहाँ के राजा श्रीअजीतसि'इजी बद्दादुर बड़े यशस््री और विद्याप्रेमी हुए। गणित शास्त्र में उनकी अद्भुत गति थी। विज्ञान उन्हे बहुत प्रिय था। राजनीति में बह दक्ष और गुणग्राहिता में अद्वितीय थे। दर्शन और अध्यात्म की रुचि उन्हे इतनी थी कि विलायत जाने के पहले और पीछे स्वामी विषेकानंद उनके यहाँ महीनों रहे । खामीजी से घंटो शास्र-चर्चा हुआ करती । राजपूताने में प्रसिद्ध है कि जयपुर के पुण्यश्लेक महा- राज श्रीरामसिंदजी को छोड़कर ऐसी सर्वेतोम्ुख प्रतिसा राजा श्रीक्जीत- सिंहजी दी में दिखाई दी ।
राजा श्रीश्रजीतसिंदजी की रानी आडआ ८ सारवाड़ ) चाँपावतजी के गर्भ से तीन संतति हुई'--दो कन्या, एक पुत्र । ज्येष्ठ कन्या श्रीमती सूयकुमारी थीं जिनका विवाह शाहपुरा के राजाधिराज सर श्रीनाहर- सिंहजी के ज्ये४्ठ चिरंजीव और युवराज राजकुमार भ्रीउमेद्सिहजी से हुआ | छोटी कन्या श्रीमती चदिकु चर का विवाह प्रतापगढ़ के महा- रावल साहब के युवराज मद्ाराजकुमार श्रीमानसिंहजी से हुआ । तीसरी संतान जयसिंहजी थे जो राजा श्रीक्रजीतसि ह जी और रानी चौपावतजी के खगवास के पीछे खेतड़ी के राजा हुए ।
इन तीनों के शुभचिंतकों के लिये तीने की स्सघृति, संचित कर्मो' के परिणाम से, दुःखमय हुईं। जयसिंहजी का स्थर्गवास सत्रह वर्ष की अवस्था मे हुआ। सारी प्रजा, सब शुभचिंतक, संबंधी, मित्र और गुरुजनां का हृदय आज भी उस आँच से जल दी रहा है। अभ्वत्यासा के तन्रण की तरह यद घाव कभी भरने का नहीं | ऐसे आशामय जीवन का ऐसा निराशात्मक परिणाम कदाचित् ही हुआ दे।। श्रीसूयकृमारीजी को एक सात्र भाई के वियेग की ऐसी ठेस छगी कि दो ही तीन वर्ष में इनका शरीरांत हुआ।। श्री्चांदकु वर बाईजी को वैधब्य की विषम यातना सोगनी पड़ी और ज्ञातृवियोग और पति-वियोग दोनें का
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असद्व दुःख वे सेल रही है। उनके एकमात्र चिरंजीव प्रतापगढ़ के कु बर श्रीरामसि हजी से मातामह राजा श्री्रजीतसिंदजी का कुछ भ्रजावान् है।
श्रीमती सूच्यकुमारीजी के काईं सैतति जीवित न रद्दी । उनके बहुत आग्रह करने पर भी राजकुमार श्रीयमेद्सि हज्ी ने उनके जीवन-काह में दूसरा विवाह नहीं किया | किंतु उनके वियोग के पीछे,उनके आज्ञालुसार, कृष्णगढ़ में विवाह किया जिससे उनके चिरंजीव <शांकुर विद्यमान है।
श्रीमती सूय्यकुमारीजी बहुत शिक्षिता थीं। उनका भ्रध्ययन बहुत विस्तृत था । उनका हि दी का पुस्तकालय परिपूर्ण था । हि'दी इतनी अ्रच्दी लिखती थीं और अचर इतने सुंद्र होते थे कि देखनेवाले चम- रक्ृत रह जाते | स्वगंवास के कुछ समय के पू्वे श्रीमत्ती ने कद्दा था कि स्वामी विषेकानंदजी के सब भंथों, ध्याख्यानों और छ्लेखों का प्रामाणिक हि दी अनुवाद मैं छुपवाऊँगी । बाल्यकाज् से ही स्वामीजी के लेखों और अध्यात्म विशेषतः अद्दौत वेदांत की ओर श्रीमती की रुचि थी। श्रीमती के निदेशाजुसार इसका कार्यक्रम बाधा गया। साथ ही श्रीमती ने यह इच्छा प्रकट की कि इस संबंध मे हि दी में उत्तमोत्तम अंथों के प्रकाशन के लिये एक अक्षय निधि की व्यवस्था का भी सूत्रपात हो जाय । इसका व्यवस्थापन्न घनते बनते श्रीमती का स्वर्गंवास हे गया।
राजकुमार उमेद्सि इजी ने श्रीमती कीं अंतिम कामना के श्रजुसार बीस हजार रुपए देकर काशी-नागरीप्रचारिणी सभा के द्वारा इस अंथमाकछा के प्रकाशन की व्यवस्था की है। स्वामी विवेकानंदनी के थावत् निर्बंधों के अतिरिक्त और भी उत्तमोत्तम अ'थ इस अधमाक्ा में छापे जायेंगे और अक्प मूल्य पर सर्वताधारण के लिये सुल्भ होंगे। अंथमाछा की बिक्री की आय इसी में क्षयाई जायगी। ये श्रीमती सूय्यक्ष॒मारी तथा श्रीमान् उमेदसि'हजी के पुण्य तथा थश की निरंतर वृद्धि होगी और हि'दी भाषा का अभ्युद्य तथा उसके पाठकों को ज्ञान-लास होगा ।
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निवेदन पुश्लीभूतिः सुबहुजनिभिः श्रेय्ां संचितानाम् साक्षादभाग्यं नतु निवसतां नन्दपल्लीषु पुंसाम्। पात्र प्रेम्णां त्रजनववधूमानसादुद्गतानाम् आज़ायानां किमपि हृदय स्मयंतां मज्जुमूति ॥
उद्देश्य और परिस्थिति
जिस समय मैं श्रोनाथद्वार की संस्कृत पाठशाला मे श्रध्या- पक था, उस समय मेरे एक मित्र वैद्य श्रोकृष्ण शर्मा हिंदी साहित्य सम्मेलन की मध्यमा परीक्षा दे रहे थे। थे कभी कभी मेरे पास भी रसें और अ्रत्लंकारों का विषय समभने के लिये आ जाया करते थे । मुझे उस समय झनुभव हुआ कि हिंदी भाषा में रसें क्लौर भावों के विषय को प्राचीन शैल्ली से यथार्थ रूप मे समम्का देनेवाला कोई भी अँथ नही है। उन्होंने मुझसे आग्रह भी किया था कि आप इस विषय मे कुछ लिखिए; पर अवसराभाव से उस समय कुछ भी न हो सका। अस्तु।
उस बात को आज कोई चार-पॉच वर्ष हो गए। विक्रम संवत् १८८२ के माघ मास में मैंने किसी विशेष कारण-वश श्रोनाथट्वार छेड़ दिया। उसके कुछ ही दिनों बाद--.चैन्र में--- बंबई निवासी गोस्रामिकुलकास्तुम श्रोगोकुलनाथजी महाराज
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ने मुझे जूनागढ़ भ्रौर चापासनी( जोधपुर, मारवाढ़ ) के झ्राचार्या- सनें पर विराजमान चि० गोखासी अश्रीपुरुषोत्तमज्ञाल्जी तथा चि० गोखामी श्रोत्रजभूषणल्ालजी के अ्रध्यापन के लिये नियुक्त किया । इसी अवसर मे मुझ्ते काशी फी साहित्याचार्य परीक्षा के लिये रसगंगाधर के प्रध्ययन्त और सनन की आव- श्यकता हुई। रसगंगाघर से परिचित सभी संस्क्रताभिज्ञ इस वात फो सानते हैं कि रसें पश्लौर सावों का जैसा विशद विवेचन रसगंगाधर मे है, वैसा और कही नहों है। अतः इस समय मेरे हृदय मे अपने पूर्वोक्त मित्र के आग्रह की स्घति जागरित हुई पैर विचार हुआ कि क्या ही प्रच्छा हो, यदि यह अंथ हिंदी-भाषा-साषियों के भी उपयोग मे झा सके । इस विचार के कुछ दिन पूपे, मेरे मित्र और भूपाल्ष-नोबल्स- स्कूल, उदयपुर (मेवाड़ ) के भ्रध्यापक साहित्यशाश्षों श्रीगिरि- धर शर्मा व्यास ने मुझसे इस अलन्नुवाद के लिये कद्दा सी था। कदाचित् उनका यह विश्वास था कि मेरा अनुवाद संस्कृत
रसगगाधर के अध्येता छात्रो के लिये भी उपयोगी द्वोगा | चापासनो एक छोटा सा गॉव है, इतना छोटा कि वहाँ सव मिल्ञाकर सी मनुष्यों की भी बस्तो नहीं है। यद्यपि अध्ययन, भ्रध्यापन क्रौर सेजन-निर्माणादि के कारण ( क्योंकि मैं यहाँ सकुद्ुंध नही रहता था) बहुत ही कम समय बच पाता था; तथापि यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो मुझसे इस समय को भी छीन लेता । हॉ, यदि मैं उसका दुरुपयोग ही
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करना चाहता ते! बात दूसरी थी । सो मैंने इस अनुवाद का काये आरम्भ कर ही डाला ।
पर पूर्वोक्त आचायेकुमार यहाँ स्थिर रूप से नहों रह पाते | उन्हें भारतवर्ष के अधिकांश भाग मे फिरते रहना होता है । और मैं ते रदह्दा उनके साथ; इस कारण तथा अन्यान्य कारणों से भी मुझे खूब ही भ्रमण करना पड़ता है। से इस ( प्रथ- सानन ) के अनुवाद के लिखते समय मैंने करॉची, हैदराबाद ( सिध ), जोधपुर ( कई बार ) जयपुर ( कई बार ), भददमदा- वाद, बड़ौदा, इंडर, बीकानेर, नागार, जूनागढ़ ( कई बार ), काशी, मथुरा और श्रोनाथद्वार भरादि अनेक प्रसिद्ध नगरों के अतिरिक्त काठियावाड़ के शताबधि गावेंड्रों मे--प्राय: राज पहुँचे और कल् चले, इस हिसाव से--भ्रमण किया है, श्रौर श्राज भी यही क्रम वत्तमान है |
गाबंड़ो में प्राय: किसानों के घरों मे रहना द्वोता है। उन गोमयरंधी अ्ंधतमसाबृत तथा खटमलों और पिस्सुओां के नियत निवासे| मे जिन कष्टों का अ्रतुभव द्वोता है, उन्हें अनुभविता के अतिरिक्त कान समझ सकेगा ? हाँ, कभी-कभी भ्रच्छे घर भी प्राप्त हो जाते हैं; पर भाग्य से ही। फिर वहाँ पहुँचते ही घर जमाना, भेजन बनाना, पूर्वोक्त कुमारों फो पढ़ाना और आवश्यकता हो ते व्याख्यानादि भी देना पड़ता है। इसके उपरांत यदि सद्भाग्य से कुछ समय प्राप्त हो गया और शरीर तथा मन स्वस्थ रहा ते! इस अनुवाद के लिखने का अवसर
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आता है। पर, ऐसी परिस्थिति मे एकाग्रता और स्वास्थ्य कट्दों तक रह सकते हैं, इसका पता भुक्तमोगी को ही हो सकता है |
मुझे इस बात का बोध है कि में यह सब लिखकर आपका आर अपना देनो का समय नष्ट कर रहा हूँ; तथापि यह समझ्क- कर कि मेरी परिस्थिति का भ्रभुभव हो जाने के फारण, भाप, इस अनुवाद मे कदाचित् कोई तन्रुटि रह गई हो ते क्षमा कर सकेगे, ये बातें लिख दी गई' हैं। मैं भ्राशा करता हूँ कि आप मुझे इस समय घातित्व के दोष से मुक्त कर देगे ।
अनुवाद
मैं अनुवाद उसे मानता हूँ, जिसे, जिस भाषा मे वह लिखा गया है, उस भाषा-मात्र को जाननेवाला मनुष्य समझ सके उसे मूलमंथ की भाषा के अध्ययन की आवश्यकता दी नपड़े। पर, झ्राजकल हिदी-भाषा में संस्कृत-भाषा ऐसी मिल्ल गई है कि बिना उसके हिंदी का कुछ काम ही नहीं चत्न सकता, इसे उससे सर्वथा प्रथक कर देना प्रसंभव ही है। जब समाचारपन्नो को भाषा भी संस्क्रतप्रचुर देती जा रही है, तब पुस्तकों की भाषा के विषय में ते! कहना हो क्या है | फिर यह ते एक ऐसे अंथ का अनुवाद है जिसके विषय और भाषा इतने गंभीर हैं कि उनकी टक्कर से, ऐसे वैसे संस्कृतन्नों का ते सिर चकराने छगता है। ऐसी स्थिति में
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हमारे जैल्ा अत्पक्ष और व्यग्नचिच प्राणी इस काये मे ऋृत- कृत्य देने की आशा करे, यह यद्यपि दुस्साहस-मात्र हों है तथापि यह समककर कि संस्कृत-भाषा के महा विद्वाद ते इस काम को हाथ मे लेंगे नहो; क्योंकि वे वहुधा हिंदी में लेख लिखने मे अ्रपना प्रपमान मानते हैं, हमने अपनी अयो- ग्यता समभते हुए भी यह कुचेश कर हो डाली । हाँ, इसमे कोई संदेह नहीं कि हमने अपने पूर्वोक्त सिद्धांत के अनुसार, जहाँ तक दे सका, अनुवाद के सरक् और घापवद्ाविरे वनाने के प्रयक्न मे किसी प्रकार की कमी नहीं की; श्र नव्य न्याय की शैली से लिखे हुए इस प्रंथ के अनुवाद में भी, बिना किसी विशेष कारण के, कही अवच्छेदक तथा अवच्छिन्न शब्द नहीं झ्राने दिया और उन स्थलों का तातपये लिखने का प्रयत्न किया है। अब हम सफल्ञ हुए अथवा असफल, इस बात का निणेय विद्वान लोग करेगे। वे क्ृपाकर इस बात को भी ध्यान से रखेंगे कि शास््लीय विषय सरल से सरंत् करने पर भी कहानी नहीं बन सकता |
पद्मानुवाद हमने एक और कुचेष्टा की है। वह है उदाहरण-पद्यों का पद्यालुवाद । इसका कारण केवल यह है कि पद्य मे जे। एक प्रकार की बन्धकृत विशेषता होती है, वह केवल्न गद्यानुवाद में नहीं आ सकती; श्र हमारी इच्छा थी कि हिंदी के
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ज्ञाता मात्र भी उसका अनुभव कर सकें। अतएवं हमने अनुवाद में इस बात का ध्यान रखा है कि मूल्न मे जहाँ नागरिका, उप- नागरिका अथवा प्राम्य वृत्ति है वहा अनुवाद मे भी वही वृत्ति रहे, यहाँ तक कि जहाँ एक पद्म मे तीन-वीन वृत्तियों बदली हैं, वद्दों भी उनके निर्वाह का यथाशक्ति प्रयक्न किया जाय। इतने पर भी मतभेद हे! खकता है, और ऐसा होना अनिवार्य भी है।
विषय-विवेचन
हमने एक अनधिकार चेष्टा और की है। वह है भूमिका का 'विषय-विवेचन! भाग। इसमें हमने जिन विषयों का विवेचन किया है, वे अत्यन्त गंभीर और अत्यधिक सामग्री तथा अध्ययन की भ्रपेक्षा रखते हैं; शोर हमे विश्वास है कि इस विपय मे इमारे जैसे अल्पक्ष और अल्पबुद्धि प्राणी से अनेक भूले' हुई हैगी। झौर कई बातें की कमी तो दमारे जानते मे भी रह गई है, जिसे हम, पूरा नही कर सके | सद्भाग्य से यदि हमारे सामने इसके द्वितीय संस्करण का सुयोग आदबेगा म,्रौर उस समय हमारी परिर्थिति अच्छो होगी, ते हम उसे पूर्ण करने का प्रयत्न करेगे । इतने पर सी यह समझकर कि हमारे इस विषय फो छोड़ देने पर, संभव है, कोई भावी विद्वान इसे सवोगपूर्ण बना सके और इस समय भी जैसा कुछ संभव है वह इन विपयो के अ्रध्येताओ के उपयोगी हो, इससे जो कुछ
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बन पढ़ा लिख ही दिया है। इसके लिखने में भी हमे श्रपनी परिस्थिति के फारण भअत्यंत कष्ट उठाना पड़ा है। हम आशा करते हैं कि हमारे गुणप्राहक विद्वान हमारी अल्पज्ञता और परिस्थिति को समझकर तथा भगवान् श्रीकृष्णचंद्र की इस उत्ति को स्मरण करके कि “सर्वारंभा हि देषेण धूमेनाभिरिवाइता:?? देषों पर दृष्टि न देंगे और हमे क्षमा करेगे । “विषय विवेचन! प्रकरण मे जो आचायों के काल्न लिखे गए हैं, वे प्रायः म०म० श्रोदुर्गाप्रसादजी द्विवेदी क्री साहित्यदर्पण की भूमिका से और श्रोसुशीजकुमार दे, एम० ए० के 'संस्क्रव पोयूटिक्स” से लिए गए हैं, एतदथथ उन्हे धन्यवाद है।
अड़चने
अनुवाद करने मे हमे अनेक झ्रड़चनें भी उपस्थित हुई । खबसे बड़ी अ्रडचन ते। यह थी कि इस अंथ पर कोई विवेचना- पूर्ण प्लौर विशद् व्याख्या नहों है, केवल नागेश भट्ट की गुरुममें- प्रकाश नामक टिप्पणो है, जिसमे उसके नामानुसार मोटे मोटे मम्में। पर प्रकाश डाक्षा गया है, अतः अधिकांश स्थल्ञों की विवेचना का भार इस अ्रत्पज्ञ की तुच्छ बुद्धि पर द्वी आ पढ़ा । दूसरी भ्रद्चन यह थी कि यह अंथ अब तक हे खाने से प्रकाशित हुआ है। एक काशी से और दूसरा “कान्यमात्ाः में बंबई से। पर,न जाने क्यों दोनों ही संस्करण स्थान स्थान पर अशुद्ध हैं। काशीवाल्ञां संस्करण ते। मुद्रणेपयोगी
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लेख-चिह्ो से भी शून्य है, उसमें ते! विशेषत: पाराआफ तोड़ने का भी परिश्रम नहीं किया गया। यशथेष्ट व्याख्या से रहित अशुद्ध भार जटिल प्रंथ का शुद्ध करके उसका यथोचित अजु- वाद करने में कितनी कठिनता होती है, उसे वही समझ सकता है, जिसे यह काम पड़ा हो । से यह भार भी इस तुच्छ बुद्धि पर ही आ पड़ा। पर इसमे कोई संदेह नही कि देनों पुस्तकों के संवाद से हमे संशोधनकारय मे बहुत कुछ सहायता मिक्नी है। तीसरी अड़चन यह थी कि उपयुक्त अमण के कारण हमे प्रपेक्षित पुस्तकादि भो नहीं प्राप्त हो सफती थीं; श्रौर सुतरां काठियावाड़ मे; क्योंकि यहाँ संस्कृत भाषा का बिलकुल प्रचार नहों है। इसके श्रतिरिक्त हमारे स्वास्थ्य ने भो समय समय पर अंतराय उपस्थित कर दिंया। पर, इन सब अड़चनों के होते हुए भी जहाँ तक हो सका, हमने गड़बड़-घेटाज्ञा चक़्ाने की कोशिश नहीं की ; इस प्रकार प्रथभानन का यह अनुवाद आप की सेवा में उपस्थित है। इसमें संद्दे्द नहीं कि यदि हमारी परिस्थिति और स्वास्थ्य अच्छे होते तो यह अलुवाद इससे कही अच्छे रूप मे सिद्ध होता। अरतु, इेशवरेच्छा । हे
अनुग्राहक
अब अत मे हम अपनी अनुग्राहक मंडी का स्मरण कर- के इस कथा को समाप्त करते हैं--
[ 5 ] इस विषय में हम सबसे पद्दले अपने परमपृजनीय पितृ- चरण पंडित श्रीमघुरालालजी चतुवंदी का, जे इस समय झनंत सुख का अलुमव कर रहे हैं, स्मरण करेगे; क्योंकि यह जे कुछ आपके सामने है, वह उन्हीं के अक्नत्रिम प्रेम, संस्क्रत- शिक्षण, श्रम और हार्दिक आशीर्वाद का फल है ।
तदनंतर श्रोमद्वल्तभाचाये के प्रधान पीठ पर विराजमान गोस्वामितिलक श्रीगोवर््धनलालजी सहाराज और उनके विद्या- प्रेमी कुमार श्रीदामोदरलालजी महोदय के निःस्वा्थ भ्रनुमह और, मेरे विद्यागुरु शीत्र कवि श्रोनन्दकिशोर शाख्त्रीजी के उप- कार का स्मरण आवश्यक है; क्योंकि इस अकिंचन का, किशोरावस्था के अनंतर, शिक्षण प्रौर रक्षण उन्हीं की सहा- यता से हुआ है।
इसकी बाद हमारे परममानलीय महामददोपाध्याय पं० श्रोगिरिधरशर्मा चतुर्वेदीजी का स्मरण अपेक्षित है; क्योंकि रसगंगाघर की अनेक अंथ-प्रंथियों के शिथिलीकरण मे उनका बहुत कुछ हाथ है।
झब यदि इस अवसर पर हम अपने परम सुहृदु काशी- निवासी साहित्यभूषण श्रोसॉवलजी नागर का स्मरण न करे, ते कदाचित् हमारा सा क्ृतन्न कोई न द्वोगा, क्योंकि इस पुस्तक का लेखन और प्रकाशन उनके उत्साहदान और निष्काम साहाद से बहुत कुछ संबंध रखता है।
[ १० |] अत में श्रोगोवद्धंनंधरण से प्राधेना करते हैं कि वे इस अनुवाढ को साहित्यानुरागियों का प्रेमपात्र भर चिरायु करें | इति शम् ।
वैशाख ऋष्ण ८ शुक्रवार से० १८८४ जयपुर
| पुरुषोत्तम शर्स्मा चतुर्वेदी
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पंडितराज का परिचय
जाति, वंश, अभ्युदय और शिष्य आदि
पंडिवराज जगन्नाथ पैज्ंग* जाति के ब्राक्षण थे। उनका जातीय उपनाम वेगिनाडु अथवा वेस्लनाडु था, जिसे वेस्लना- टीय* भी कहा जाता है और जे श्रोमद्वल्तभाचाय के सजा- तीय उत्तरभारतीय तैलंगो का, भ्रव तक, उपनाम है। इनका एक 'उपनाम' त्रिशूली,३ भी था, जे। कि जयपुर की जनता में भ्रब तक भी प्रसिद्ध है। उनके पिता का नाम पेरुभट्ट* अथवा पेरम* भट्ट था श्रौर माता का नाम क्वच्मी?” । पेरुभट्ट महाविद्वान् थे । उन्होने ज्ञानेद्र" मिक्षु नामक विद्वान यति से वेदांत शास््र, महदेद्र पंडित से न्याय और वैशेषिक शाल्र, खड-
१--...तैलंग कुल्लावतंसेन पंडितजगन्नाथेव...? ( 'आसफविलढास' का आरंभ ) |
२--कुछपति मिश्र ने ( आगे उद्धुत ) अपने पद्य में 'बेल्ञनाटीय” शब्द ही लिखा है ।
३--मिश्र जी ने भी यह उपनाम लिखा है, अतः यह संदेह अनुचित है कि त्रिशूली जगन्नाथ कोई अन्य था ।
४--रसगंगाघर में !
ई--प्रायाभरण में !
६--रसगंगाधर से ।
७--रसगंगाघर के आरंस का द्वितीय पद्म ।
| [ १२ |
देव पंडित से पूर्वमीमांसा शाक्ष और शेष? वीरेश्वर पंडित से व्याकरण महाभ्राष्य पढ़ा था। इसके अतिरिक्त वे वेदादिक अन्य शास्रों के भी ज्ञाता थे, जेसा कि रसगंगाधर के 'सर्च विद्याधर! पद से सूचित होता है। पंडितराज ने प्राय: इन्ही से भ्रध्ययत किया था; पर इनके गुरु शेष वीरेश्वर से भी झुछ पढ़ा हो ऐसा प्रतीत होता है, यह बात भनेरमाकुचमर्दन! नामक म्रंथ के 'भस्मद्गुरुपंडितवीरेश्वराणाम! इस पद से सूचित होती है। थे खं भी बेद, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, व्याकरण और साहित्य आदि शास्नों के मद्दाविद्वान थे, ऐसा रसगंगाघर मे स्थान स्थान पर उद्धृत प्रमाणों, लेखें प्रौर प्रतिपादन-शै्ञी से सिद्ध है और इस विषय में किसी प्रकार के प्रमाण की आवश्यकता नही रहती |
जब्र ये नवयुवक ही थे, उसी समय, इनका, तत्कालीन बाद- शाह शाहजहो के दरबार मे प्रवेश हे गया था, श्रौर बादशाह ने इनकी बिद्वत्ता से संतुष्ट होकर इन्हें 'पंडितराज! रे की पदवी प्रदान की थी । इसकी युवावस्था का अधिकांश शाहजहाँ*१
१--थयह' उनका उपनाम था ।
२-- एतेन तदितिरशास्रवेदाविज्ञातृष्व॑ सूचितम्र' (गुरुमर्मप्रकाशः) |
३---...सार्वमैमशीशाइजह प्रसादाद्धिगत्पंडितराजपद्वीकैन, .. *? ( 'आसफविलास? का आरंभ )।
४-- दिकलीवल्लभपाणिपक्लवतले नीत॑ नवीने वय.! ( भामिनी- विलास )।
[ १३ | तथा उसके पुत्र दाराशिकाह* की छत्नच्छाया मे ही व्यतीत हुआ धा । शाही जमाने के संस्कृव-पंडितों मे हम इन्हें परम भाग्यशाज्ञी मानते हैं, क्योंकि 'तस्तताऊसः और ताजमहल” आदि परम-रम्य वस्तुओं के वनवानेवाल्े और बड़ी भारी शान-शाकत से रहनेवाले सार्वमैौम शाहजहाँ के उस शक्रोपम वैभव के भोग मे इनका भी एक भाग था | 'संग्राम-सार”र और “रस-रहस्य”रे आदि ग्रंथों के
निर्माता, जयपुर-नरेश श्रीरामसिंहजी प्रथम के आश्रित, ब्रजभाषा के सुप्रसिद्ध कवि माथुर चतुर्वेदी श्रोकुल्षपति मिश्र, जे आगरे के रहनेवाले थे, इनके शिष्य थे और इन पर उनकी प्रत्यंत श्रद्धा भक्ति थी। इसके प्रभमाण मे हम सिंग्राम-सार! से दे पद्च उद्धृत करते हैं। बे ये हैं--
शब्द-जोग में शेष, न्याय गोतम कनाद मुनि ।
सांख्य कपिल, अरु व्यास ब्रह्मपथ, कर्मनु जैमिनि ॥
वेद झेग-जुत पढ़े, शील-तप ऋषि वसिष्ठ सम ।
अलंकार-रस-रूप अष्टभापा-कविता-क्षम ॥
१--जगढ़ाभरण” नामक ग्रंथ मे दाराशिकाह का ही वर्णन है ।
२---समआाम-सार'! वि० सं० १७३३ मे घना था, यह म० म० ओगिरिधरशर्मा चतुर्वेदीजी के पिता कविवर श्री गोकुलचंद्रजी का कथन है ।
३---.'रस-रहस्थ” का समय ते कवि ने ख्यं ही लिखा है---'सबत् सन्नह सौं वरष ( अरु ) बींते सत्ताईस । कातिक बदी एकादशी बार बरनि वानीश ।? ( रसरहस्य, अष्टम-व्ृत्तांत, पद्य २११ )
[ १४ |] तैलंग वेलननाटीय द्विज जगन्नाथ तिरशूलघर । शाहिजहा दिल्लीश किय पंडितराज प्रसिद्ध घर ॥ ,.. उनके पण को ध्याच घरि इृष्टदेव सम जानि | उक्ति-जुक्ति बहु भेद भरि अंथहि कह्ौं बखानि ॥ “--संग्रामसार, प्रथम परिच्छेदू, पद्य ४-६ इसके अतिरिक्त 'रस-रहस्य” मे जे उन्होंने काव्यलक्षण दिखा है, वह भी इन्हीं की शैली का है। काव्यप्रकाश तथा साहित्यदपंण के काव्यल्क्षण प्रथक् लिखे गए हैं तथा साहित्यदर्पण के काव्यक्कक्षण का ते खंडन भी किया गया है। रसरहस्य का का्यत्नक्षण थों है--- ४
जग ते अद्भुत सुख-सदुन शब्द रु अर्थ फवित्त | यह लक्षण मैदे किये समुझ्ि अंथ बहु चित्त ॥
पर मिश्रजी के इस पद्य से एवस् उनके रचित समप्र रस- रहस्य से भी यह सिद्ध द्वोता है कि जिस समय पंडितराज प्रौर मिश्रजी का समागम रहा, उस समय या ते पंडितराज रसगंगाधर लिख नहीं पाए थे, या इनका समागम ही स्वल्प रहा था; क्योंकि उस पुस्तक से फेवल इस लक्षण फे अति- रिक्त जितनी बाते लिखी गई हैं, वे सब 'काव्यप्रकाश” से ली. गई हैं प्रौर इस लक्षण में भी शब्द और अथे दे।नें के काव्य साना यया है, जे कि 'रसगंगाधरः के लक्षण के विरुद्ध है।
पंडितराज के एक दूसरे शिष्य का भी पता लगता है। वे पंडितराज के सजातीय थे और उत्तका नाम नारायण भट्ट था।
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उनके विषय मे उनके भतीजे हरिहर भट्ट ने, जो महाविद्वान् थे, स्वनिर्मित 'कुलप्रबंध! नामक काव्य मे यों लिखा है कि--
लव्ध्या चिद्या निखिलाः पंडितराजाजगन्नाथात्
नारायणस्तु॒ दैवादल्पायुः खपुरीसगमत् ॥ अर्थात् पंडितराज जगन्नाथ से खब विद्याएँ प्राप्त करके नारा- यण भट्ट ता, भाग्यवशात्, थोड़ी ही अवस्था मे खर्ग फो सिधार गए* |
इस सबसे यह्द पता ल्गवा है कि पंडितराज के, संस्कृत
प्रौर हिंदी देवों भाषाओं के ज्ञाता, प्रनेक् अच्छे अच्छे विद्वाव शिष्य थे |
किंवदंतियाँ और समय पंडितराज के विषय में अनेक किवदंतियाँ प्रसिद्ध हैं। छुछ लोग कद्दते हैं कि “जगन्नाथ पंडितराज ने तैछ॑ंग देश से जयपुर आकर वहाँ एक पाठशाल्ञा स्थापित की थी और वहीं उन्होने किसी काजी को, जो दिल्ली से झ्राया था, मुसलमानों के मजहवी प्रंथों को बहुत शीघ्र पढ़कर विवाद से हरा दिया धा। वह काजी जब दिल्ली गया, ते उसने: बादशाह के
१०-नारायण भट्ट और हरिहर भट्ठ के वंश में इस समय शुद्धाह त- भूषण भट्ट श्रीरमानाथ शाल्घोजी (वैबई ) तथा साहिल्याचाय्ये भट्ट श्रीमशुरानाथ शास्रीजी ( जयघुर ) आदि अनेक 'भट्ट विद्यमान हैं और उनकी भ्राप्त की हुईं जीविका को भोगते हैं ।
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खामने पंडितराज की विद्या-बुद्धि की बढ़ी प्रशंशा की । बाद- शाह यह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने इन्हे जय- पुर से दिल्ली वुल्लाकर इनका बड़ा आदर-सत्कार किया। चहाँ ये महाशय किसी यवन-कन्या पर आसक्त हो गए और बादशाह की कृपा से इनका उसके खाथ व्याह भी द्वो गया। इस तरह इन्होंने अपनी यावनावस्था बादशाह के आश्रय मे मे ही सुखपूर्वक बिताई। जब थे बुड़्ढे हुए तब काशी चल्ले गए। पर वहाँ भ्रप्पय दीक्षित भ्रादि विद्वानों ने यह कहकर कि 'यह ते! यवनी के संसग से दूषित है? इनका तिरस्कार किया भ्रोर इन्द्दे जाति से निकाल दिया। तब ये गंगातट पर गए झौर सबसे ऊपर की सीढ़ी पर बैठकर उसी समय बनाए हुए अपने पद्यो से ( जिनका संग्रह “गंगाल्नदरी? नामक पुस्तक मे है ) लगे गंगाजी की स्तुति करने | फिर क्या था, भक्तवत्सला गंगाजी प्रसन्न हुई और प्रत्येक श्लोक पर एक एक सीढ़ी चढ़ती गई" श्रौर बावनवे पद्य के पढ़ने पर पंडितराज के पास आ पहुँची, एव उस यवन- कन्या सहित इन महाशय के अपनी प्रेमपूर्ण गोदी मे बिठा- कर स्नान करवा दिया | इंष्या-द्वेष से कछ्लुषित बेचारे काशी फे पंडित पंडितराज के इस प्रभाव को देखकर अत्यंत चकित हो गए और फिर कुछ न बोल सके /?
दूसरे लोगो का यह भी कहना है कि--“जब ये महाशय दिल्ली-नरेद्र शाइजहों के कृपापात्र हे गए और उनकी कृपा से इन्हे भ्रच्छी संपत्ति प्राप्त दे गई, तब, जवानो के दिन ते
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थे ही, इनके विवेक का प्रकाश लुप्त हे! गया भर ये अंधे होकर किसी यवनयुवती पर आसक्त हो गए। पर थोड़े समय के बाद वद्द सर गई। बेचारे पंडितराज उप्तके विरह मे बड़े घबड़ाए और दिल्ली छोड़कर काशी चल्ले गए। पर वहाँ के पंडितों ने, जे। पहल्ले इनके आचरणों को सुन चुके थे, इनका भ्रनादर किया और ये स्वयं भी पंडितों के तिरस्कार एवं प्रियतमा की विरहाप्ि से दुःखित हुए और कही चैन न पा सके | परिणाम यह हुआ कि अपनी बनाई हुई गंगा- लहरी को पढ़ते हुए, जब बरसात मे गंगा की बाढ़ आ रही थी तब, उसमे कूद पड़े ग्रैर डबकर मर गए ।??
एक किवदंती यह भी है कि---“/जब ये वृद्ध होकर काशी में जा रहे थे, तब एक दिन प्रभात के खमय, ठंडी ठंडी हवा में, पंडितराज अपनी उस यवनयुवती को बगल मे लिए हुए, गंगावट पर, झुँह् पर बस्न श्रेढ़े हुए सोए हुए थे और इनकी सफेद चोटो खटिया से नीचे लटक रही थी । इतने में झप्पय दीक्षित वहाँ स्नान करने चल्ले आए | उन्हें एक वृद्ध मनुष्य की यह दशा देखकर दुःख हुआ और कहने क्गे कि “कि-निश्शंक शेषे, शेषे बयसि स्वमागते सृद्ौ ।?? अर्थात् महा-
३---ये दोनें किंवदृतियाँ काव्यमाछा से प्रकाशित रसगंगाघर की भूमिका से ली गई हैं । वहाँ यवनी की आसक्ति के भ्रमुमापक श्लेक भी लिखे हैं, पर उन्हे अश्लीक समझकर हमने छोड़ दिया है और दे सर्वेन्न प्रसिद्ध भी हैं।
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शय, मैतत आ चुकी है, अब इस शेष वय मे क्यों निडर होकर से रहे हे ? अब ते कुछ ईश्वर का स्मरण-भंजन करो और अपने जीवन को छुधारो । पर, इस पद्म के घुनते ही पंडित- राज ने ज्योहदी झुँह उधाड़कर उनकी तरफ़ देखा, त्योंही पंडितराज का पहचानकर अप्पय दोज्षित मे इस पद्च का उत्तराधे यों पढ़ दिया कि “अथवा सुख शयोथा, निकटे जागत्ति जाहृ॒बी भवत:”” प्र्थात् अधवा आप सुख से सोते रहिए क्योंकि आपके पास मे भगवती जाह॒बी जग रही हैं। बस, झापको फिकर उन्हे है, आप निडर रहिए |?
यह भी कहा जाता है कि “पंडितराज जिस समय काशी में पढ़ते थे, उस समय जयपुर-तरेश मिरजा राजा जयसिंहजी काशीयात्रा करने गए थे। वहाँ की बिद्वन्मंडली मे इनकी प्रग्भता देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए और इन्हे झपसे साथ जयपुर ले भ्राए। साथ के आने का कारण यह था कि शाही दरबार मे राजपूत लोगो के विषय मे मुन्ना लोग यह कहा करते थे कि “आप लोग वास्तविक क्षत्रिय नही हैं; क्योंकि जब परशुरामजी ने प्रृथ्वी को २९ बार निःज्षत्रिय. कर दिया, दे फिर आप ज्ोएें के पूवज बच कहाँ से सकते थे ९? दूसरे, यह भी कहा जाता था कि अरबी साषा संस्कृत-भाषा से प्राचीन है?। ये बातें पूर्वोक्त नरेश को बहुत खटका करती थी। पंडितराज ने बादा किया था कि हम उन्हे निरुत्तर कर
३--पह किंवदृत्ती कुवढयानंद (मिणंय सागर) की सूमिका मे है।
[ १८5 ] देगे। जब बे उन्हें साथ ले आए, तब पंडितराज ने कह्दा कि-- 'पहल्ली बात का--अर्थात् राजपूत लोगों के वास्तविक क्षत्रिय होने का--जवाव ते हम आज ही दे सकते हैं; पर दूसरी वात का--- प्र्थात् अरबी संस्कृत से प्राचीन है, इसका--जवावद तव दिया जा सकता है जब हम भ्ररवी पढ़ ले। सो राजाजी ने उन्हें अरबी पढ़ने की अनुमति दी और उन्होंने कुछ दिन आगरे मे रह- कर पभ्ररवी का यथेष्ट ज्ञान प्राप्त कर लिया । तदनंतर ये वादशाह के सामने उपस्थित किए गए । पूछने पर इन्होंने पहली बात का यह प्रत्युत्तर दिया कि--निःक्षत्रिय होने का भ्रथ यदि यह ज्गाया जाता है कि एक भी क्षत्रिय नहीं बचा, ते फिर आप ही कहिए कि प्रथ्वी २१ वार कैसे नि.क्षत्रिय हुई, क्योंकि क्षत्रियमात्र की समाप्ति ते एक ही बार मे हो गई होगी। ओर यदि यह कट्ठो कि कुछ बच रहते थे, ते! जब २० वार बचते रहे ते २१ वीं बार भी अवश्य द्वी कुछ बच रहे होंगे । वस, उन्हीं की संतान थे राजपूत लोग हैं ! और दूसरी बात के उत्तर के विषय मे यों कहा जाता है कि अरबी भाषा में मुसल्षमानों की एक धमेपुस्तक वताई जाती है, जिसका नाम “हदोस” है। उससे एक जगह यह लिखा है कि--ऐ सुसल्लमानो ! हिंदू लोग जिस तरह मानते हैं, उससे उल्टा तुम्हें मानना चाहिए ।” सो पंडितराज ने कहा कि “बिता भाषा के ते कोई धर्म हे! नहीं सकता, और आपका “हदीस? इस बात की सूचना देता है कि उस वाक्य से पहले भी हिंदुओं
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का फोई धरम था। अतः जब धर्म था ते भाषा अवश्यमेव थी ओऔर हिंदुओं की घामिक भाषा संस्कृत के अतिरिक्त अन्य कोई दे! नही सकती; इस कारण आपको मानना पड़ेगा कि संस्क्रत अरबी से प्राचीन है ।! कहा जाता है कि इन तकोंँ से बाद- शाह बहुत प्रसन्न हुआ और तब से शाही दरबार में इनका भारी दवदवा हो गया [?
यह ते हुई किवदंतियों की बात | अब समय का विचार कीजिए। इस विषय में अब तक लोगों ने मेटे तैर पर यह सेच जिया है कि शाहजहाँ का राज्यासिपेक सन् १६२८ ईं० में हुआ और सन् १६५८ ई० मे औरंगजेब के हारा वह कैद कर लिया गया तथा सम् १६६६ ६० मे मर गया । बस, यही पंडितराज का समय है। अतएवं यह कहा जाता है कि 'अप्पय दीक्षित पंडितमज के समकालिक नहीं थे एव उनके इनफे कुछ विरोध नहीं था? इत्यादि ।
पर, इस विषय से झब कुछ नवीन प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं, जिन पर विचार करना आवश्यक है। प्रप्पय दीक्षित का एक अंथ सिद्धान्तलेशसंग्रह” नाम का है। उसके कुंभकाण- वाले संस्करण की भूमिका मे विद्वान भूमिका-लेखक ने २-३ शोक ऐसे लिखे हैं कि जिनसे पंडितराज के समय के घिषय
भह कि चढ ती महामह्देपाध्याय भ्रीगिरिधर शर्माजी चतुचेठी के सुख से सुनी गई है, और अन्य किंवद॒॑तियें की अपेत्ता कुछ प्रामाणिक प्रतीत होत्ती है |
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में कुछ सूक्ष्म विचार द्वो सकता है कौर पहली किंवदंती का छुछ अंश सिद्ध सा हे। जाता है। उतमें से पहला रोक, जिसको उन्होंने काव्यप्रकाश की व्याख्या मे नागेश भट्ट का लिखा हुआ बतलाया है, यह ऐ-- ' दष्यवृद्ाविदृदुअंहअह वशान्म्लि.्' गुरुद्गोहिया यब्म्लेच्छेति चचे5विचिन्त्य सदुसि प्रोढेअपि भद्दोजिना । तत्सत्यातितमेव घैयनिधिना यत्स ज्यस्दूनात्कुच” निेध्याउस्थ मनेरमामत्रशयत्रप्यप्पयाद्यान् स्थितान् ॥
अर्थात् गर्बयुक्त द्राविड़ ( अप्पय दीक्षित अथवा द्राविड़ छ्लोगों ) के दुराग्रह रूपी भूत के आबेश से गुरुद्रोही भट्टोजि दीक्षित ने भरी सभा मे बिना सोचे-समभे ( पंडितराज से ) अरस्पष्टया जो म्लेच्छ' यह शब्द कह दिया था उसको चैयनिधि पंडितराज ने सत्य कर दिखाया, क्योंकि इतने अप्प- यादिक विद्वानों के विग्मान रहते हुए, उन्हें विवश करके भरट्टोजि दीक्षित की मनोरमा ( सिद्धांतकामुदी की व्याख्या ) का कुचसदन ( खंडन ) कर दिया। बात भी ठीक है, जब पंडितराज को स्लेच्छ ही बना दिया गया, ते वे स्लेच्छ कहने- वाले की मनोरमा ( स्ली ) का कुचमर्दन करके क्यों न उसे म्लेच्छवा का चमत्कार दिखा देते । दूसरा श्लोक 'शब्दकास्तुभशाणोत्तेजन? नाप्रक पुस्तक का है। वह योँ है-- ५ अप्पय्यहुअदविचेतितचेतनानामायहुद्दमयमहं शमयेडवलेपान् ।
[ २२ |]
अर्थात् अप्पय दीक्षित के दुराग्रद से जिनकी बुद्धि मूच्छित हो गई है, उन गुरुद्रोहियों के गयों” को यह मैं शाॉंतकर रहा हैँ ।
तीसरा ःछोक बाल कवि का बनाया हुआ बताया जाता है, जिनके अ्रप्पय दीक्षित के आता के पैत्र नीलकंठ ने 'नत्त- चरितः नामक अंथ मे प्रप्पय दीक्षित के समकालिक माना है। उन्होंने लिखा है कि--.-
यहूं विश्वजिता यता परिघरं सबे बुधा निजिता भद्येजिप्रमुखाः, स पंडित जगन्नाथी5पि निस्तारितः । पूव 5घे, चरमे, द्विसप्ततितमस्याउब्द्स्य सद्िश्विजि-- थाजी यश्र चिदुम्बरे खमसजज्ज्येतिः सर्ता पश्यताम ॥
अर्थात् अप्पय दीक्षित ने अपनी आयु फे ७९वें वर्ष के पूर्वांध मे, विश्वजित् यज्ञ करने के लिये, पृथ्वी के चारों तरफ घूमते हुए भट्टोजि दीक्षित आदि सब विद्वानों को विजय किया और उस---सुप्रसिदध-पंडित जगन्नाथ का भी उद्धार कर दिया। फिर उसी वर्ष के उत्तराधे मे विश्वजित् यज्ञ किया और चिदबरज्षेत्र मे सब सत्जनों के देखते हुए आत्मज्याति को प्राप्त दो गए।
अब यहाँ विचार करने की बात यह है कि अप्पय दीक्षित
पंडितराज के समकालिक हो! सकते हैं, झ्रथवा नहीं। हमारी समझ से समकालिक हो! सकते हैं। कारण यह
[ २३ |] है कि भट्टोजि दीक्षित के गुरु शेषश्रीकृष्य थे! | झऔर शेषवीरेश्वर शेषश्रोक्ृष्ण के पुत्र थे यद्द भी सिद्ध है'। यही शेषवीरेश्बर पंडितराज के पिता पेरुभट्ट के एवं पंडितराज के गुरु हैं, जैसा कि पहले बताया जा चुका है। सो यह सिद्ध दो जाता है कि शेषपीरेश्वर और भट्टोजि दीक्षित समकालिक थे; क्योंकि एक शेषश्रीकृष्ण के पुत्र थे और दूसरे शिध्य। भर बहुत संभव है कि शेषवीरेश्वर भट्टोजि दोजक्षित से बड़े रहे हों। कारण, एक ते उन्होंने अपने विद्यमान रहते भी मनाोरमा का खेंडन अपने श्र और शिष्य ( पंडितराज ) के द्वारा करवाया और अपने स्वयं पिता की पुस्तक के खंडन के प्रतिवाद मे, कुछ भी न लिखा, जिसका रहस्य यही प्रतीत द्वोता है कि उन्होंने अपने से छोटों की प्रतिहृद्विता करना अनुचित समकता है। यह अझर्स- भव भी नही; क्योंकि प्राचीन पंडितों के शिष्य ते झ्मति बुद्धा- वस्था तक--किबहुना, देहावसानव तक--हुआ करते थे पर झ्राज-दिन भी ऐसा देखा जाता है। पर, इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों समकात्षिक थे। साथ ही पूर्वोद्धत कोकों से भी यह सिद्ध हे! जाता है कि भट्टोजि दीक्षिव और अप्पय दीक्षित समकालिक थे। तब, जब पंडितराज शेषवीरेश्वर से
१०-+ ,, »««रेषवंशावतंसानां श्रीकृष्णपंडितान चिरायाचिंतयेः पादुकगे!ः असादादासादित्तशब्दानुशासनाः .. ..! ( 'सनेारसाक्ुच- सदन! में भड्दोजि दीक्षित का विशेषण ) |
३--मनेारमाकुचमर्दन” का चही आरंस का भाग ।
[ २४ ] पढ़ सकते थे, ते! भट्टोजि दीक्षित और झप्पय दीक्षित भी उनके समय मे रहे हो ते। कोई आराश्चय की घांत नहीं । पर, यहाँ एक और भी विचारणोय बात है, जिसने कि अ्प्पय दीक्षित को जगन्नाथ के समकालिक मानने मे ऐतिहा- सिकों को आंत कर दिया है। वह यह है कि पूर्वोक्त नी- कंठ दीक्षित, जे अप्पय दीक्षित के श्राता फे पौत्र थे, अपने बनाए हुए 'नीत्॒कंठविजय” नामक चंपू मे लिखते हैं--- अट्टन्रिंशदुपस्क्ृतसपशताधिकचतुःसहस्र घु । कलिवर्षेघु गतेघु अधित. किल नीलकंठविजयेउ्यम् ॥ अर्थात् बह 'नीलकंठविजयः कलियुग फे ४७१८ वर्ष चीतने पर लिखा गया है। यह समय ईंसवी सन १६३८ के लगभग होता है भर उस समय शाहजहाँ का राजत्वकात था। सो यह सिद्ध किया जाता है कि यह नीलकंठ पंडितराज का समकालिक था, इसके दादा अप्पय दीक्षित नही | नीलकंठ ने खनिर्मित त्यागराजस्तव' मे यह लिखा है कि-- योहतनुताब्चुजसूनु जसनुप्रहेणात्मतुल्यसहिमानस् ॥ अर्थात् जिन (अप्पय दीक्षित) ने अपने छोटे भाई के पैज्न ( मुझ ) को, अनुपम करके, अपने समान श्रभाववाल्ा वना दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि नीलकंठ ने अप्पय दीचित से अध्ययन किया था। पर उसी भूमिका मे “अक्म- विद्यापत्रिकः का हवाला देकर यह लिखा गया है--
[२४ ] 'नीजकंठविजय” को कवि ने झपनी आयु के तीसवे वर्ष मे लिखा है औ्लैर कवि जिस समय बारह वर्ष का था, उसी समय संत्तर बे के वृद्ध अरप्पय दीक्षित ने उस पर अनुअह किया था। अतः अप्पय दीक्षित का जन्म सन् १५५० ई० होता है ऊपर उद्धृत बाक्त कवि के श्लोक से यह सिद्ध होता है कि अप्पय दीक्षित का देहावसान ७२ वर्ष की अवस्था मे हुआ था। महामहेपाध्याय श्री गंगाधर शासत्रीजो ने सिद्धांवलेश- संप्रह के फाशीवाल्ले संस्करण की भूमिका मे एक पद्म ख्य॑ अप्पय दीक्षित का भी उद्धृत किया है। वह यों है--वरयांसि सम सप्ततेरुपरि नैव भेगे स्पृह्द न किचिदद्मथेये शिवपद॑ दिदक्षे परस्। श्र्थात् मेरी अवस्था इस समय ७० वर्ष से ऊपर है, व ' मुझ्ते विषय-सेग की अमिल्लाषा नही रहो, अब ते केवल कैलास- वास की इच्छा है ।! इससे भी यही सिद्ध होता है कि उनका प्रयाण उपयुक्त श्लोक के वर्णित समय मे ही हुआ द्वोगा | से प्रह्मविद्यापत्रिका के अनुसार उनका मृत्युक्ाल १६२२ ३० सिद्ध दोता है, जो शाहजहों के राजत्व काल्न से पहले है | पर यह बात पृणेतया निर्यीत नही कही जा सकती। , क्योंकि यह मानना कि 'दीज्षितजों ने सत्तर वर्ष की अवस्था मे
१---“बक्मविद्यापत्रिकाकारास्तु--- नील्कंठविजयश्च कविना बरिंशे घर्ष आणायि। कविश्च द्वादशवष एवं सप्ततिवयसा दीक्षितेना- सुग्रृहीत:। अतस्तेपामवतारकाल' कल्पाव्दः ४६५०, शकाब्दः १४७१, सन् १५११० इत्युजाददु:”” । ( सिद्धांतलेशभूमिका ) |
[ २६ ]
१२ वर्ष के पौच्र पर अनुम्नह किया था?, केबन्न किंवदंतीमूलक है, और पूर्वोक्त सिद्धांतलेशसंप्रह के भूमिका-लेखक भी इसके मानने मे विप्रतिपन्न हैं। अश्रतः हमारी समझ मे तो यह श्राता है कि नीजकंठविजय” के लिखते समय दीक्षितजो भी उपस्थित थे, और पौत्र की अवस्था उस समय ३० वर्ष की थी । नीक्षक॑ठ ने खययं भी भ्रप्पय दीक्षित की वंदना मे वतेमान काल का प्रयोग किया है, और ७०-७२ वर्ष के दादा के ३० वष्े का पौत्र होना कुछ असभव भी नहीं। सो यह सिद्ध द्वो जाता है कि अप्पय दीक्षित भी शाहजहाँ के राजत्वकाल तक विद्यमान थे | अब यह विचार कीजिए कि पंडितराज दारा के विनाश और शाहजहों के कारावास तक दिल्लो मे थे अथवा नही। यह कहा जा सकता है कि दारा के अभ्युदय और यौवन तक बे वहाँ थे, जेसा कि 'जगदाभरणः के प्रणयन से सिद्ध होता है। से। यह ते! उस दुघंटना के बहुत पू्वेकाल मे भी बन सकता है । कारण, औरंगजेब के राज्यारोहण “का बय चालीस वर्ष है, जो इतिहासअसिद्ध है। तब वह शाहजहाँ के राज्यारोहण के समय दस वर्ष का सिद्ध होता है। पर, दारा ते उससे ज्गभग ६ वर्ष बड़ा द्वोना, चाहिए, क्योकि औरंगजेब से बड़ा शुजा प्रौर उससे बड़ा दारा था। सो इं० सब १६३८ तक, जो 'नीक्॒कंठविजय' का
१--ओऔम्रानप्पयदीक्षित स जयति श्रीऊंडविद्यागुरु”ः ( नीढकठ- विजय ) ।
[ २७ | लेखनकाल है, दारा सत्ताईंस वर्ष के ्गभग सिद्ध होता है, जध कि उसका पूर्ण यौक्न कहा जा सकता है। अव, यदि हम पंडितराज को दारा के समवयरक मान ते ते कोई अछ्लुप- पत्ति न होगी; प्रत्युत यह सिद्ध हे। सकता है कि समषयसस््कों मे प्रीति प्रधिक हुआ करती है, इस कारण समवयस्क ही रहे हैं।। और, यदि रह माना जाय कि दारा का उनके पास भ्रध्ययनादि, जो कि उसके हिंदूधर्म की अभिरुचि घर संस्कृत- ज्ञान आदि ऐतिहासिक बृत्तों से विदित है, हुआ हो, ते! क्रधिक वय भी हो सकता है। निदान यह सिद्ध हो जाता है कि पंडितराज श्रप्पय दीक्षित की वृद्धावत्था मे प्रवश्य विद्यमान थे | हाँ, यह कहा जा सकता है कि अप्पय दीक्षित और भट्टोजि दीक्षित आदि बृद्ध रहे होंगे श्रार पंडितराज थुवा । अतएव उस समय के उन कट्टर साम्राजिक लोगों ने; वादशाही दरबार मे रहने के कारण, इस पर संदेह फरके इन्हे तिरस्कृत किया हो ते कोई आश्चय की बात नहीं। अ्रप्पय दीक्षित द्राविड़ थे, भट्टोजि दीक्षित मद्दाराष्ट्र और पंडितराज तैलंग; और झाज-दिन तक भी इन जातियों मे परस्पर सहभोज होता है; अतः अप्पय दोक्षित और भट्टोजि दीक्षित ने, जे उस समय वृद्ध थे, इनकी पंचायती में प्रघानता पाई है। ते कोई असंभव बात नहीं | अप्पय दीक्षित अंतिम वय में कुछ समय काशी रहे भी थे और वहाँ के समाज में उनका श्रच्छा सम्मान था, यह भी उसी भूमिका से सिद्ध होता है। पंडितराज ने भी रस-
[ र८ ]
गंगाघर में अप्पय दोक्षित के नाम के स्थान पर, कई जगह, (टरविडशिरोमशिमि:” और 'द्रविडपुड्डबे. शब्द लिखे हैं, जो कि इनके सरपंच होने की सूचना देते हैं ।
जब यह बात ठीक हो गई कि अप्पय दोक्षित और भट्टोजि दोज्षित इनके समय मे थे, ते! पूर्वोक्त श्लोकों के अथे को सिथ्या सानने मे कोई विशेष उपपत्ति नहीं रह जाती | भ्रब यह बात सामने आती है कि भट्टोजि दोक्षित ने इन्हें भरी सभा मे स्ल्ेच्छः क्यों कहा था। विचारने पर इसके दे कारण हे। सकते हैं--एक ते। यद्द कि यवन सम्राट के दरबार मे रहने फे कारण इन पर यबवनों के संसग का आजक्षेप किया गया हो, भर दूसरा वही, जो सर्वत्र प्रसिद्ध है कि इनका किसी यवनयुवती से संपर्क रहा दे। पहले कारण मे ते प्रमाण देने की कोई अ्रवश्यकता द्वी नहीं; क्योकि वे शाहजहों और दाराशिकाह के ऋृपापात्र थे यह निस्संदेह है। रही दूसरी बात, से वह भी सर्वथा असंभव ते नहीं है; क्योंकि दिल्लीश्वर के कृपापातन्न अतएवं सर्वविध संपत्ति से संपन्न और तत्कालीन दिल्लो जैसे विज्ञासमय नगर के निवासी नवयुवक को, उन उन्मादक नवयैवन के दिवसों ने, जो कंगाल्नों को भी पागल बना देते हैं, यदि किसी यवन विला- सिनी पर आसक्त होने के लिये विवश कर दिया हे और उन्होंने किसी यवनी का रख लिया दो ते आाश्चये की क्या बात है। रही काव्यमालासंपादक फी यह बात, कि यवन
[ २८ |] युवती की आसक्ति को. प्रमाणित करनेवाले श्लोक उनकी किसी पुक्षक मे नहीं मिल्षते । से यह कोई ऐसी दुःसमांधेय घात नहीं है; क्योंकि सभी कवियों के सभी पथ पुस्तकों मे संग्रहीत नहीं होते, कुछ फुटकर भी रह जाते हैं। फिर पंडितराज जैसे विद्वाद् प्रपनी पुस्तक से उन डन््मादक दिवसों के लिखे हुए कुसंसर्ग- सूचक ज्छोकी को संगृहीत करते यह भी अघटित ही है। अस्तु , कुछ भी है । दम एक महा विद्वान को कलंकित करना नहीं चाहते; पर इतिद्दास की दृष्टि से हमार विचार मे जो कुछ सत्य आया, उसे छिपाना भी उचित नहों था। हाँ, इतना भ्रवश्य सिद्ध है कि अप्पय दोक्षित और भट्टोजि दीक्षित पंडितराज के समय मे वर्तमान और जाति फे सरपंच थे, भै(र उत्तको इन पर यवन-संसर्ग का संदेह था, तथा इसी कारण इनका उनका मनेमालिन्य था | बाल कवि के श्लोक से यह भी सिद्ध है कि अप्पय दीक्षित की अतिमावस्था में इनका निस्तार भी हो गया था। पर, इनका वर्षों का द्वेष इतने मात्र से सर्वथा शुद्ध न हुआ और वह रसगंगाधर में फल्क ही श्ावा है | हाँ, दूसरी किवदंती में जो यह कद्दा गया है कि वे छूब मरे? से सर्वथा मिथ्या है; क्ष्योंकि रखगंगाधर गंगालहरी के बहुत पीछे बना है और इसमे स्थान स्थान पर उसके पद उद्धृत हैं। तीसरी किंवदंती भी मिथ्या प्रतीत द्वोती है; क्योंकि अप्पय दीक्षित के सामने पंडितराज का वृद्ध होना किसी तरह सिद्ध नहीं होता ।
[ ३० ] स्व॒भावादि पंडितराज का स्वभाव उद्धत, अमिमानपूण् और महान से महान् पुरुष के भी दोपों को सह्दसा उघाड़ देनेवाला था। नमूने के तौर पर एक एक उदाहरण सुनिए । पहले उद्धतता को लीजिए | किसी कविं से उसके बनाए हुए पद्म सुनने के पहले श्राप कह रहे हैं कि--. निर्माणे यदि मा्मिकाडसि नितरामत्यंतपाकद्ध व- स्टद्वीकामधुमाधुरीमद्परीहारोद्धराणां गिरामर । काव्यं तहि सखे सुखेन कथय त्व॑ सम्मुखे माइशां ने चेदुष्कृतमात्मना कृतमिव ख्ांताहहिमां कृषाः । हे सखे ! यदि शाप अत्यंत पक जाने के कारण टपकती हुई दाख और शहद की मधघुरता के मद को दूर कर देने मे तत्पर वचनों की रचना के गतया मर्मज्ञ हैं, तब ते। अपनी फविता को मेरे से मनुष्यों के सामने बड़े मजे से कद्दते रहिए । पर यदि आपसे वह शक्ति न हा, ते, जिस तरह मनुष्य अपने किए हुए पाप को किसी के सामने प्रकट नही करता, उसी तरह आप भी अपनी कविता के अपने हृदय से वाहर न होने दोजिए। आप अपने उस अ्रपराघध को मन फे मन में ही रखिए, कहो ऐसा न दो कि जबान पर आ जाय | देखिए ते। केसी उद्धवता है। कविता को शपराध ते बना ही दिया, केवल सजा देना बाकी रह गया। सो, शाथद, वह बेचारा वैसे पद्य वेज्ञा ही न होगा, अन्यथा, अधिक
[ हे? ]
नही ते, एकाथ थप्पड़ का पुरस्कार ते अवश्य ही प्राप्त हो जाता | अब अमभिमान् की बात सुनिए। आप कहते हैं--- आमूलादल्षसानार्मठछयवछूयितादा च कूछात्पयेधे- याँवन््तः सन्ति काव्यप्रणयनपटवस्ते विशर्कूं वद॒न्तु । स्ठ्ीकामध्यनियन्मसुणरसमरी माधुरी साग्यभाजां वाचामाचायताया' पद्मनुभवितुं क्ले5स्ति धन्यो मद्न्यः ॥
धुमेरु पर्वत की तरहटो से लेकर मज्ञयाच्ष से घिरे हुए समुद्रतट तक, जितने भी कविता करने मे निपुण पुरुष हैं, वे निर्भय होकर कहें कि दाखों के अंदर से निकत्ननेवाली चिकनी रसधारा की मधुरता का भग्य जिन्हें प्राप्त है--अर्थात् जिनकी कविता उसके समान मधुर है, उन वाणियों के आचार्य पद का अनुभव करने के लिये मेरे अतिरिक्त कान पुरुष धन्य हो सकता है। इस विषय मे ते मैं एक ही धन्य हूँ, दूसरे किसी की क्या मजाल है कि वह इस पद को प्राप्त कर सके ।
देखिए ते आचारयजी महाराज कितने अमिमत्त हो गए हैं। आपने किसी दूसरे के धन्यवाद की भी ते अपेक्षा नहों रखी, उस रस्म को भी अपने आप ही पूरा कर लिया; क्योंकि शायद किसी झन्य को यह धन्यवाद देने-का सैभाग्य प्राप्त दो जाता ते आचायजी को ऋृतज्ञता दिखाने के लिये उसके सामने थोड़ी देर ते आँखें नीची करनी पड़ती ही ।
अच्छा, अब देधोद्घाटन की तरफ भी दृष्टि दोजिए | अप्पय दोज्षितादि को ते! छोड़िए; क्योंकि उनके देषेद्धाटन
[ ३२ ]
में ते आपने हद द्वी की है । पर आप ध्वनिकार श्रीआलंदव्ध॑ना- चाये के परस भक्त है, समय समय पर आपने उनका बड़े आदर से स्मरण किया है; कितु उस देषदरशिनी दृष्टि के पंजे से वे भी कैसे बच सकते थे ? एक जगह ( रूपकध्वनि के उदाहरण मे ) चकर मे आ ही गए। फिर क्या था, झट से लिख दिया आनंदवधेनाचार्यास्तु ..? भर “तत्चित्यमू! ।
आपके उदाहरणों मे शाही जमाने की कत्तक भी आ ही जाती है। उस समय कबूतरों के जोड़े पालने का बहुत प्रचार था, और अब भी यवनें मे इस बात का प्रचार है। से भापने ल्त्जा;भाव की ध्वनि के उदाहरण मे लिख ही दिया---
निरुद्धथ यान्ती तरसा कपेती कुजत्कपेतस्य पुरो ददाने ।
मयि स्मिताओ वदनारविन्द' सा सन्दुमन््द' नमयाम्बभूव ॥*
उत्तर भारत मे रहने पर भी आप पर दाक्षिणात्यता का प्रभाव ज्यों का त्यों था। देखिए ते भावशब्ञता का दृष्टांव किस तरह का दिया गया है--
नारिकेलनलक्षीरसिताकदुछूमिश्रणे । विज्ञक्षणो यथा स्वादे! भावानां सइते तथा ॥
अर्थात् जिस तरह नारियल के जल, दूध, मिश्रो और केल्ञों के मिश्रण मे विज्कक्षण खाद उत्पन्न हो जाता है, उसी तरह भावों के मिश्रण में भी होता है। क्या इस विल्क्षण मिक््ल्वर को दाक्षियात्यों के सिवा कोई पहचान सकता है ?
१--इसका अर्थ अजुचाद से देख लीजिए ।
_ हेड ]
इसी दरह अन्यान्य बातें भी इस पुस्तक के पाठ से आपके हृदय में अवतरित हो! सकेंगी, हम अधिक उदाहरण देकर इस प्रकरण को विस्तृत नहीं करना चाइते ।
धर्म और अंतिम वय
आप वैष्णवर्धर्भ के अनुयायों श्रैर भगवान श्रीक्षष्णचंद्र तथा भगवती भागीरथी के परम भक्त थे; यह मंगलाचरण से लिखित और स्थान स्थान पर उदाहत क्ोकों से सिद्ध है। पर शिव तथा देवी झादि की स्तुति करने मे भी द्विचकते नहों थे । श्रीमद्भागवत' और वेदव्यास' पर आपको प्रत्यंत श्रद्धा थी । भगवन्नामे।च्चारण मे आपको बड़ा आनंद प्राप्त होता था। देखिए, आपने लिखा दै कि-- मद्वीका रसिता सिता समशिता रफीतं निपीतं पयः खर्यातेन सुधारप्यधायि कतिधा रम्साघरः खण्डितः । तत्त्व शरृहि सदीय जीव भवता भय भवे आस्थता कुष्णेत्यक्षरयारय मचुरिसेह्वारः कचिल्कछित: ॥ हे भेरे जीवात्मन ! तूने अंगूर चाखे हैं, मिश्री अच्छी तरह खाई है और दूध ते! खूब ही पिया है। इसके अति- रिक्त ( पहल्के जन्में मे कभी ) स्वर्ग मे जाने पर अ्रम्रत भी पिया है और स्थर्गीय अप्सरां रंभा के झघर को भी खंडित १--देखिए, 'रस नव ही क्ये। है? आदि अकरण । २--ऋतुराज॑ अ्रमरहितं यदाहमाकर्ययासि, नियमेच । आरोहति
स्टृतिपयं तदैव भगवान् सुनिर्ष्यासः? ( स्मरणा्ंकवार ) आदि। य
[ ३४ ]
किया है। सेतू बता कि संसार मे बार बार घूमते हुए तूने, कऋष्ण” इन दे! अक्षरों मे जो मधुरता का उमार है, उसे भी कद्दीं देखा है? ओह ! यह श्रपूर्व माघुरी और कहीं कैसे प्राप्त हे सकती है | देखा भावोद्रेक !
वास्तव मे सरसहृदयों के द्विये, भक्ति के भ्रतिरिक्त अन्य कोई, भगवद्माप्ति का सर्वोत्तम और सुंदर साधन है भी नही ।
अतिम वय से पंडितराज काशी अथवा सथुरा मे जा बसे थे और भगवत्सेवा करते रहते थे।'
निर्मित ग्रंथ
१९--अश्वुतलहरी--इसमे यमुनाजी की स्तुति है। यह काव्यमाल्षा मे मुद्रित दे चुकी है ।
२--अ्रासफविलास--इसमे नवाब झसफर्खों का वर्णन है। काव्यमाला-संपादक ने लिखा है कि यह अंथ हमे नही मिल सका, कुछ पंक्तियाँ ही सित्ली हैं।
३--करुणालहरी--इसमे विष्णु की स्तुति है। यह काथ्यमाल्ा से मुद्वित हे चुकी है |
४--चिचस्मीझ्चाँंसाखंडन--इसमे रसगंगाधर मे स्थान स्थान पर जो चित्रमीमांसा के अंशो का खंडन किया गया है, उसका संग्रह है प्रौर काव्यप्राज्ा मे छप चुका है|
आअक्ाप््क्एणःण०/्/-ज््््+-++++--++त+_+त_ततमतततततततन्त+_
१--भासिनी दिल्ञास! के अत मे 'सम्पत्य्धकशापवस्य नगरे तस्तव॑ परं चिन्त्यते! और कुछ पुस्तकों में 'सैप्रत्युज्छितवासन॑ मधुपुरीमध्ये हरि' सेच्यते” लिखा हुआ है।
[ ३२५ ]
१--जगदास्रण--इसमें शाइजहों के पुत्र दारा- शिकाह की प्रशंसा है। काव्यमाज्ञा के संपादक का कथन है कि प्राणाभरण से और इसमे इतना ही सेद है कि इसमें प्राण- नारायण के नाम के स्थान पर दाराशिकाह का साम है ।
६--पीयूबलहरी--इ्सका सुप्रसिद्ध नाम गंगालहरी है और यह अनेक जगह अनेक वार छप चुकी है ।
9 -पग्राणाभरण--इसमे नैपालनरेश ग्राथनारायण का वर्णन है और यह काव्य-माला मे छप चुका है।
८--भामिनीधिलास---यह पण्डितराज के पद्मों का संग्रद् है श्र अनेक बार छप चुका है ।
६--मनेरमाकुचमदन--यद सिद्धान्वकैमुदी की मनेरमा व्याख्या का खंडन है, पर इसका प्रचार नहीं है ।
१० --चसुनावर्णन--वह पंथ गद्य से लिखा गया है; क्योंकि रसगंगाघर के उदाहरणों में इसके दे! तीन गद्यांश उद्धृत किए गए हैं; पर मिलता नहीं ।
११९--लह्मीलहरसी--इसमे लक्ष्मीजी की स्तुति है और यह काव्यमाला झःदि में छप चुकी है ।
१२--रसगंगाधर--यह आपके सामने प्रस्तुत है। पंडित्राज का सबसे प्रौ़ और मुख्य अंथ यही है; परंतु आज दिन तक न यह पूरा मिल सका और न पूरा मिलने की अब आशा है|
कुछ लोगों का कथन है कि इनके अतिरिक्त शशिसेन्रा?,
[ १६ ]
'पंडितराजशतक? नामक दे! और पंथ भी पंडितराज फे बनाए
हुए हैं; पर वे देखने से नहीं आते ।
अंतिम ग्रंथ
काव्यसाल्ञा-संपादक का कथन है कि--रसर्गगाधर पंडित- राज का अंतिम भंथ नहीं है, इसके बनाने के अनतर भी वे जीवित रहे। इसका कारण वे यह बताते हैं कि पंडितराज ने इसके अनेतर “चित्रमीमोसा्खंडन! लिखा है। पर, हमारी समभ्त मे, यह हेतु यथेष्ट नहीं। इसका कारण यह है कि (चित्रमीमांसाखंडन? कोई स्वतंत्र अंथ नहीं है, उसमे रसगंगाधर के वे अंश, जिनसे उस पुस्तक का खंडन आया है. ज्यों के त्यों संगृहीत कर लिए गए हैं | संग्रह का कारण यह प्रतीत द्वोता है कि उस समय आज-कत्न की तरह मुद्रण-कत्षा का प्रचार नहीं था, इस कारण किसी भी अंथ का दूर देशो तक प्रचार बहुत विलंब से होता था और पंडितराज को अप्पय दीक्षित के हिमायतियों को उनकी भूले दिखा देने की बहुत आतुरता थी, वे चाहते थे कि लोगों पर जे! अप्पय दीक्षित का प्रभाव पड़ा हुआ है, वह मेरे सामने ही कम द्वो जाय। स्रो पूर्वोक्त संग्रह की अनेक प्रतियाँ, जे समग्र रसगंगाधघर की अपेक्षा थोड़े समय और व्यय मे है! सकती थी श्रौर रसगंगाधर की समाप्ति के पूर्व ही उन ज्ञोगो के हाथों मे पहुँचाई जा सकती थी, लिखवाकर उन्होने उन सब लोगो के पास सिजवा दी और आगे का भंथ लिखते रहे ।
[ ३७ ] अन्यथा जे! सब बाते रसगंगाघर में झा गई थीं उत्तके पृथक् संग्रद की--और वह भी ऐसे संग्रह की कि जिसमें कुछ भी सवीनता नहीं है--क्या आवश्यकता थी। “चित्रमीमांखा- खंडन” के झ्रारंभ मे यह श्लोक लिखा है--- सूक्ष्म विभाव्य सयका समुदीरितानामप्पय्यदीक्षितक्ताविह दूषणानास् । निर्मत्सरों यदि समुद्धरणं विदद्धयात्तस्याहसुज्ज्यलसतेश्चरणौ चद्धामि ॥ अथोत् इस भअ्रप्पय दीक्षित की कृति ( चित्रमीमांसा ) में मैंने, सूचम विचार करके, जो कुछ दुधण दिखाए हैं, उनका यदि कोई निर्सत्सर पुरुष उद्धार कर दे ते उस निर्म्वुद्धि पुरुष के दोनों पैरों को मैं अपने सिर पर रखूँगा। इससे भी इस संग्रह का कारण यहीं प्रतीत होता है | काव्यमात्षा-संपादक ने यह भी लिखा है कि इतना अनुमान किया जा सकता है कि पंडित्तराज ने अप्पय दीक्षित के द्वेष से रसगंगाधर के द्वारा “चित्रग्नीमासा! का अनुकरण करना प्रारंभ किया था, से उन्होंने भी अपने अंध का असमाप्त ही छोड़ दिया। पर यह बात वनती नहीं । कारण, यदि यह अथ चित्रमीमांस! के अनुऋरण पर ही लिखा गया होता ते मीमांसा में ते काव्यलक्षण, रस, भाव, गुण आदि का कहीं निशान भी नहीं। फिर भल्ना इस पुस्तक में इन सब विषयों के विवेचन की क्या श्रावश्यकता थी ? और यदि . बैसए ही करना था---अर्थात् अधूरा ही छोड़ता धा---वे! क्या पंडितराज भो चित्रमौमाँंसा की तरह ही, कोई श्लोक वनाकर
[ रेप ]
अंत से नहीं रख सकते थे, क्यों उत्तरालंकार के उदाहरण के तीन पादों पर ही अंथ लटकता रद्द गया ?
दूसरे, इस बात को ते काव्यमाह्ा-संपादक भी मानते हैं कि पंडितराज रसगंगाधर के पाँच आरानन बनाना चाहते थे, अतएव उन्होने इस पुस्तक के प्रकरणों का नाम झाननः रखा था; क्योंकि गंगाधर ( शिव ) फे पॉच आनन ( झुख ) होते हैं। फिर, चित्रमीमांसा का अनुकरण ते। अधिक से अधिक अलंकारसभाप्ति तक हो सकता था, जो दूसरे आनन मे समाप्त दे! जाता । यदि उसका अनुकरण ही फरना था, ते! वे क्यों झागे लिखना चाहते थे। तीसरे, रसगंगाधर के उद्देश्यों मे भी यह बात नही है कि जिससे यह अनुमान किया जाय ।
श्रतः हमारी तुच्छ बुद्धि के अनुसार ते यह मानना उचित है कि पंडितराज का अंतिम ग्रंथ रसगंगाधर ही है भौर इसकी समाप्ति के पूर्व ही उनका देहाचसान हो गया था |
अन्य जगन्नाथ
इसके अतिरिक्त एक और बात समझ लेने की है। वह यह कि अरब तक संस्क्रत भाषा मे अंथ निर्माण करनेवाले अनेक जगन्नाथ पंडित हो गए हैं, सो उनके नाम हस यहाँ काव्यमाला की भूमिका से इसलिये उद्धृत कर रहे हैं कि कोई उनकी पुस्तकों का भी पंडितराज की पुस्तके न समझ लो ।
१९---तंजेरवासी जगन्नाथ--इनके पंथ अश्वधारी, रतिसन्मथ और वसुसतीपरिणय हैं |
| [ ३८ |
२--जयपुरनिवासी सझ्माट जगन्नाथ--श्नके मंथ रेखागणित, सिद्धांतसम्नाट् और सिद्धांतकौस्तुभ हैं।
३--जगन्नाथ तकंपंचानन--इनका अंथ विवाद- भंगायंव है|
8४--जगन्नाथ सैथिल--इनका प्रंथ प॒र्ंद्रच॑द्रिक नाटक है |
४--ओऔ निवास के पुत्र जगन्नाथ पंडित--शनका ग्रंथ अनंगविजय भाण है |
६--जगन्नाथ सिश्र--इनका अंथ सभावरंग है ।
$--जगन्नाथ सरस्वती--इनका प्रंथ भ्रद्टेतासत है।
८--जगद्दाय सूरि--श्नका अंथ सभुदाय प्रकरण है |
८ैं--जगज्नाथ--इनका अंथ शरभगजविज्ञास है।
१०--नारायण दैवज्ञ के पुत्र जगन्नाय--इनका प्रंथ ज्ञानविज्ञास है | +
९१९---जगन्नाथ--इनका भंथ अनुसेगकल्पतरु है।'
वैशाखवदि द्वितीया शनिवार ब्ए कद ले परुषात्तमशर्सा चतुषदी ७ एप्रिल सन् १४२८ जयउुर ।
4--इस प्रकरण में जिन विद्वानों से साक्ञात अथवा उनके पुस्तकादि के द्वारा सहायता आप्त हुईं है, उनका, और विशेषतः काब्यमाहा-संपा- दुक का, लेखक हृदय से कृतज्ञ है।
विषय-विवेचन काव्यलक्षण का विवेचन कवि .और काव्य इस प्रंथ को खर्य अंथकर्त्ता ने 'काव्यमीमांसा? कहा है, और सबसे पहले काव्य-ल्क्षण का ही विवेचन किया है; अतः यह सोचिए कि जिसकी मीमांसा इस गंथ मे की जा रही है और जिसका छतक्षण सबसे प्रथम लिखा गया है, वह काव्य क्या बस्तु है ? अर्धांत् काव्य शब्द का वास्तविक अथे क्या है? और साथ ही यह भी सोचिए कि वह काव्य-जक्षण झब तक किन किन विवेचकों की टक्करें खाकर किस किस रूप में परिणत हो चुका है | 'काव्य? शेब्द का प्रथे, व्याकरण की रीति से, 'कबि' की कृति! होता है, भ्र्धांत कवि जो कार्य करता है, उसे काव्य! कहा जाता है। तब यह समझने की आवश्यकता होती है कि कवि शब्द का भ्र्थ क्या है, मर वह क्या कार्य करता है। व्याकरण के भ्रमुसार कबि शब्द का अथे १--मननतरितीणे विद्याणंवे जगश्नाथपंडितनरे दहूः । रखसगंगाघर-
चाज्नी करोति कुतुकेन कान्यमीमांसास् ।-प्रथमानन, ७ छोक । २--गुणवचनत्राह्मणादिभ्यः कसेणि च! हति कर्मणि प्यज_।
[ ४२ |
किसी विषय का कहनेवाला' अथवा प्रतिपादन करनेवाला दोता है और कोषकार उसे पंडित शब्द का पर्योय- वाची मानते हैं। श्रतः व्याकरण और कोष देनों, भ्रथवा यों कहिए कि याग और रूढ़ि दोनों, की दृष्टि से एक साथ विचार करने पर इस शब्द का अथे किसी विषय का प्रतिपादन करनेवाल्ा विद्वान! होता है। इसी बात की सीधे शब्दों में यों कह सकते हैं कि कवि उस जानकार का नाम है, जा अपनी जानी हुई वातें का प्रतिपादन कर सके )
शुरू शुरू मे यह शब्द इसी अथे मे व्यवह्वत होता था। भ्रतएव सर्वेन और, वेदों के द्वारा, सब पदार्थों का सूच्रम रूप से प्रतिपादन करनेवाले जगदीश्वर के लिये वेदों मे इस शब्द का प्रयोग हुआ है--- 'कविसनीपी परिभू: खर्य॑भू:?! ( शुद्ययजुः- संहिता क्र० ४० स० ८) । इसी प्रकार वेदों के सर्व-प्रथम विद्वान और प्रकाशयिता श्रह्मा को भी पुराणों में आदिकवि” कहा गया है--..तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये? ( श्रीमद्भाग- वत १-१-१ )। जिस तरह वैदिक वाणी के प्रधम-प्रकाशक ऋ्झा को यह पदवी प्राप्त हुई, इसी प्रकार लैकिक वाणी में सर्वप्रथम वर्णयिता महर्षि वाल्मीकि भी “आादिकवि” को पदवी से विभूषित किए गए। उसके प्रलंतर मद्दाभारत जैसे
3--- झुद-शब्दे! कबते इति कवि, 'कबर्णे! इत्यनेन तु नें सिध्यति, तथ्य पवर्गीयोपघत्वाद । २--संस्याबान् पंद्धितः कचि”, इत्यमरः ।
[ ४३ ]
महोपाख्यान और अष्टादश महापुराणां के प्रणेता महामुन्ति कृष्ण हेपायन (वेदव्यास ) “कबि” पदवी के अधिकारी हुए। इसी तरह पुराणों के समय तक अन्यान्य विद्वान वर्णेयिताओं को, चाहे उनकी रचनाओं मे सौंदय अधिक मात्रा मे होता था न द्वेता, कवि कद्द जाता था; जैसे राजनीति आदि के लेखक शुक्राचा्य आदि को | कवि शब्द का बह व्यापक अर्थ, जिसके द्वारा प्रत्येक वर्शयिता को कवि कद्दा जा सकता था, पुराणों के समय तक प्रचलित था। यह बात भअ्ग्निपुराण के काव्यलक्षण से स्पष्ट हो जाती है, जिसका वर्णन अभी किया जायगा ।
परन्तु पीछे से यह शब्द उन विद्वानों के लिये व्यवहृत होने जगा, जो सौंद्यपूर्ण विषय का सौंदयपूर्ण वन करते थे झऔौर जिनके वर्णन को सुनकर मनुष्य मुग्ध हो जाते थे। अतएव व्यास भर वाल्मीकि को कवि मात्र छेने पर भी, किसी ने, मनु, याज्ञव्क्य अथवा पराशर जैसे विद्वानों को, यद्यपि उन्होने भी छदोबद्ध प्रंथ लिखे हैं, कवि नहों कहा। काव्यल्चण मे अनेक परिवतैन द्वोते होते भी, शास्रोय दृष्टि से, यह शब्द आाज दिन भी प्राय: इसी अथे मे व्यवहृत होता है।
अच्छा, यह ते! हुई कवि की वात | शअब यह समम्िए कि उसका कार्य क्या है। उसका कार्ये, कवि शब्द के साधारण अ्रथवा प्रारमिक श्रथे के भ्रतुसार 'किसी विषय का प्रतिपदन”ः और विशेष श्रथवा श्राधुनिक भ्रथे के अनुसार “किसी सौंदर्यपूणं विषय का सौंद्यपूर्ण वर्शनः है। प्रति-
[ ४४ |]
पादन अ्रथवा वर्णन शब्दों फे रूप में होता है, अतः यह सममभ्नना भी कठिन नहीं कि वह शब्द ही कवि का काये है।' तब इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रारंभ में किसी विषय के प्रतिपादन करनेवाले शब्दों को काव्य कहा जाता था।
अब आप देखिए कि कांव्य का यह साधारण लक्षण किन किन विवेचकों की कैसी कैसी विचारधाराओं मे प्रवाहित हुआ श्रौर अनेक टकरें खाकर आज वह किस रूप में है ।
अग्निपुराण ( समय अनिश्चित )
सबसे प्रथम 'काव्यज्कक्षण! प्राप्य प्रंथों मे से प्रग्निपुराण मे मित्रता है। वहाँ लिखा है---
स्षेपाद् वाक्यमिद्टार्थव्यवच्छित्ना पदावली ।
ु कायम 7 के ५ से हर हर का अर्थात् संक्षेप से जे वाक्य होता है, उसका नाम काव्य है। और संक्षेप से वाक्य का अर्थ यह है कि जिस अथे को कहना चाहते हैं, पह जितने से कहा जा सकता है, उससे न अ्रधिक और न न््यून, इस तरह की पदावली काव्य है।
:--थद्पि शब्दों की योजना कवि का काय्य है, तथापि जिस तरह कुम्हौर का कास घड़े का निर्माण हो जाने पर भी घढ़ा माना जाता है, उसी तरह शब्द सी कवि का कफाय्ये कहलाता है। तात्पस्थ यह कि यहाँ कर्म शब्द से की जानेचात्वी चीज ली गई , है, करना नहीं और यह बात शाखसिद्ध एवं विद्वत्सपत है।
[ ४५ ] इसका स्पष्ट अथ यह है कि “काव्य उस पदांव्ञी को कहते हैं, जिसमे, जे! कुछ हम फहना चाहते हैं, वह थोड़े मे पूर्णतया कह दिया जाय; न ते ज्यथे का विस्तार हो और न यही हे। कि जो बात कह रहे हैं, वही साफ साफ न कद्दी जा सके । दंढी ( छठी शताब्दी, अनुमित )
'क्षाव्याद्श!!कार आचार्य 'दंडो? का भी, जिनको कि प्राचोन आचार्य्यो' मे माना जाता है, प्राय: यही काव्य-लक्षण है। उन्होंने भ्रमिपुराण के लक्षण मे से 'संक्षेपाद् वाक््यस्? इस भाग फो निकालकर केबल उसकी व्याख्या को ही स्वीकार किया है; पर देने मे भेद कुछ भी नहीं है। वे कहते है-- “शरीर ताबद्ष्टिथेव्यवच्छिन्ना पदावल्षी [?
रुद्र॒ट ( वामन' से पूर्व )
इनके बाद आलंकारिक-शिरोमणि रुद्र का समय आता है। उन्होंने अथवा उनकी पूर्ववर्ती किसी आचाये ने, अपनी सूक्ष्म दृष्टि से, एक गहरी बात साोची है। बह यों है--
हम पहले कह आए हैं कि काव्य शब्द का वास्तविक अथे कवि की कृति है। अब सोचिए कि कवि जिस तरह
३--यद्यपि रुद्वृद का समय पूरतया निश्चित नहीं हो सका है, तथापि अल्लंकारसघैरुवकार ने, जे कि काव्यप्रकाशकार से ग्राचीन हैं उन्हे वामन से प्राक्तन आराचायों मे समझा है, लो हमने भी वही समय स्वीकृत किया है ।
[ ४६ | शब्दों को ढंग से जोड़कर पद्यादिक के रूप में परिणत करवा है, उसी तरह वह जिन अर्थों का वर्णन करता है, उनको भी आवश्यकतानुसार नए साँचे में ढा्न देता है। यही क्यों, यदि यथाथे में सोचे ते यह कहा जा सकता है कि कवि के वर्णन किए जानेवाले पदार्थ उसी के द्वोते हैं, वे ईश्वरीय सृष्टि के वास्तविक पदार्थों से पृथक् एवं केघल कविकल्पनाप्रसूत होते हैं। सच पूछिए ते! ऐतिहासिक सीता-शकुंतल्ञा से भवभूति और कालिदास की सीता-शकऊंतला निराली हैं। शसी अकार कालिदास का हिमाज्ञय और श्रीहृृर्ष का चंद्र भी लौकिक हिमालय और चंद्र से विजक्षण हैं। थेड़ा और सोचिए; सीता-शक्कुंतला आदि का ते इतिहास से कुछ संबंध भी है, पर भवभूति के “माल्तीमाधव” को लीजिए; वह नाटक नह्वीं प्रकरण है; और यह सिद्ध है कि प्रकरण का कथानक कहिपत होता है। अब बताइए, उसमे जिन माक्तती, माधव तथा पन्यान्य पात्रों का वर्णन है, उन्हें किसने उत्पन्न किया ! विवश द्वोकर यही फहना पड़ेगा--कवि ने। बस ते इसी बात को अन्यत्र भी लगाइए और समम्तिए कि कवि के वर्गनीय श्रथे मानस होते हैं, वास्तविक नहीं; अतः शब्दों की तरह वे भी कवि की कृति ही हैं। अतएवं अग्निपुराण के ही शब्दों को लेकर ध्वन्यात्रोेक मे लिखा है-- अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्व” तथेद॑ परिचत्त ते ॥
[ ४७ |]
अर्थात् काव्यरूपी जे अनंत जगत है, उसमे कवि ही प्रजापति है--उस जगव् का सृष्टिकर्ता वहां है, डढसे जिस तरह का संसार पसंद द्वोता है, इस जगत् को उसी प्रकार बदल जाना पड़ता है|
अरब तक जो केवल शब्द ( पदावली ) को काव्य कहा जाता था, वह उन्हें न जँचा और उन्होंने उसके साथ अर्थ को भी जोड़ दिया । उन्होंने कद्दा-- ननु शब्दार्था काज्यस् |” तात्पये यह कि रुद्रट के, अथवा रुद्रट और दंडी के मध्य के, समय मे पदावल्ली श्रौर उससे वर्णन किए जानेवाले अथे देनों फो काव्य कहा जाने लगा |
वामन ( नवम शताब्दी के पूर्वा्ध से पहले )
इनके अनंतर सुप्रसि दर भ्रालंकारिक वामन का समय आता है। यद्यपि सौंदययुक्त व्णेन को काव्य मानना अ्रिनिपुराण के समय से ही प्रचश्तित हो गया है; यह बात उसके लक्षण से पूणेतया सिद्ध न होने पर भी विवेचन से सिद्ध है; तथापि चामन फे समय से काव्य में सौंदर्य का प्राधान्य समझता जाने छगा। यह बात उनके अल्ंकार-सूत्रो से स्पष्ट दो जाती दे। वे कहते हैं--“काव्यं आह्यमल्ंकारात्” श्लौर “सैदयेमत्तंकार:”; जिसका तात्पर्य यह है कि काव्य छा प्रहण करना उचित है; क्योंकि उसमे सुंदरता द्ोती है ।
१---स्रष्टा प्रजापतिवंधा.? इत्यसरः ।
२---““पृष्टप्रतिवाक्ये ननुः” इति तट्टीक्ृकतठु नेमिसाधेहंदयम ।
[ ४८ ]
यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि वाभन के समय में काव्य की सुंदरता का कारण गुणों और अल्कारों को माना जाता धा। उन्होंने लिखा हो है---/'स देषगुणालंकारहाना- दानाभ्याम””; अथोत् बह सौंदये देषों के छोड़ देने और गुशों तथा अलंकारों के ग्रहण करने से होता है। अतएव बे पूर्वोक्त सूत्रों की स्वनिर्मित वृत्ति में काव्यज्कत्षणए” को विषय मे कहते हैं--काव्यशब्देप्यं गुणालंकारसंस्कृतयो: शब्दार्थयोरव॑र्ततेः-; अर्थात् जिन शब्दों और अर्थों" मे काव्य की पुट लगी हो, वे काव्य कहलाते हैं |
पर, उनके अंथ से यह भी स्पष्ट प्रतीत द्वोता है कि शब्द पर अथे के साथ “गुणों और अल्तकारों से युक्त' विशेषण उनकी अभिनव ही सृष्टि है; क्योंकि वे उसी के साथ लिखते हैं कि “भक्तगा तु शब्दाथमात्रवचने गृह्मते?। इसका तात्पय॑ यह होता है कि, भ्रव तक जे केवल शब्द और झ्थ” को काव्य कहा गया है, वह काव्य स्वरूप का वास्तविक विवेचन न होने के कारण कट्दा गया है, और झ्ब वह रूढ़ हे! गया है; पर उसे काव्य शब्द का मुख्य श्रथे नहों, कितु ल्ाच्षणिक अथे सममकना चाहिए। से वामन के सिद्धांत के अनुसार काव्य शब्द का श्रथे गुणा और अल्लंकारों से युक्त शब्द और हअधे” हुभ्रा ।
आन॑द्वधनाचाये ( नवम शताब्दी का उत्तराध )
इनके भ्रनंतर भावी व्यंग्यविवेचना के प्रथम प्रवत्तेक ध्वनिं- मसेज्ञ श्रो आानंदवर्धनाचाये ने काव्यत्नक्षण के स्पष्ट रूप मे ते
[ ४६ ] नहीं लिखा है; पर यह अवश्य स्वीकार किया है कि काव्य का शरीर शब्द प्लौर श्रथ है। वे एक प्रसड्ज में कहते हैं कि “शब्दा्थेशरीरं तावत् काव्यम् ।?? भेज ( ग्यारहवीं शताब्दी का उत्तराध )
इनके बाद संस्क्ृव-साहित्य के सुप्रसिद्ध प्रेमी धाराधराधी- श्वर महाराज भेज का नंबर आता है । यद्यपि उन्होंने स्पष्ट रूप से कोई 'काव्यत्षणः नहीं लिखा है; तथापि उनके “निर्देष॑ गुणबत् काव्यमलंकारैरलंकृतम् | रसान्वितं कविः कुबेन कीर्ति प्रीतिंच विदति ।? इस सरखतीकंठामरणत्थ पद्म से यह सिद्ध होता है कि थे भी> शब्द श्रौर श्रथे 'देनेो को ही काव्य मानते हैं। क्योकि एक तो उन्होने जो काव्य को 'रसान्वितम! विशेषण दिया है, वह अथे का काव्य माने बिना ठीक ठीक नहीं घट सकता; क्योंकि रस का साज्ञात् अन्वय फेवल शब्दें से नहीं हो सकता। दूसरे अलंकार:? से भी उन्हें शब्दालंकार भार अथेलंकार देनों अभीष्ट हैं; से भअ्रथ को काव्य माने बिना अर्थालंकार अलंकूत किसे करेंगे १
मम्मट ( बारहवीं शताब्दी )
अब शभ्रागे चलिए। आगे अलंकारिक जगत् के देदी- प्यमान रत्न महामति मम्मटाचाये का स्थान है। उन्होंने वामन .._ --वामनाचारय झज्कीकर ने काब्यप्रकाश की भूमिका मे जो यह.
लिखा है--“निर्दोष॑ गुणारंकाररसवद् वाक्य काव्यमिति मोजसतस्र?” से अतीत होता है कि पुरःस्फूत्तिक है )
[ ५० ]
के मत को अपनी आल्ोचनात्मक दृष्टि से देखा। बामन का शगुणसहितः कहना ते उनकी समझ्त मे आया; पर अल्ंकारों पर उतना जोर देना उन्हें न जैंचा । बात भो ठीक है; काव्य मे अलंकारे| का अनिवाये दोना सर्वथा आवश्यक भी नहीं है । से। उन्होने कहा कि “सब जगह अलंकार रहें; पर यदि कहीं वे स्पष्ट न भी रहे; तथापि देषरहित और गुणसदहदित शब्द झऔर अ्रथे को काव्य कहा जाना चाहिए”? |
वाग्मट ( बारहवीं शताब्दी, मम्मट के पीछे )
पर, पीछे के विद्वानों का ध्यात, ध्वनिकार फे सिद्धांतों का प्रच्छा प्रचार हो जाने के कारण, काव्य फे जीवन रस की प्रेर गया। वाग्मट ने देखा, वामन गुणों और अलंकारों सहित शब्द और अथे को काव्य, और “रीति! को काव्य का आत्मा मानते हैं, और काव्यप्रकाशकार देषरहित श्रौर ग़ुणसहित शब्द और अथे को काव्य कहते हैं; तथा रस को काव्य का झ्रात्मा कहते हैं; ते ल्ञाओ! हम इन सभी को लिख डाले। इसलिये उन्होंने “गुण, भ्रल्ंकार रीति गऔर रससहित तथा देषरहित शब्द और झर्थ!ःः को काव्य कहना शुरू किया।
पीयूपवर्ष ( बारहवीं शताब्दी का उत्तराध )
इधर पीयूषवष ( चद्राल्लेककार जयदेव ) तो और भी बढे। वे ते देोषरहित एवं लक्षण, रीति, गुण, अलंकार,
[ ५१ | रस और वृत्ति--इन सबसे सहित वाणी को काव्य कहते छगे। अर्थात् अब तक जो कुछ उत्कर्षाधायक, जीवनदायक अथवा शोभाविधायक धमम उन्हे दिखाई पड़े, उन्होंने उन सबका वाक्य के साथ मे लगाकर एक लंबा लक्षण बना डाज्ञा। पर, ग्रह बात एक प्रकार से मानी हुई दी है कि उनका लक्षण-निर्माण सरक्ष और हृदयज्ञम होने पर भी उतना विवेचनापूर्ण नहीं है। वही बात यहाँ भी हुई है | विश्वनाथ ( चैदहवीं शताब्दी )
विक्रम की चैादहवीं शताब्दी से काव्यज्षक्षण का रुख फिर से बदला शऔर उप्तकी लंबाई को कम करने का यत्न होने क्गा | जहाँ तक हम समभते हैं, सबसे पहले, सुप्रसिद्ध निर्बंध साहित्यदप॑ण' के रचयिता महापात्र विश्वनाथ ने उसे कम किया और कद्दा कि “जिप्तकी जीवनज्योति रस-भाव आदि हैं, जो इन्हों के द्वारा चमत्कारी होता है, उस वाक्य का नाम काव्यः है? । उनका अभिप्राय यह है कि वाक्य मे चाहे प्रतंकार झादि कोई उत्कर्षाधायक वस्तु न हो और दोष भी हों, तथापि यदि उससे रस, भाव और उनके आभासों की अभिव्यक्ति द्वाती हो, ते। उसे काव्य कद्दा जा सकता है
यह बात कुछ नवीन नहीं, बहुत पुरानी है। शौद्धो- दनि नामक एक आचाये ने इस बात को बहुत पहले ही लिख दिया था, महापात्रजी ने प्रायः उसी को उठाकर लिख दिया है। यह बात केशव सिश्र के अलंकारशेखर” से स्पष्ट हो
[ ४२ ]
जाती है। वे कहते हैं--.'अल॑कारसूत्र-कार भगवान शौद्धो- दनि ने काव्य का खरूप यों लिखा है--“कार्व्य रसादि- मद्गाक््य श्रुत सुखविशेषज्षत् ।”” अर्थात् जिस वाक्य में रस झादि हों, उसे 'काव्यः कहा जावा है। 'रस आदि? में जे। आदि? शब्द है, उससे उन्होने (केशव सिश्र ) अलंकार का अहण किया है और कहते हैं कि रस अथवा अलंकार दोनों में से एक के होने पर वाक्य को काव्य कह्दा जा सकता है। पर साहित्य- दर्षणकार को अलंकारमात्र के होने पर काव्य मानना अभीष्ट नही; भरत: उन्होने आदि शब्द को उड़ा दिया और केवल 'रस? शब्द लिखकर उससे रस भाव-आदि आस्वादनीय व्यंग्यों का अद्दण कर लिया है|
गेदिंद ठक्कुर ' (सेलहवीं शताब्दी का उत्तराध, अलुमित )
तदनंतर काव्यप्रकाश” के भर्मज्ञ काव्यप्रदीप'-कार श्रोगेविंद ठकुर का समय आता है। उन्होंने 'काव्यप्रकाश' के लक्षण का विवेचन करते हुए यह लिखा है कि--काव्य- प्रकाशकार को रस-रहित होने पर और अलंकार के स्पष्ट न इंने पर भी शब्द और अथे को काव्य मानता अभीष्ट है।
पर यह उचित नहीं। क्योकि जहाँ रस न होगा और अर्त॑-
१--ये यद्ञपि व्याख्याकार है, तथापि हम इन्हें आचारयों में मानते है और हमे विश्वास है कि पदीप' के सर्मज्ञों को इससे विश्नतिपत्ति नहीं हा सकती ।
[ ५३ |]
कार भी स्पष्ट न होगा, ते वताइए, वहाँ चमत्कार किसका होगा ! श्र काव्य मे चमत्कार ही असली चीज है, यदि वहो न रहा, वे उसे काव्य कहा ही कैसे जायगा ? अतः यह मानना चाहिए कि जहाँ, रस हो, वहाँ यदि अल्लंकार स्पष्ट न हो, तथापि शब्द और भ्रथ को काव्य कद्दा जा सकता है; पर जहाँ रस न हो वहा पअलंकार का होना आवश्यक है! से रस और अलंकार--इन दोनें मे से किसी एक से भी युक्त शब्द और अथे को काव्य कहा जानो चाहिए। इनका यह लक्षण प्राय: केशव मिश्र के लक्षण से मित्ञ जाता है |
पंडितरान ( सत्रहवीं शताब्दी ) इनके अन॑तर अनुपाद्य पंथ के निर्माता मार्मिक ताकिक श्रीपंडितराज का समय है । उन्होने इस' विषय मे जे| मा्मिकर विवेचन किया है, वद्द ते झापके सामने है श्रौर उस पर जो इस अकिच्चित्कर की टिप्पणी है, वह भी झापके सम्मुख है। अत: इस विषय मे अधिक लिखकर हम भ्रापका समय व्यथथे नष्ट नही करना चाहते ।
उपसंहार जहाँ तक हमारा ज्ञान है, हम कह्ट सकते हैं कि पंडित- राज के अ्रनतर इस विषय का भार्मिक विवेचन किसी ने नहीं किया। अ्रतएब इसी लक्षण को अंतिम समझकर
[ ५४ ]
इम पूर्वोक्त लक्षणों का सिद्दावतोकन करते हुए इस विषय को समाप्त करते हैं--
यह कहट्दा जा चुका है कि वेदादिक के समय मे 'किसी भी अर्थ के वर्णन! को कान्य कहा जाता धा। उसके अंतर, पुराणों के समय में, लक्षण के प्राय: प्राचोन रूप मे रहने पर भी' 'कविकल्पित सुंदर अथे के सौंदियेयुक्त वर्णन! को द्ाब्य माना जाता था। यह वात अम्निपुराण के पाठ से पूण॑तया सिद्ध द्वो जाती है; क्योंकि उसके लक्षण में सौंदर्य पर इतना जार न दिया जाने पर भी, पदार्थों के वर्णन के लिये जिस सौंदय का संपादन अपेक्षित है, उसका उसमे बिश्तृत विवेचन किया गया है। यह मत संभवतः दंडी तक चलता रह्दा |
तदनंतर रुद्रट, अथवा उनके (र्ववर्त्ती किसी आाचाये, के समय से मुंदर प्रथे प्रौर उसके सौंदर्ययुक्त वर्णन” का नाम
१---अग्निपुराण? में ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी प्रवंध ( आख्या- यिका आदि ) के अनुरूप वना लेने की अनुमति है। और थोड़ा भी फेर-फार होने पर ऐतिहासिकता नष्ट हे! जाती है, क्योंकि इतिहास में कल्पना को किंचित् भी स्थान नहीं। अतः हमने अर्थ को “कवि कर्पित'! विशेषण छूयाया है। इसी---अर्थात् चर्णनीय अर्थों को इच्छानुसार चित्रित कर डालने के ही--कारण, हमने, कान्य से वर्णित ऐतिहासिक और अ्नेतिहासिक सभी अथे का 'कल्पितः माना है क्योंकि वे यथास्थित पदाथों से श्यक् हो जाते हैं। से इस विशेषण को काब्यकक्षण” में सवेत्र अहुस्यूत समम्तिए।
[ ५४ |] ' काव्य हुआ। बाद मे, वामन के समय से, 'सैंदियेपूर्ण अथे और उसके सौद्यपूर्श वर्णन” को काव्य कहा जाने छगा। _धामन झऔर उनके पूर्व के समय में शब्द और अथे दोनें के सौंदय का कारण गुणों और अलंकारों का ही माना जाता था । उनके बाद आनंदबर्धनाचाये के समय में सौंदये का पूरेतरया अन्वेषण हुआ, और तब सौंदय के मूल कारण “रस? का प्राघान्य दे! जाने के कारण, अछ्षकारों का आझादर कम हो गया । काव्यप्रकाशकार ने अल्लंकारों को गै।णश कर दिया और गुणों को केवल रस का धर्म मानकर उनको भमिव्यक्त करने- वाली रचना का अधिक सम्मान किया। उनके द्विसाब से रस कर रचना सौंदर्य का प्रधान कारण थे और भल्तंकार अ्प्रधान। तदनुसार वे भी 'सौंदर्यपूरे अथ और उसके सैंदर्यपू्ण वर्णन” का काव्य मानने ज्गे । वाग्भठ और पीयूषवर्ष के लक्षण उतने ज्योदक्षम नहीं हैं; अतः उन पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है | साहित्यदपणकार सौंदयेपूरं झथे को काव्य नही मानते; कितु उसके वर्शनमात्र को काव्य मानते हैं; भौर सैंदय का कारण एक मात्र रस को समझते हैं। ये महाशय पर्णन के सौंदये को आवश्यक सानते हैं; पर भ्रनिवायें नहीं। पअ्रतएवं इनके हिसाब से वर्णन की निर्देषता श्रौर सालंकारता स्वधा अपेक्षित नहीं । यही बात पंडितराज के बिषय में भी समझ लीजिए | परंतु पंडितराज के तर्क इस विषय मे इनकी अपेक्षा ठोस हैं ।
[ ५६ |
केशव मिश्र और गेविद ठक्कुर दोनों ही सांदय का कारण रस और अलंकार दोनों को मानते हैं। पर पहले महाशय साहित्यदर्पण के समान 'सीदयेपूर्ण भ्रथे के वर्णन! को काव्य मानते हैं, और दूसरे काव्यप्रकाश फे अनुयायी होने के कारण 'सैदयपूर्ण अर्थ और उसके सौंदयेपूर्ण वर्णन? देने को काव्य मानते हैं ।
उनके बाद पंडितराज ने भी '"सैौंदर्यपू् भथे के वर्णनः को काव्य माना है; पर वे समग्र सौंदये की मूलकारणता एक रस को ही दे देना उचित नही समझते । उनका कहना है कि चाददे जिस किसी अर्थ के ज्ञान से हमे प्रतैकिक भानंद, वद्द थोड़ा हो। या तन््मय कर देनेवात्ना हो, प्राप्त हे जाय, वह प्रत्येक अथ सौंदर्य का कारण हो सकता है। उसका रस के साथ स्वधा संबंध होना आवश्यक नही
रही हमारी टिप्पणी । से हमसे और पंडितराज से केवल इतना द्वी मतभेद है कि हम केवत्न वर्शन को ही कवि की कृति नहों समझते; किंतु काव्य मे वर्णित अर्थों को भी उसी की कृति मानते हैं, जेसा कि रुद्रर का मत लिखते समय हम सिद्ध कर आए हैं|
काव्य का कारण
यह ते हुई काव्य की बात । प्रब इसके आगे इस प्रंध मे काव्य के कारण का विवेचन दै। काव्य का कारण
[ ५७ ]
प्रतिभा, जिसे शक्ति भी कहा जाता है, है, इस विषय में ते आज दिन तक न किसी को विप्रतिपत्ति हुई और न आगे कभी हो सकती है। पर मतभेद एक ते इस बात मे है कि कुछ विद्वान केवल प्रतिभा को ही काव्य फा फारण मानते हैं और कुछ प्रतिमा के साथ व्युतत्ति श्रार अभ्यास को और जेोडते हैं। अर्थात् कुछ विद्वानों के हिसाब से काव्य का एक फारण है प्रतिभा; और कुछ के हिसाब से तीन हैं--प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास । प्रतिमा क्या पदार्थ है, यह विषय भी विवादप्रस्त है ।
श्रब देखिए, काज्य का एक कारण माननेवालों मे रुद्रट, वामन और पंडितराज आदि विद्वान हैं; प्रौर तीन माननेवाल्लों मे दंडी, मम्मट, वाग्भट और पीयूषबर्ष आदि हैं। अब इन विद्वानों फे विचारों को सुनिए औऔर उन पर एक आज्तोचना- त्मक दृष्टि डाल जाइए |
इनमे से प्राचोनतर आचाये दंडी का कहना है कि
नेसगिकी च॒ प्रतिभा, श्रुतं व बहु निर्मेठस, अमनन््दश्चाउमियोगोउस्या: कारण काव्यसंपदः ॥
पर्थात् खतःसिद्ध प्रतिभा, श्रत्यंत और निर्देष शाल- अवशण--अर्थात् व्युत्पत्ति, तथा अनल्प' अभ्यास--अर्धात्
३--अभियेगः पौनःधपुन्येनाइनुसन्धानम! इति बीकानेरराजकीय
' धुस्तकालयस्था लिखिता काब्यादुर्शब्याख्या। स चाउम्यास पवेत्यस्म- हुकओ&5थें न काचन विग्नतिपत्तिः ।
[ ८ ]
किसी प्रकार की कमी न करते हुए बार बार पद्म बनाते रहना, ये सब काव्य की संपत्ति---अर्थात् उसके उत्क्ृ७ होने के कारण हैं। पर साथ ही वे एक और बात कहते हैं, जे अवश्य ध्यान देने याग्य है। वे कहते हैं--
न॒विथते ययपि पूर्ववापनायुणाचुबन्धिप्रतिभावमद्ुुतम् ।
श्रतेन यस््नेन च वागुपासिता भुर्व॑ करोसत्पेव कमप्यनुअदस ॥
अर्थात् यद्यपि पूवेजन्म की वासना के गुण जिसके पीछे लगे हुए हैं वह संसार को चकित कर देनेवाली प्रतिभा नहीं है, तथापि शाक्षश्रवणश--अर्थात् व्युत्तत्ति और यक्न--अ्रधात् अभ्यास-- के द्वारा सेवन की हुई वाणी कुछ न कुछ अलुप्रह करती ही है। इससे यह पअपिप्राय निकलता है कि यद्यपि काव्य के उत्कृष्ट होने के लिये खाभाविक प्रतिभा, व्युत्पत्ति और प्रभ्यास तीनों आवश्यक हैं, पर यदि वैसी प्रतिभा न हो, तथापि यदि व्युत्पत्ति और भ्रभ्यास का बल्ञ उत्पन्त किया जाय ते काव्य बनाया जा सकता है। सारांश यह्द कि विशिष्ट प्रतिभा, व्युत्पात्ति और भ्रभ्यास उत्कृष्ट काव्य के कारण हैं; पर साधारण प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास से भी काव्य वन सकता है।
इनके अनंतर रुद्रट एक शक्ति (अतिभा) को ही काव्य का कारण मानते हैं प्र उसका विवेचन करते हुए यें लिखते हैं---
मनसि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणमनेकधा<मिघेयस्थ, अकिप्टानि पदानि च विभान्ति यस्याससी शक्ति- |
[ ५८ ]
अर्थात् जिसके होने पर, अच्छी तरह एकाग्र किए हुए मन में अनेक प्रकार के भ्रर्थों की रफ़्त्ति होती है, और अद्धिष्ट अर्थात् सरत और सुंदर पद सूक पढ़ते हैं, उसका नाम शक्ति है। फिर वे आगे लिखते हैं कि
सहजोत्पाद्या च सा द्विधा भवति। उत्पादा तु कथन्लिद् व्युत्पत्त्या जन्यते परया |
अर्थात् वह शक्ति दो प्रकार की होती है---एक सहज--- प्र्थांत् खत: सिद्ध, भर दूसरी उत्पाय--प्र्थात् उत्पन्न की जानेवाली। उनमे से सहज शक्ति ते इंश्वरदत्त अथवा प्रदृष्टजन्य द्ोती है; भ्रतः उसके विषय मे तो कुछ कद्दना है नहीं; पर जो उत्पाद शक्ति है, वह श्रत्यंत उत्कृष्ट व्युत्पत्ति से वत्पन्न की जाती है। इससे यह सिद्ध द्वोता है कि प्रतिभा दे तरह की है; जिनमें से एक का कारण प्रद्टष्ट है और दूसरी का व्युत्पत्ति |
उनके बांद वामन ने भी काव्य का कारण केवल प्रतिभा को दी भाना है। वे लिखते हैं कि “कबित्वबीज॑ प्रतिभा- नम?” और उसका विवरण यों करते हैं कि “कवित्वस्य बीर्ज संस्कारविशेष: कश्नितृ; यस्माद्विना काव्य न निष्पद्मयते, निष्पन्ल वा हास्यायतन स्यात्?? | प्रर्थात् कविता का कारण एक विशेष प्रकार का संस्कार है, जिसके बिना काव्य नही बन पाता, अथवा यों कहिए कि बना हुआ भी हँसी का पात्र होता है, उसे सुनकर लोग उसकी खिल्ली उड़ाते हैं ।
[ ६० ] अब आगे काव्यप्रकाशकार मम्भटाचार्य हैं। वे कहते हैं-- शक्तिनि पुणवा लेकशास्राब्याद्यवेत्तणात् । काव्यज्ञशिक्षयाउभ्यास॒ इति हेतुखदुऋवे ।। अर्थात् शक्ति ( प्रतिभा ) और ज्ञोकज्यवह्दार तथा शान ओऔर काव्यादिकों के विमशे से उत्पन्न चुई निपुणता --अर्धात् व्युत्पत्ति, एवं जो ज्लोग उत्कृष्ट काव्य का बनाना और विचारना जानते हैं, उनकी शिक्षा से अभ्यास; ये तीनों सम्मिद्षित रूप से काव्य के कारण हैं। सारांश यह है कि काव्य का फारण तीन वस्तुएँ हैं--शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास । इस श्लोक को हम यदि “सलैसर्गिकी च प्रतिभा *'***? इस पूर्वोक्त दंडी के श्त्ोक का सुसंस्क्रत अनुवाद कहे वे मर्मज्ञ विद्वानों को कुछ भी विप्रतिपत्ति न हांगी। हाँ, इतनां अवश्य है कि मम्मठ ने अपनी व्याख्या मे व्युत्पत्ति और भ्रभ्यास का अच्छा विवेचल किया है। पर प्रतिभा की व्याख्या करते हुए उन्होने जे शब्द ख़िखे हैं, वे ते ज्यों के त्यों वामन के कह्दे जा सकते हैं। से इसे दंडी और वामन देनें के अभिप्रायों का संकन्नन कहे ते। कोई अत्युक्ति न होगी । बाग्मट लिखते हैं-. प्रतिभा कारणन्तस्य, व्युत्पत्तिस्तु विभूषणम् । अशेत्पत्तिकृदस््पाल इत्यादि कविसकथा ॥ अर्थात् प्रतिभा काव्य को उत्पन्न करती है, व्युत्पत्ति उसको सुशोमिव बनाती है और अभ्यास उसकी उत्पत्ति को बढ़ाता है,
[ ६१ ] इत्यादि कवि ल्लोगों का कथन है। तात्पय यह कि काव्य का, प्रतिभा उत्पादक, व्युत्पत्ति सैंदर्याधायक भ्रथांत् पोषक और अभ्यासवर्धक कारण है। इसी बात को पीयूषवर्ष ने दृष्टात देकर स्पष्ट कर दिया है। बे कहते हैं-.. प्रतिभेव भ्रताभ्याससह्विता कवितां प्रति। हेतुस दुग्जुसंबद्धबीजोत्पत्तिछंतामिव ॥ अर्थात् ब्युत्पत्ति झौर भ्रभ्यास सहित प्रतिभा कविता का कारण है; जिस तरह कि मिट्टो भार जल से थुक्त बाज की उत्पत्ति ता का । इसका तात्पय यह है कि जिस तरह लता का बीज उत्पादक, मिट्टी पोषक प्रौर जज्न वर्धक कारण है, उसी तरह प्रतिभा, व्युत्पत्ति मार भ्रभ्यास काव्य के कारण हैं । पंडितराज का कथन यह है कि कविता का साक्षात् कारण एकमात्र प्रतिभा है, व्युत्पत्ति और शअ्रभ्यास उसके साज्ञात् कारण नहीं, कितु परंपरा से हैं। अर्थात् व्युत्पत्ति और अभ्यास काव्य के पोषक और वध्धक नहीं, कितु प्रतिभा के पोषक और वर्धक हैं श्रेर उसको पुष्ट तथा विवर्धित करके काव्य का उपकृत करते हैं ।
प्रतिभा क्या वस्तु है !
अच्छा, अब इन सब विचारों पर एक पझ्ालाचनात्मक दृष्टि डालिए। सबसे पहले यह सोचिए कि प्रतिभा है
[ इं२ ] क्या पदाथे ९ वास्तव मे प्रतिभा एक्क प्रकार की बुद्धि का नाम है। अ्रतएव यह कहा जाता है-- वुद्धेनेवनवोन्मेपशालिती प्रतिभा मता ।
अर्थात् जिसमे नई नई सूक हो।ती है, उस बुद्धि को प्रतिभा माना जाता है ।
श्रब यह देखिए कि साहित्य के प्राचीन आचारयीं ने प्रतिभा अथवा शक्ति का क्या अधे किया है? दंडी ते इस विषय मे कुछ विशेष लिखते नहीं, पर उनके दिए हुए प्रतिभा के विशेषणों से कुछ सिद्ध हो जाता है, जिसे हस झागे लिखेगे । हाँ, रुद्रट ने 'शक्ति” की व्याख्या अ्रवश्य की है, जो पहले लिखी जा चुड्ली है। उससे यही सिद्ध होता है कि वे एक प्रकार के संस्कार को शक्ति मानते हैं; क्योंकि उनके हिसाब से 'शक्ति? वह पदार्थ है, जे कविता के अ्रनुकूल् अथो श्रौर शब्दों की स्मृति का निमित्त है। इनके बाद वामन और सम्मट ने ते! स्पष्ट शब्दों मे एक प्रकार के संस्कार का नाम शक्ति! खोकार किया ही है।
अब देखिए, संस््कार क्या वस्तु है ? वास्तव मे संस्कार एक प्रकार का खतंत्र गुण है, जिसे पूर्वेजन्म के ज्ञान की वासना कह सकते हैं। पर 'काव्यप्रदीप! के संस्कारविशेषः? शब्द की व्याख्या फरते हुए नागेश ने “उद्द्योतः मे लिखा है कि शक्ति शब्द से यहाँ एक विशेष प्रकार का अद्ृष्ट ( पूर्व- जन्म के कर्मों का फल ) लिया गया है। वे लिखते हैं कि
[ ६३ ]
“देवताराधघनादिजन्य विज्क्षयादृष्ट 'शक्तोति काव्यनिर्मा- शायाप्नये'ति योगाच्छक्तिरित्युच्यते !!ः अथांतू व्याकरण की रीति से शक्ति शब्द का अथ “जिसके द्वारा कांव्य बनाया जा सकता है? यह द्वोता है, तदनुसार देवता के आराधन आदि से उत्पन्न अद्ृष्ट को शक्ति” कहा जाता है। पर दंडी और रुद्रठ जिसे प्रतिभा और शक्ति कहते हैं, उसका और नागेश की व्याख्या का परस्पर कुछ भी मेल नही मिल्वता। देखिए, दंडी ने अपने पद्मयो मे प्रतिभा को दे! विशेषण दिए हैं, जिनसे उनका अ्रभिप्राय स्पष्ट हे जाता है कि वे किसे प्रतिभा मानते हैं। उनका एक विशेषण है “ैसर्गिकी! शऔर दूसरा है, 'पू्ववासनागुणाहुवंधि?; जिनका अथे हम पहले कर आए हैं। श्रव सोचिए कि नागेश के कथनानुसार यदि 'संस्कार- विशेष! का अथे अदृष्ट माने तो उसे स्वाभाविक विशेषण देना व्यू है; क्योंकि अदृष्ट ते पुरुष के प्रयज् से उत्पन्न होता है, फिर वह स्वाभाविक कैसा ? दूसरे, उनका 'पूर्ववासनागुणाजु- बंधि? विशेषण भी घटित नहीं दे सकता; क्योंकि अद्ृष्ट ते पूर्व कमों के फल्व का नाम है, से वह पूर्वजन्म क॑ संस्कार से उत्पन्न गुणों का अ्रनुगामी नही, किंतु जनक हे। सकता है | इस कारण, इनके हिसाब से ते। प्रतिभा? का अथे एक प्रकार की बुद्धि ही दे सकता है, न किसी प्रकार का संस्कार और न अद्दष्ट अब रुद्रट की तरफ चलिए | बे प्रतिभा को सहज और उत्पाद्य दे तरह की मानते हैं, और उत्पाद प्रतिभा को व्युत्पत्ति
[ ६४ ]
के द्वारा उत्पन्न होनेवाली मानते हैं। क्या आप कह सकते हैं कि व्युत्पत्ति से भी कोई अदृष्ट उत्पन्न होता है और वही प्रतिभा है ? यदि नहीं ते बात दूसरी ही है। हमारी समझ में ते वामन और मस्मट के सिस्कारविशेष” शब्द का अथे पृेजन्मीय वासना मानना ही उचित है। दंडी भी ते इनके सर्वथा अनुकूल नही; क्योंकि वे प्रतिभा का 'बासना? नही, कितु 'वासनाशुणानुबंधि! मानते हैं। रहे रुद्ठट, से! उनकी इनकी भी राय एक नहीं हे सकती, क्योंकि वे ते उसे इस जन्म मे भी व्युतपत्ति फे द्वारा उत्पन्न हे सकनेवालो मानते हैं, केवल्न सहज ही तनहीं। इस प्रकार इनका मत मिलता नहों है। यह ते हुआ इन ज्ञोगों का आपस का मतभेद। अभ्रव आप यह सोचिए कि वास्तव मे काव्य बनाने मे कवि को कया करना पड़ता है ? इसका उत्तर यद्दी होगा कि सुंदर पदों श्र अर्थां की योजना तथा कल्पना । श्रब आप थोड़ा सा विचार करते ही समझ सकते हैं कि यह काम बुद्धि से होता है। न ते वह हमारी मेग्य वस्तुओं की तरह हमें अदृष्ट के द्वारा सिद्ध रूप मे प्राप्त होता है श्र न संस्कार से ही बन सकता है । तात्पये यह कि यह काम बिना बुद्धि के नहीं हो सकता | अदृष्ट और संस्कार यदि कारण हो सकते हैं, ते हमारी बुद्धि को वैसी बनाने के कारण हो सकते हैं, स्वतंत्रतया काव्य के नहीं हो सकते। तब .यदि प्रतिमा को काज्य का कारण मानना है, ते उसके सुप्रसिद्ध अथ 'तवनवोन्मेषशाल्िनी बुद्धि!
[ ६५ |
को ही उसका अथ खीकार करना पड़ेगा, संस्कार भ्थवा अद्ृष्ट को नहीं ।
इस संबंध मे पंडितराज कितना भ्रच्छा कह रहे हैं। वे कहते हैं कि काव्य बनाने के पमुकूल शब्दों और अथी की उप- स्थिति (याद आ जाने ) का नाम प्रतिभा है, जे आपकी वही 'तवनवे।न्मेषशालिनी बुद्धि? हुईं। श्रौरयह भी कहते हैं कि उसको बैसी बनाने का कारण कहीं भरृष्ट देता है और कही व्युत्पत्त और भ्रभ्यास, जे। अठुभव-सिद्ध है । भ्रव इस विषय का शेष विवरण भाप श्रतुवाद श्र उसकी टिप्पणी मे देख सकते हैं |
काव्यों के भेद
इसके भागे प्रस्तुत पुस्तक मे काव्यों के भेशें का वर्णन है; पर उनके विषय मे हमे विशेष नही लिखना है; क्योंकि, इस विषय मे प्रधिक मतभेद नहीं है। जहाँ तक हमारा ज्ञान है-..._इस विषय का विशेषरूपेण विवेचन ध्वन्याल्रोक' के तात्पर्यानुसार काव्यप्रकाशकार ने ही किया है। उन्होंने काव्यों के तीन भेद माने हैं; ध्वनि, गुणी भूत व्यंग्य और चित्र; जिन्हें उत्तम, मध्यम और अधम भी कद्दा जाता है ।
पर साहित्दप॑णकार ने इनमे से पहले दे भेदों फो ही काव्य माना है; वे 'चित्रकाव्य' को काव्य मानना नही चाहते। इसका कारण यही है कि वे रस आदि के झ्रतिरिक गुणों और अलंकारों को सौंदये का कारण नहीं मानते; जैसा कि हम
कु
[ इ६ ]
'काव्यलक्षए? के विवेचन से दिखा ध्राए हैं। पर यह बात ठोक नही; क्योकि, लक्ष्य के अठुसार लक्षण हुआ करते हैं, सत्तण के अनुसार लक्ष्य नहों। जब कि सारा संसार भ्राज दिन तक केवल गुणों और अलंकारों से युक्त वन को भी काज्य सानता चल्ना आया है कर आज भी वही परिपाटी प्रचत्षित है, तब आप उन्हें काव्यसेशं मे से कैसे निकाज्न सकते हैं? हॉ, यह हे सकता है कि आप उन्हे अ्रधप अथवा उससे भी नीचे दरजे का मान ले |
“चित्रमीमांसाकार” ने काव्यप्रकाश” के भेदें को ही लिखा है, उनमे किसी प्रकार की न्यूनाधिकता नहों की है।
इनके बाद पंडितराज ने इस विषय पर कलम उठाई है । उन्होने कोव्यप्रकाशकार के भेदें मे एक भेद और बढ़ाकर उन्हें चार कर दिया है, जिसे आप अनुवाद से देख लेगे। हा, इतना कह देना आवश्यक है कि पंडितराज ने जो एक भेद बढ़ाया है, वह सार्मिक है, काव्यो के मेदे को समभूनेवाले उसका किसी तरह निषेध नहों कर सकते । दूसरे, काव्य- प्रकाशकार की अपेक्षा इन्होंने उसे विशद् भी अच्छा किया है पैर अप्पय दीक्षित के साथ शास्मार्थ करके ध्वनि का सर्म सममभने की शैज्ी भो स्पष्ट कर दी है।
रस
अब रसे की ओर ध्यान दीजिए। यह इतना गंभीर
विषय है कि इस पर झाज तक अनेक विद्वानों ने विचार
[ ६७ ] किया है और आगे भी न जाने कहाँ तक होता रहेगा। परंतु हम प्रस्तुत विषय की ओर चत्नने के पहले आपसे नाटकों ( दृश्य* काव्यों ) की उत्पत्ति के विषय में छुछ कहना चाहते हैं। इसका कारण यह है कि रस का असुभव, श्रव्य- काव्यों की अपेक्षा, दृश्य-क्ाव्यों मे ही स्पष्ट रूप से होता है। झतएवं आज दिन तक उन्हों को लेकर इस विषय का विवेचन किया गया है | , जब किसी भी प्राणी को इष्ट (जिसे धह चाहता है, उस ) की प्राप्ति और अनिष्ठ ( जिसे वह नहीं चाहता, उस ) की निवृत्ति होती है, ते! उसके अंगो में अपने-आप ही एक प्रकार की स्फूत्ति उत्पन्न हो जाती है। भ्रथांत् प्रकृति का नियम है कि आंनेंदित प्राणी के अग-उपाँग विचलित हो उठते हैं। जे प्राणी गंभीर होते हैं, उनमे वह स्फूत्ति केबल मुख-विकास नेत्र-विकास आदि ही करके रह जाती है। पर, जो इतने गंभीर नहीं होते, वे ऐसी घटनाओ्रों के होते ही एकदम उछल पढ़ते हैं, और उनका वह अ्ानंद इस तरद्द सव पर प्रकट हो जाता है। परिणाम यह होता है कि वह प्रानंद उस व्यक्ति
१--काब्य की पुखके दे। विभागों मे विभक्त है--एक दृश्य और दूसरे श्रच्य । इश्य-काच्य उन्हे कहते है, जिनमे वरणि'त चरितन्नो का अभिनय किया जाता है--जैते शाकृुन्तल आदि। और अ्रन्य-काव्य उनका नाम है, जिनका अभिनय नहीं होता, किन्तु लोग उसे सुनकर डी आनन्द बढ लेते हैं--जैसे रघुचंश आदि |
[ ६ं८ ]
तक ही सीमित नहीं रहता, कितु जे! ल्लोग उसके सुहृत्, संबंधी अथवा हिंतैषी होते हैं, जिनमे हैरष्या-द्वेष की प्रवृत्ति उस आनंद के अनुभव का प्रतिबंध नहीं करती, वे भी आजनंदित है। उठते हैं, मैर उससे सहालुभूति प्रकट करने लगते हैं। बच्चों में यह बात बहुत स्पष्ट रूप से देख पड़ती है। यही उछल-कूद नाव्य की आादि-जननी है। शुरू शुरू में इष्टप्राप्ति श्रथवा अनिष्टनिव्वत्ति के समय उसका प्राप्त करनेवाल्ा और उससे सहा- नुभूति रखनेवाले लोग इसी तरह उछल्न-कूद किया करतें थे।
पर, प्रकृति का एक नियम और है। मलुष्य का वास्त- विक वस्तुओं के देखने मे जो आनंद प्राप्त होता है, उससे कद्दी अधिक उसका अनुकरण देखने मे प्राप्त होता है। उदाहरण के लिये कल्पना कीजिए कि एक सिटरलू बनिया आपका पड़ोसी है, जिसे आप सदा'देखा करते हैं, श्रौर उसकी 'चाल- ढाज्ञ आदि को देखकर आपको कुछ कातुक भी हुआ करता है; पर उसके देखने मे आपको वह पझानंद नही आ सकता, जिसे कि एक भाड़ अथवा बहुरूपिया उन्हीं सेठजी की नक॒ण दिखलाकर अनुभूत करा सकता है।
इसके बाद एक बात और भी है। घह यह कि वास्तविक एवं बत्तेसान व्यक्ति के हर्पादि के अनुकरण मे हमे सददालुभूति भी नहों हे सकती । क्योंकि, उसके वत्तेमान होने से हमारा उसके साथ किसी न किसी अकार का राग-द्वेषमूलक संबंध दो जाता है; इसलिये उस अनुकरण को देखकर राग-द्वेष की
[ इईंड ]
प्रवृत्तियाँ जग उठती हैं, और वे सद्दाचुभूति मे, और कभो कभी ते अमिनय में ही, वाधक हे। जाती हैं, और बिना सहालुभूति के आनंद की अभिव्यक्ति देती नहीं। इस कारण, यदि किसी प्राचीन अथवा कलिपत घटना का अनुकरण किया जाय तो उस घटना से संवद्ध व्यक्तियों के साथ हमारा आधुनिक संबंध न होने के कारण हमे अभिनय के द्वारा उद्गोधित आनंद का यथाथे अनुभव हे। सकता है, क्योंकि पहा बाधक प्रवृत्तियों नहीं रहतों। अतएवं अंततेगत्वा मनुष्यों के मनोरंजन के लिये इस तरह के अनुकरणमूलक अभिनय होने छगे |
इन अमिनयों के लिये कवि लोग प्राचोन अथवा कटिपत घटनाओ्रों को पद्मादिवद्ध कर देते थे, जिससे वे और भी अधिक रोचक हो जायें, जेसे कि आज-कल भी कई-एक आसम्य खेल्लों मे होता है। इन्हीं अभिनयों का विकसित रूप हैं आपके दृश्य-काव्य कौर आधुनिक नाटक-ड्रामा आदि | बस, दृश्य- कान्यों की बात हम इतनी ही करेंगे; क्योकि हमारे इस प्रकरण से इसका इतना ही संबंध है।
१--प्रारंभ ही प्रारंभ मे लोग जब इन अ्मिनयों को देखने लगे तब उन्हे प्रमुभव हुआ कि इनमे कुछ आनंद अवश्य है। साथ ही उनमे से जे। लोग बुद्धिमान् और तकशील थे, उन्होंने सोचना शुरू किया कि इस नाट्य की बस्तुओं मे से यह झानंद किस वस्तु में रहता है। फिर क्या था, उसकी खेज
[ ७० | प्रारंभ हुई। वही वरतु साहित्य की परिभाषा मे 'रस्यते;सौ रस:” इस व्युत्पत्ति के द्वारा 'रस” कही जाती है। सोचते सोचते पहले पहल वे लोग स्थूल्न विचार के द्वारा इस परिणाम पर पहुँचे कि जिससे इम प्रेम आदि करते हैं, बह प्रेम आदि का झालंबन नट को प्रमिनय करते देखकर हमारे ध्यान मे आ जाता है, और उसका बार-बार अनुसंघान करने से हमे आनंद का अनुभव होता है; अत' वह प्रेम आदि का आलंबन--वह विभाव ही रख है। वे कहने छगे कि--भाव्यमाना विभाव एवं रसः”। प्र्थात् बार बार अनुसंधान किया हुआ प्रेम-भादि का श्राल्ंबन द्वी रस है। यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे नौवां है। २--पर, पीछे से त्ञोगें को इस बात के मानने से विप्रति- पत्ति हुईं। उन्होंने सोचा कि यदि प्रेम आदि का आलंबन ही रसरूप हो, ते! जब वह प्रेम-आदि के प्रतिकूल चेष्टा करे, प्रधवा प्रेम आदि के अनुकूल चेष्टाओं से रहित हे।, तब भी उसे देखकर इमे आनंद आना चाहिए; क्योंकि आलंबन ते तब भी वही था और अब भी वही है, उसमे कुछ फेर-फार ते हुआ नहीं। पर, ऐसा द्वोता नही | इस बात को एक उदा- इरण के द्वारा स्पष्ट कर लीजिए। कटपना कीजिए कि एक नट ने पहल्ले दिन सीता अथवा शकुंतल्ञा का पार्ट लिया था, और उसे देखकर-- उसे अपने प्रेम का आलंवन मानकर-- सहस्तों सामाजिक ( दशक ) मुग्ध हो गए थे। उसी नट
[७१ |]
को, यदि कोई, दूसरे दिन, उन वेष-भूषाओं और चेष्टाओं से रहित देखे, ते क्या तब भी वह उसी भानंद को प्राप्त कर सकेगा ? कभी नहीं। बस, ते यही समभकर लोगों के विचारों मे परिवत्तेन हुआ और उन्होंने सेचचा कि प्रेम आदि का भ्रालंबन रस नहीं, कितु बार बार अनुसंधान की हुईं उसकी चेष्टाएँ और शारीरिक स्थितियाँ, जिन्हें अ्रनुभाव कहा जाता है, रस हैं। वे कद्दने लगे कि “झनुभावस्तथा” | प्रर्थात् बार बार अनुसंधान की हुई विभाव की चेष्टाएँ श्रौर शारीरिक स्थितियाँ रस हैं। यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे दसचॉ है ।
३--इसके बाद लोग कुछ और आगे बढ़े। उनका ध्यान प्रेम-पान्न की चित्तवृत्तियों की तरफ गया । उन्होंने सोचा -कि कोई भी नट या नटी हजार क्षटका करे; पर यदि वह उस पात्र के अंतःकरण के भावों को दर्शकों के सामने यथार्थ रूप मे प्रकट न कर सके, ते कुछ भी मजा नहीं आता। झतः यह मानना चाहिए कि न विभाव रस हैं, न अनुभाव, किंतु प्रेम श्रादि के आलंबन पथवा भ्राश्रय की जे चित्तवृत्तियाँ हैं, जिन्द्दे व्यभिचारी भाव कहा जाता है, वे बार बार अनुसंधान करने पर रसरूप बनती हैं। थे कहने छगे कि “व्यमिचार्येव तथा-तथा परिणमति” | अ्र्थात् प्रेम आदि के आत्लंबन तथा शभ्राश्रय की चित्तवृत्तियों ही उस उस रस के रूप में परिणत दोती हैं। यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे ग्यारहवाँ है।
[ ७२ ]
४--इसके अनंतर उनमे से बहुतेरे लोगों ने पूर्वोक्त मतों की प्राल्लोचना आरंभ की । उन्होंने सोचना शुरू किया कि इन तीनों मतों मे से कान ठीक है। अनेक नात्यों के देखने से उन्हें अनुभव हुआ कि किसी नाठ्य में सुंदर और सुख- ज्त पात्र, किसी मे उनके तयन-विमेहक अमिनय तथा किसी मे मनेभावों का मनोहर विश्लेषण मनुष्य को मुग्ध करता है, और किसी मे ये तीनो ही रददी होते हैं और कुछ मज़ा नहों श्राता। तब उन्होने यह निश्चय किया कि इन तीनो मे से जहाँ जे चमत्कारी हो, जे कोई दशक के छित को आह्ना- दित कर सके, वहाँ उसे रस कहना चाहिए, भैर यदि चम- त्कारी न दो ते तीनो मे से किसी का भी रस कहना उचित नहीं। वे कहने क्गे--“न्रिषपु य एवं चमत्कारी स एव रसः, अन्यथा तु त्रयोएपि न?। प्र्थात् तोनों में से जो कोई चमत्कारी हो, वही रस है, श्रौर यदि चमत्कारी न हों ते तीनो ही रस नही कद्दत्ता सकते । यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे श्राठवा है ।
“7 ]-पडेतराज इस मत के अजुसार भी मरत-सूत्र ( विभावाइु- सावव्यभिचारिसयेगाद्रसनिष्पत्तिः ) की व्याज्या करते है। यदि यह सत भरत-सूत्रों के बनने के अनंतर चढा हो।, ते मानना पड़ेया कि इस समय जो 'नाव्यशास्र' प्राप्त द्वाता है, वह भरत का बनाया हुआ नहीं है; क्योंकि उसमे स्थायी भावे! के रसरूप मानने का विस्तृत विवरण है और विभाव, अनुभाव अथवा ब्यमिचारी भाव इन तीनों मे से किसी एक को रस मानने का ते कहीं नाम भी नहीं है। और यदि यही
[ ७३ |
५-.-अब आगे चलिए। आगे यह वात हुई कि रस का अन्वेषण करते करते जब लोगों की दृष्टि मना-भाषों की 'तरफ गई ते उनका भो विवेचन होने जगा । विवेचत करने पर विदित हुआ कि उन भावों मे से ८ अथवा < भाव ऐसे हैं कि जो नाथ्य भर में प्रतीत द्वोते रहते हैं; जैसे शंगार के अभिनय मे प्रेम, करुण के प्रभिनय में शोक इत्यादि। और शेष ऐसे विदित हुए कि जो कभो प्रतीत होते थे शौर कभी नहीं; जैसे हष, स्थृति, लज्ञा-पादि | जो भाव नाख्य भर से प्रतीत होते रहते थे, उन्हे ल्लोग स्थायी कहने लगे; क्योंकि वे स्थिर थे। और, जो कभी कभी प्रतीत होते थे, उन्हे व्यमिचारी अ्रथवा संचारी कहा जाने गा; क्योंकि वे व्यमिचरित होते रहते थे अर्थात् कभी प्रेम के साथ रहते थे ते कभो शोक आदि के साथ। जब स्थायी भावों का ज्ञान हो गया तब उन्होंने पूर्वानुभूत रख को उन्ही के भ्रतुसार नो भेदें मे विभक्त
* कर दिया, जिनका सविस्तर वर्णन प्रस्तुत पुस्तक मे है। जब यह विभाग हो। गया, तब लोगों को पूर्वोक्त चारों मतों की निस्सारता प्रतीत हुईं। उनको. ज्ञात हुआ कि विभाव, अनुभाव और व्यमिचारी भाव, इन तीनों मे से किसी एक को (फिर वह चमत्कारी हो अथवा अचमत्कारी ) नाव्यशासर मरत-निर्मित है तो कहना पड़ेगा कि यह व्याख्या कल्पित
है। पर, इस झगड़े को ऐतिहासिकों पर छोड़ देने के सिवाय, इस समय, हमारे पास और कोई उपाय नहीं है।
[ ७४ ] रसरूप मानना सर्वेथा भ्रम है। इसका कारण यह था कि जिस तरह व्याप्र आदि प्रायी भयानक रस के विभाव होते हैं, वैसे ही धौर, अद्भुत भार रोद्र रस के भी हो सकते हैं; क्योंकि वे जिस प्रकार भय फे आलबन होते हैं, उसी प्रकार उत्साह, आश्चर्य और क्रोध के भी भ्रालंबन हो सकते हैं। इसी प्रकार अश्रुपात आदि भी जैसे झऋंगार-रस फे अनुभाव होते हैं, वैसे ही करुण और भयानक रस के भी हो सकते हैं; क्योकि ये जिस तरह प्रेम के कारण उत्पन्न होते हैं, उसी तरह शोक प्लौर भय के कारण भी उत्पन्न हो सकते हैं। व्यभि- चारी भाव की भी यही दशा है; क्योंकि चिंता आदि चित्त- वृत्तियाँ जिस तरद्द शंगार-रस के स्थायी भावप्रेम्न को पुष्ट करती हैं, उसी तरह वीर, करुण और भयानक रसें से यथा-- उत्साह, शोक और भय को भो पुष्ट कर सकती हैं। अब यदि इन तोने मे से किसी-एक को रस माना जाय, ते जो प्रेम आदि एक ही चित्तवृत्ति की प्रत्येक नाव्य के पूरे भाग मे स्थिर रूप से प्रतीति होती है, वह न बन सके । अतः वे लोग यह मानने क्गे--विभावादयश्षय: समुदिता रसा:”। अर्थात् विभावादिक तीनों इकट्टे रसरूप हैं, उनमे से कोई एक नहों। यह मत प्रस्तुव पुस्तक में सातवों है । ६--स्थायी भावों का ज्ञान दे जाने और उसके अनुसार इसका विभाग स्थिर हो जाने के अनंतर विद्वानों ने उस पर फिर विचार किया श्र उन्हे पूर्षोक्त मत भी न जेंचा | उनका
[ ७५ |
विदित हुआ कि विभाव, अलुभाव “और व्यमिचारी भाव तीनों ही पृथक पथक् अथवा सम्मिल्ित--किसी भी रूप मे-- रख नहीं हो सकते । क्योंकि जिस वस्तु का हम आखादन. करते हैं, जिससे हमें यह आनंद प्राप्त होता है, वह ये नहीं, कितु वही पूर्वोक्त चित्तवृत्ति है, जे भिन्न भिन्न चाध्यों मे मिन्न मिन्न रुपों में स्थिरतया प्रतीत होती रहती है। अर्थात् यह निर्णीत हुआ कि प्रेम भ्रादि स्थायी भावों का नाम रस है । साथ ही यह भी विदित हुआ कि विभाव उस चितश्रवृत्ति को उत्पन्न करते हैं, अनुभाव उसके द्वारा उत्तन्न होते हैं और व्यभिचारी भाव उसके साथ रहकर उसे पुष्ट करते हैं। इस- लिये यह सिद्ध हो गया कि इन सब से स्थायो भाव ही प्रधान हैं; क्योंकि ये सब उसके डपकरणभूत हैं; और इन तीने के संयोग से वह रसरूप वसकर हमें झानंदित करता है। अर्थात् नाव्यादिक मे हम इन तीनों से संयुक्त, परंतु 'इन सब से प्रधान, उसी चित्तवृत्ति का झास्वादन करते हैं ।
इसी विमशे को नाव्य-शास्ष के परमाचार्य मद्ठामुनि भरत ने दिखा है। उन्होने पूर्वोक्त सिद्धांत को अपने नाव्यशास्तर में अच्छी तरह स्थिर कर दिया, और---
#विभावानुमावव्यभिचारिसयेगाद्रसनिष्पत्ति: ।! यह सूत्र बनाया । यह सूत्र आज दिन तक प्रमाण साना जाता है और अनंतरभावी आचायीं ने इसी सूत्र पर अपने विचार प्रकट किए हैं । इस सूत्र का अथे यों है कि विभाव,
[ ७६ ] अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग--पर्थात् मिश्रए--से स्थायी भाव रसरूप बनते हैं। यद्यपि इस सूत्र की अनेक व्याख्याएँ हुई हैं, तथापि हमारी अरप बुद्धि के अतुसार यह प्रतीत होता है कि भरत मुनि ने इस सूत्र को पूर्वोक्त अथे मे ही लिखा है; क्योंकि नाव्यशासत्र मे इस सूत्र की जो व्याख्या' लिखी गई है, उससे यही बात सिद्ध होती है । भरत मुनि ने इस बात को दृष्टांत देकर स्पष्ट करने के लिये जे। दे! कोफ लिखे हैं, उन्हें इम' यहाँ उद्धृव करते हैं; क्योंकि इनसे उनके विचार विशदरूपेश विदित हो जाते हैं । वे ये हैं- यथा बहुह्व्ययुतैष्यअनेबहुमियु तम् । श्रास्वाद्यन्ति धुझ्लाना भक्त भक्तविदों जनाः ॥ भावामिनयसंबद्धान् स्थायिसावास्तथा बडुधाः। आस्वादयन्ति मनसा तस्मान्नाटयरसाः स्खताः ॥ अर्थात् जिस तरह भात के रसज्ञ पुरुष अनेक पदार्थों से तथा अनेक दाल-शाक आदि व्यंजनों से युक्त भाव का खाते हुए उसका आस्वादन करते हैं, उसी प्रकार विद्वाव लोग भावों १-- को इरशतः ? अन्नाह--यथा नानान्यञ्ञवौषधिद्रव्यसंयेगा- ब्सनिष्पत्तिः। यथा हि गुडादिमिद्वच्यैष्येजनेराषधिमिश्व पाडवादयो , रसा निर्वैत्यन्ते,था नानाभावेपगवा अपि स्थायिने भावा रसत्वमाप्जुव- न््तीति ।” इसका तात्पय्ये यह है कि जिस तरह गुड़ वगैरद चध्तुओ,
भसाल्नों और धनिया-पेदीना बगैरह से 'बटनी वगैरह तैयार की जाती है, उसी तरह अनेक भावों से मिश्रित भी स्थायी भाव रस बन जाते हैं।
[ ७७ | और अभसिनयें से संबद्ध स्थायी भावों का आखादन करते हैं; परत: ( उन्हें ) नाव्य के 'रस! कहा जाता है। इस तरह थह सिद्ध हुआ कि विभावादिक रसरूप नहीं, कितु इनसे परिष्कृत स्थायीभाव रसरूप होते हैं* ।
१--यद्यपि इसके आगे हमें अग्निपुराण का रस-विवेचन लिखना चाहिए था, क्योंकि भरत के अनंतर वही क्रम प्राप्त है; तथापि शुद्ध पुस्तक प्राप्त न द्वोने के कारण हम उस पर विशेष विवेचन न कर सके ।. इस कारण, जो बुछ हमें उपछण्घध हुआ उस भाग को-और उसके चथा- म॒ति भावार्थ को हम टिप्पणी मे दे रहे है। आशा है कि विद्वान् ्ाग इसका यथामति उपयोग करेंगे । उसमे लिखा है--
अत्रं बढ परम सनातनमर्ज विभुम् । वेदान्तेपु वदन्त्पेक॑ चैतन्य' ज्योतिरीश्चरम् ॥ आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन | व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचसत्काररसाहया ॥ श्राय्रस्तस्य विकारो य. से5हक्लार इति स्मृतः । तते5मिसानस्तन्नद॑ समाप्त सुवनन्रयम् ॥ झभिमानादततिः सा च॒ परिपेषसुपेयुपी । व्यभिचार्यांदिसामान्याच्छ ब्वार इति गीयते ॥
' तदभेदाः काममितरे हास्याधा अप्यनेकशः । स्वस्वस्थायिविशेषाथ(व्थ) परिधा(पे)पस्चछक्षणाः | सर्वादियुणसन्तानाज्जायस्ते परमाव्मनः | रागाह॒व॒ति शज्बारो रेद्रस्तैक्षण्यात्मजायते ॥ वीरो5वष्टस्भन! सट्ढोचभूबीभत्स इष्यते । श््ाराज्जायते दास राद्रात्त करुणो रसः ॥
[ ७८ ]
पूर्वोक्त भरत-सूत्र की सबसे पहली व्याख्या" आचाये भट्ट-लोल्लट ने लिखी है, जिसे मीर्मांसा के अनुसार मानता जाता
चीराच्चारभुतनिष्पत्तिः स्थादू बीसत्सावूसयानकः ।
भ्यड्रारवीरकरुणरौद्ववीरभयानकाः ॥
बीभस्धाउुतशान्ताखया: खम्ावान्नतुरो (१) रसाः ।
लक्ष्मीरिव विना त्यागान्न वाणी भाति नीरसा ॥
अधाँत् जिसे वेदान्तो मे अविनाशी, निदय, अजन्मा, व्यापक, भ्रद्वि-
तौय, ज्ञानहप, खत' अफ्ाशमाच अथवा तसे।निवत्तक और सर्वेसमर्थ परब्रह्म कहा गया है उसमे खत-सिद्ध आनंद विद्यमान हैे। वह आनंद किसी समय प्रकट हे! जाया फरता है और उस आनंद की घह अभिव्यक्ति, चैतन्य, चमत्कार अथवा रस नाम से पुकारी जाती है। उसी ( आनंद की अभिव्यक्ति ) का जो पहला पिकार है, उसे अहंकार माना जाता है। उस अहंकार से अभिमान झर्थात् ममता उत्पन्न हेतती है, जिसमें यह सारी त्रित्रेकी समाप्त हो गई है। तात्पय्ये यद्द कि त्रिज्ेकी मे एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जे किसी न किसी की ममता की पात्न व हे। । उसी अभिमान--अथवा समता--से रति अर्थात् प्रेम अथवा अनुराग उत्पन्न होता है। वही रति व्यभिचारी आदि भावों की समानता से--अ्रथांव् समान रूप मे उपस्थित व्यनिचारी आदि भावे से-- परिपुष्ट होकर टू गार-रस कहलाती है। उसी के हास्यादिक अन्य सी अनेक भेद् है । € वही रति सत्वादि गुणो के विस्तार से राग, तीए्षण ता, गये और संकेच इन चार रूपो से परिणत होती है; उनमे से ) राग से «| गार की, तीक्षणता से रैद्व की, गधे से वीर की और संकेच से बीमत्स की उत्पत्ति मानी जाती है। स्वभावतः ये चार ही रस हैं । पर, बाद में, श् गार से हास, राह से करुण, वीर से अदभुत और बीभत्स से अयानक की उत्पत्ति हुईं। ( और रति--अथवा अलुराग के अभाव रूप
[ ७ ] है। उन्होंने इस सूत्र की व्याख्या यों की है--कामिनी आदि आलंबन विभाव रति आदि स्थायी भावों को उत्पन्न करते हैं, बाग-बगीचे भ्रादि उद्दीपन विभाव उन्हें दद्दौप्त करते हैं, कटाक्ष और द्वाथों के छटके आदि अनुभाव उनको प्रवीत होने के ये।ग्य बनाते हैं तथा उत्कंठा आदि व्यसिचारी भाव उन्हें पुष्ट करते हैं और तब वे रसरूप बन जाते हैं ।” इसके अनंतर उन्होंने इस पर यों बिमशे किया है कि यह सब ते ठीक है; पर यह सोचिए कि वे रति आदि स्थायी भाव, जिन्हें आप रसरूप मानते हैं, रहते किसमे हैं ? मान लीजिए कि आप एक ऐसे काव्य का अमिनय देख रहे हैं जिसमे दुष्यंत और शक्कुंवला के प्रेम'का वन है। अब यह बताइए कि वह प्रेम काव्य मे व्शन किए हुए दुष्यंत से संबंध रखता है, अथवा श्राप जिसका अमिनय प्रत्यक्ष देख रहे हैं, उस नट
निर्वेद से शांत रस की उत्पत्ति हुईं; अर्धात् रति-भाव से आठ रसे। की और रति के अभाव से एक रस की उत्पत्ति हुईं । ) इस त्तरह रसों के आगार, द्वास्य, करुण, रीद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अदभुत और शान्त ये ना नास हुए | जिस्न तरह किसी के पास ल्लक्ष्मी---अथांत् संपत्ति--हो, पर बह किसी भी काम से उसका त्याग--अर्धात् व्यय अथवा दान---न करता हो, तो वह शेमित नहीं होती, लोगों पर उसका कुद्ध भी प्रभाव नहीं पड़ता, ठीक वद्दी दुशा बिना रस की वाणी की होती है । अर्थात् नीरस वाणी कृपण के धन के समान निरुपग्रेगी और प्रभावशून्य होती है, और उसका द्वोना न होना समान है ।
१--यहां से चार मतों के क्रम आदि काव्यप्रकाश तथा कान्यप्रदीप से लिए गए है !
[ ८० ]
से ? आपकी विवश होकर यही कहना पड़ेगा कि दुष्य॑त से; क्योंकि काव्य में वर्णित शकुंतज्ञा का प्रेम नट से वे हे। नहीं सकता | पर यदि ऐसा माने ते। यह शंका उत्पन्न होती है कि भत्ता, उस दुष्यंत के प्रेम से सामाजिक (दर्शक ) लोगों को कैसे आनंद मिल्न सकता है; क्योकि दुष्यंत ते उनके सामने है नहीं, है तो नट। इसका समाधान वे यह करते हैं कि सामाजिक लोग नट को उसी रंग-ढंग का देखकर उस पर दुष्यंत का आरोप कर लेते हैं--अर्थात् उसे झूठे दी दुष्यंत समझ लेते हैं। बस, इसी कारण उन्हें आनंद प्राप्त होता है, दूसरा छुछ नहीं । यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे पॉचवों है।
७--पर, इसी सूत्र के द्वितीय व्यास्याकार आचाये श्री- शंकुक को, जिनकी व्याख्या न्यायशास्र के अनुसार मानी जाती है, यह वात न जेंची । उन्होंने कहा--आप जे यह कह रहे हैं कि “रस मुख्यतया दुर्ष्यव आदि में रहता है, श्रौर नट पर उसका आरोप कर जिया जाता है” से ठीक नहीं | इसका कारण यह दे कि खींच खॉचकर नट पर रस का झाराप कर लेने पर भी दशेक लोगों से तो उसका कुछ संबंध हुआ नहीं; फिर बताइए, उन्हे किस तरह पझानेद झा सकता है? यदि आप कहें कि उन्हे नट के ऊपर शारोपित रस का ज्ञान होता है--वे उसे जानते हैं; परत: उन्हें आनंद का अतु- भव होता है, ते! यह भी ठीक नहीं; क्योंकि, यदि जान छेने मात्र से ही आनंद प्राप्त होता हो वे! यदि काई रस शब्द चोले
[5१ ]
और हम उसका अथे खमस ले, तब भी हमें वही आनंद प्राप्त होता चाहिए; क्योंकि हमे शब्द के द्वारा रस का ज्ञान ते हो ही गया। पर यदि आप यह युक्ति वतताएँ कि अनुभाव आदि के विज्ञान के वत्ष से जे नट पर आरोप किया जाता है, उससे आलनंदालुभव होता है, केवल शब्दादि के द्वारा ज्ञान से नहीं; तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि चंद- नादि के छेप आदि से जे आनंद आता है, उसमे हमे न अलजु- भाव की आवश्यकता होती है, न विभाव की । फेवल स्पशें- द्विय से, अथवा भ्रन्य किसी इंद्रिय से, ज्ञान होते ही झानंद थाने लगता है। दूसरे, इस बात मे कोई प्रमाण भी नहीं है कि ऐसी कल्पना की जाय। रही भरत-सूत्र की वात, से वह दूसरी तरह भी ज्वगाया जा सकता है !
श्री शंक्रुक ने इस सूत्र का तात्ये यों समक्राया-- '“बिभाबादि के द्वारा नट से अनुमान किया जानेवाला और जिस दुष्य॑तादि का अलुकरण किया जा रहा है, उसमें रहने- वाला रति आदि स्थायी भाव रस है|” अर्थात् मुख्यतया रस दुष्यंतादि मे ही रहता है; पर नट मे उसका झनुमान कर लिया जाता है ।
इस वात को स्पष्ट करने के लिये उन्होंने लिखा है कि जगत में चार धरह के ज्ञान प्रसिद्ध हैं; सम्यरज्ञान, मिथ्याज्ञान, सेशय- ज्ञान और साहश्यज्ञान। राम के देखनेवाले को जे! यह राम ही है, यही राम है! और यह राम है ही? ये तीतें
न
[८२ |
ज्ञान द्वोते हैं, वे सम्यग्ज्ञान कहलाते हैं | इनमें से पहले-- अर्थात्त यह राम ही है! इस ज्ञान मे 'इसके राम न होने! का--- अर्थात् “यह राम नही है? इस ज्ञान का निवारण द्वोता है। दूसरे--अर्थात् 'यही राम है? इस ज्ञान से 'इसके अतिरिक्त अ्रन्य किसी के रांम होने” का--अर्थात् 'राम और कोई हैः इस ज्ञान का--निवारण दोता है। भौर तीखरे प्रांत 'यह राम है ही? इस ज्ञान से 'स्वधा रास न होने! का---अर्थात् “यह राम है ही नही” इस ज्ञान का निवारण होता है। इन्ही तीनों निवारणों को संस्कृत में क्रमशः अयेगव्यवच्छेद, अन्य- योगन्यवच्छेद तथा अत्यंतायोगव्यवच्छेद कहते हैं। मिथ्या- ज्ञान उसे कहते हैं, जिसमे पहलन्ते से 'यह राम है? ऐसा जान पड़ने पर भी पीछे से जान पड़े कि 'यह राम नहीं है?!। यह राम है अथवा नहीं? इस परस्पर विरोधी ज्ञान को संशय- ज्ञान कहा जाता है, और यह राम के समान है? इस खमा- नवा के ज्ञान को साद्वूश्यज्ञान कहते हैं।
इन चारों ज्ञानों के अतिरिक्त एक और भी ज्ञान होता है, जे कि जगत् में प्रसिद्ध नही है; जेसे किसी घोड़े फा चित्र देखकर “यह घोड़ा है? ऐसा ज्ञान | -वस, इसी जान के द्वारा सामाजिक लोग नट को दुष्यंत आदि सममक बेते हैं, और फिर उन्हे सुंदर काव्य के अनुसंधान के वल्ल से तथा शिक्षा और अभ्यास के द्वारा उत्पन्न की हुई नट की कार्यपद्धुता से, स्थायो भाव के कारण, कार्य श्रार सइकारी, जिन्हे विभाव,
[ परे ]
अनुभाव और व्यमिचारी भाव कहा जाता है, ऋत्रिम होने पर भी स्वाभाविक प्रतीत होने लगते हैं। श्रर्थात् सामाजिकों को उनके बनावटीपन का बिल्कुल्न खयाल्न नहीं रहता; और तथ वे लोग नह मे स्थायी भाव का अनुमान कर लेते हैं | बस, उस भ्रनुमान का नाम ही रस का भआरास्वादन है; और बह भ्रास्वादन सामाजिकों को द्वोता है; भ्रतः यद्द कद्दा जाता है कि रस सामाजिकों मे रहता है ।
पर, यहाँ एक शंका दो सकती है। वह यह कि किसी भी पदायथे का प्रत्यक्ष होने पर ही आनंद द्ोता है, अलु- मान मात्र से नहीं; अन्यथा हम सुख का अनुमान करने पर भी सुखी क्यों नहीं हे! जाते। इसका समाधान वे यों करते हैं कि रति आदि स्थायी भावों मे कुछ ऐसी सुंदरता है कि उसके बल्ञ से बे हमे अत्यंत अ्रभीष्ठ अथवा परम सुखरूप प्रतीत होते हैं; अतः यह मानना पड़ता है कि वे अ्रन्यान्य अनुमेय पदार्थों से विज्कक्षण हैं, उनमे यह नियम नहीं लगता । तात्पर्य यह कि स्थायी भावों की सुंदरता का सामाजिकों पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वे उनका भ्रतुमान करने पर भी आर्- दित हो उठते हैं भ्रौर नट को प्रत्यक्ष देखने पर भी यह निश्चय नहीं कर सकते कि यह दुष्यंत नहीं है।
८--भरत-सूत्र के ठृतीय व्यास्याकार आचाये भरद्टननायक को, जिनकी व्याख्या सांख्य-सिद्धांत के अनुसार मानी जाती है, यह बात भी न जेंची । उन्होंने कहा--श्री शंक्ुक का यह
[ ८४ ]
कहना कि “रख का श्रनुमान किया जाता है”, उचित नहों । क्योंकि, संसार में जे यह बात प्रसिद्ध है कि प्रलक्ष ज्ञान से आनंद प्राप्त होता है, भ्रनुमानादि से नहीं, उसका तिरस्कार करके यह करपना करना कि “रति-आ्रादि की सुंदरता के बल से अनुमान करने पर भी आनंद प्राप्त हो जाता है” ठीक नहों । यदि कहो कि सूत्र का अथे इसी तरह पलुकूल होता है, तो यह भी ठोक नहीं; क्योंकि उसका अर्थ दूसरी तरह भी ठीक किया जा सकता है।
अतः यह मानना चाहिए कि काव्य की तीन क्रियाएं हैं---अर्थात् वह तीन हरकते पैदा करता है। उनमे से एक है भ्रभिधा, जिसके द्वारा काव्य का भ्रथे समझा जाता है; दूसरी है भावना--अ्र्थात् उस अथे का भ्रनुसंघान, जिसके द्वारा काव्य मे वरशित नायक-नायिका आदि पात्रों की विशेषता निवृत्त हे जाती है और वे साधारण बनकर हमारे रसा- स्वादन के अनुकूल हो जाते हैं, शलर तीसरी है भेग--प्र्थात् आत्मानंद मे विश्राम, जिसके द्वारा हम रस का अलुभव करते हैं, अथवा जे स्वयं ही रसरूप है। इस तरह काव्य की क्रियाओं से ही हमारा सब कार्य सिद्ध दो जाता है, न आरोप की भ्रावश्यकता रहती है, न अनुमान की । यह मत श्रस्तुत पुस्तक मे दूसरा है ।
<--पर, आचाये अ्सिनव गुप्त, ने, जे ध्वन्यालोक! की ल्ीचन” नामक व्याख्या फे निर्माता हैं, जिनका साहित्यशास्
[ ८४ ] के विद्वानों मे बहुत ऊँचा स्थान है और जिन्हें इस सूत्र के चतुर्थ व्याख्याकार भी कह्दा जा सकता है, इस मत को भी पसंद न किया । उन्होंने कहा--आपने जे भावना? कौर भोग? नामक दे! क्रियाओं की कल्पना की है, उसमे कोई प्रमाण ते है नहीं, कोरी मनगढ़ंत है। फिर भला इसे काई कैसे ख्ीकार करेगा ? झत: यो मानना चाहिए कि “विभाव, अ्रतुभाव प्लौर व्यमिचारी भावों से अभिव्यक्त रति झ्रादि स्थायी भाषों का नाम रस है” | प्रस्तुत पुस्तक मे प्रथम मत के 'कः और 'खं? भागों मे इसी सिद्धांत का, किचिन्मात्र मतभेद से, ज़विस्तर प्रतिपादन किया गया है, सो आप इनका विशेष विवरण वहाँ देख ले। आज दिन तक रस के विषय मे यही सिद्धांत प्रामा- णिक माना जाता है कर मस्मट भट्ट प्रश्ति साहित्य-शांख् फे महाविद्वान् इसे परम-आदरपूर्वक खोकार फरते हैं । अब रहा प्रथम मत का गः भाग । छउसमे पंडितराज ने यह सिद्ध किया है कि पूर्वोक्त 'कः शलौर 'खः भर्तें में रति आदि के साथ भआत्मानंद ते आपका भी क्गाना ही पड़ता है, उसफे लगाए बिना ते छुटकारा नहीं; और यह भी सिद्ध ही है कि रस झ्ानंद से शून्य नही है; तब जो श्रुतियों में आानंद- भय श्रात्मा को रसरूप माना गया है, उसके अनुसार, आनंद- सहित रति आदि की श्रपेज्ञा, रति आदि से उपहिित आनंद को ही रसरूप मानना उचित है। पक्ौर उनके हिसाब से यही वास्तविक मत है। |
[ ८६ ]
इसके अनंतर इस विषय से दे! मत और “उत्पन्न हुए हैं। उन्ममे से--
१०--नवीन विद्वानों का कथन है कि रस को आात्मा- संद सहित तथा वासनारूप मे विद्यमान स्थायी भावों के रूप में मानना ठीक नही; कितु थों मानना चाहिए कि जब इमें फाव्य सुनने अधवा नाथ्य देखने से विभाव झादि का ज्ञान दो जाता है, तब हम व्यंजनावृत्ति के द्वारा, शकुंतल्ला आदि फे साथ दुष्यंव भादि के जो प्रेम भादि थे, उन्हें जान छोते हैं। उसके भ्रनेतर सहृदयता के कारण हम उन सुने अथवा देखे हुए पदार्थों का बार बार प्रतुसंधान करते हैं। वही बार बार अनुसंधान, जिसे भावना कट्दा जाता है, एक प्रकार का दोष है। उसके प्रभाव से हमारा अंतःकरण प्रज्ञान से भ्राच्छा- दित दो जाता है, झौर तब उस अज्ञानाइत अतःकरण मे, सीप मे चॉदी की तरह, अनिर्वचनीय रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न हो जाते हैं और उनका हमें आत्म-चैतन्य फे द्वारा अबु- भव होता है। बस, उन्ही रति आदि का नाम रस है। यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे तीसरा है ।
ओऔर--
११--दूसरे विद्वानों का यह कच्दना है कि न ते! दुष्य॑ंत् आदि के रति आदि को समभने के लिये व्यंजनावृत्ति की पझावश्यकता है और न अज्ञानाइत अतःकरण मे अनिर्वेचनीय रति भादि की कल्पना की। कितु यों मानना चाहिए कि
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हम नट की अथवा काव्य-पाठक की चेष्टा श्रादि के द्वारा शर्कु- तल्ना आदि के साथ जो दुष्यंत आदि का प्रेम था, उसका प्जु- मान कर लेते हैं, और तब पूर्वोक्त भावनारूपी दोष से हम अपने को दुष्यंत ग्रादि समझने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि हमारे अंतःकरण मे ऐसा श्रम उत्पन्न हो! जाता है कि हम शक्कृंतला आदि से जो व्यक्ति प्रेम भ्रादि रखता है, उससे अभिन्न हैं। बस, इसी भ्रम का नाम रस है। यह मत प्रस्तुत पुस्तक मे चौथा है। थे हैं रस के विषय में ११ मत |
अंतिम दे।| मतें की अमान्यता का कारण
पर, इन अंतिम देनें मतें का बिल्कुल प्रचार नहीं हुआ । इसका कारण यह प्रतीत होता है कि एक ते सभी काव्य सुननेवालों अथवा नाटक देखनेवालो को रस फा आखादन नही होता; अतः यह मानना ही पड़ता है कि जिनमे वासना- रूप से रति भादि विद्यमान होते हैं, उन्हें ही रसानुभव होता है। अतएव लिखा गया है कि-- सवासनानां सम्यानां रसस्यास्वादर्न भवेत् । निर्वासनास्तु रह्ञान्तःकाष्ठकुब्याश्मसनिभाः ॥ , भ्र्थात् ( नाटकादि देखने पर भी ) जो सभ्य वासनायुक्त दवोते हैं, अर्थात् जिनमे वासनारूप रति आदि भाव रहते हैं, उन्हें ही रस का आ्राखादन द्ोता है; प्लौर जिन लोगों मे वह वासना नही द्ोती, वे तो नाव्यशाल्ा के अंतर्गत लकड़ो, दीवार
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और पत्थरों के समान हैं, यदि उन्हें कुछ मजा भावे ते इन्हें भी आ सकता है।
उन वासनारूप रति आदि को छोड़कर अ्रनिर्वचनीय रति आदि की कल्पना निरथेक है। दूसरे, रस को सीप की चॉदी की वरह् मानना सहृदयों के हृदय के विरुद्ध भी है; क्योंकि रस की प्रतीति बाधित नही है। श्र्थात् उसकी प्रतीति होने के अनंवर हमे यह बाघ नहीं होता कि भ्रत्न तक जिन रति आदि और आजंद की प्रतीति हो रही थी, वे छुछ हैं ही नही ।
इसी तरह रस को अ्रमरूप मानना भी शाल्ल भौर अनुभव देने प्रभाणों से शून्य है; क्योंकि न ते अयथार्थ ज्ञान को किसी शाश्ल मे ही आलंदरूप मान्रा गया है और न अज्ुभव ही इस बात को स्वीकार करता है। सहृदयों के अनुभव से ते यह सिद्ध है कि रस का आनंद के साथ अमेद संबंध भाने चाहे भेद सबंध, पर बह उससे रहित है नही ।
उपसंहार
अब हस पूर्वोक्त मतों का सिंद्ावल्लोकन करते हुए इस विषय को समाप्त करते हैं ।
१--ल्ोगों ने प्रारम्भिक दृश्य-काव्यों का अभिनय देखकर
सबसे प्रथम यह निम्चय किया कि इन अमिनयों के देखने से हमे जो आनंद प्राप्त होता है, वह रति आदि भाषे। के
[ पर्ड ]
आलंबन अर्थात् प्रेमपात्र आदि में, जे! नट झ्ादि के रूप मे हमारे सामने उपस्थित होते हैं, रहता है |
२३---तदनंतर उन्होंने सोचा कि उनके हाव-भावों झयौर चेश्टाओं में, जिन्हें नट आदि प्रकाशित करते हैं, वह रहता है ।
३--फिर उन्होंने समझा कि उनकी मनोवृत्तियों में, जो नट आदि फे अभिनय के द्वारा ज्ञात द्वोती हैं, वह रहता है |
४--पीछे से बिदित हुआ कि इन तीनों मे से जे चम- त्कारी द्वोता है, उसमें बह रहता है |
५--बाद मे पता क्गा कि इकट्ठे तीनों में, अर्थात् विभाव, श्रनुभाव और व्यभिचारीभाव के समुदाय में, वह रहता है।
६--इस के प्रनंतर भरत मुनि, अ्रथवा उनके पूर्ववर्ती किसी भ्राचाये, ने यह स्थिर कर दिया कि यह प्रानंद इन तीनों के अतिरिक्त, जिन्हें रथाथी भाव कहा जाता है, उन चित्त- वृत्तियों मे रहता है और उनका साथ होने पर ये ( विभाव, अनुभाव घोर व्यसिचारी भाव ) भी आनंद देने लगते हैं |
तत्पश्चात् इस मत की व्यास्याएँ होने ज्षगीं। व्याख्याकारों ने इस बात का ते मान लिया कि यह भ्रानंद रति आदि चित्तवृत्तियों मे रहता है; पर अब यह खेज शुरू हुई और ये प्रश्न उपस्थित हुए कि वे चित्तवृत्तियोँ किसकी हैं, काव्य में चर्शित नायक-नायिका क्षादि की भ्रधवा स्रामाजिकों की ? कौर यदि नायक-नायिका भ्रादि की हैं ते नट को भ्रसितय करते . देखकर सामाजिकों को उनसे कैसे आनंद मित्रता है ? फिर
[ ० ]
इन प्रश्नों के प्रत्युर्तरों की घारी आई और पहले पहल पुर:- स्फूत्तिक दृष्टि से यह समझता गया कि ये चित्तवृत्तियाँ फाव्य मे वर्णित नायक-नायिका आदि की हैं। इस प्रकार पहल्षे प्रश्न का ते प्रत्युत्तर हो गया। अब रहा वूसरा प्रभ। उसका प्रत्युत्तर सबसे पहले इस सूत्र के प्रथम व्याख्याकार आचाये भट्ट-लेल्लट ने यों दिया कि सामाजिक ल्लोग उन चित्तवृत्तियों को नट पर आरोपित कर लेते हैं ग्रैर उन आरोपित चित्त- वृत्तियों के ज्ञान से सामाजिकों को आनंद प्राप्त होता है ।
७--श्री शकुक ने इस मत का खंडन किया और कहा --सामाजिक लोग उन चित्तवृत्तियों का अनुमान कर लेते हैं। पर,
८--भट्टनायक ने इन बातें को खोकार न किया; उन्होंने फहा--नही, तुम्हारा कद्दना ठोक नहीं । अ्रसली बात यह है कि किसी भी काव्य के सुनने अथवा उसका अभिनय देखने से तीन कांम होते हैं--पहले उसका अथे समभ मे आता है; तदनंतर उस अथ का चिंतन किया जाता है, जिसका हमारे ऊपर यह प्रभाव होता है कि हम उसमे सुनी और देखी हुई वस्तुओं के विषय मे यह नहीं समर पाते कि वे किसी दूसरे से संबंध रखती हैं अ्रधवा हमारी ही हैं; और उसके बाद हमारे सत्त्गगुण की अधिकता से रजोगुण क्र तमेगुश दब जाते हैं कौर हम आत्मचैतन्य से प्रकाशित एवं साधारण रूप मे उप- स्थित रति आदि भावों का अनुभव करवै हैं। भ्र्थात् जिन
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रति आदि भावों के अनुभव से यह आनंद प्राप्त होता है, वे न नायक-नायिका आझादि के होते हैं, न सामाजिकों के, वे तेः चिल॒कुल साधारण होते हैं, उनके विषय मे सामाजिकों को कुछ ज्ञान नही द्वोता कि वे किसके हैं ।
<- -अमिनवगुप्त और मम्मट-भट्ट को यह बात भी न जेंची | उन्होंने भट्ननायक का खंडन करते हुए कहा कि विभाव, अनु- भाव झौर व्यमिचारी भावों के द्वारा एक अत्ीकिक क्रिया उत्पन्न होती है। उससे, झ्रथवा यों कह्िए कि विभावादिकों के आखादन के प्रभाव से ही, हमारे झात्मचेतन््य का आवरण-- भ्रज्ञान--दूर हे जाता है| तदनंतर यह होता है कि हमारे हृदय * मे, सांसारिक अनुभवों फे कारण, वासना रूप से विद्यमान रति आदि का उस आत्मचैतन्य के द्वारा प्रकाश होता है और उस भ्रानंदरूप झात्मचेतन्यसद्दित उन रति आदि भावों का यह श्रानंदानुभव है। अर्थात् यह अनुभव साधारण रूप से हुए रति आदि का नहीं, कितु आात्मानंद सहित और सामाजिकों के हृदय मे वासनारूप से विद्यमान रति भ्रादि का है।
पर, पंडितराज का यह बात भी पसंद न आझाई | उन्होंने कहा कि कौर सब बात श्रापकी ठोक है; पर जब आपने यह खीकार कर लिया है कि इस अनुभव मे रति आदि का और आत्मानंद का साथ है, तब उस झानंद को गोण और रति झआादि को प्रधान मानना उचित नही । झतः यह मानना चाहिए, जो श्रुति-सिद्ध भी है, कि यह आनंद प्रात्मरूप ही है। हो,
[ २ ]
इतना श्रवश्य है कि वह आनंद रति आदि से परिच्छिन्न होकर प्रतीव द्वोता है, समाधि की तरह भ्रपरिच्छिन्न रूप में नहीं |
इसके भनंतर जो दे! मत उत्पन्न हुए हैं, उनमें से एक मे--
१०--इस झआानंद को भ्रात्मचैदन्य से प्रकाशित घर श्रांति से उत्पन्न रति आदि का माना गया है। और दूसरे मे--
११--फेवल भ्रमरूप ।
गुण भरत और भामह
अब इसके शभ्रागे प्रस्तुत पुस्तक में विवेचनीय विषय हैं गुण । गुणों के विषय मे प्रधानतया दे! मत हैं--एक प्राचीनों का कर दूसरा नवीनों का। प्राचीनों ने श्लेष , प्रसाद, समता, समाधि, माधुरय, भ्रेज, सुकुमारता, अधेव्यक्ति, उदारता और कांति ये दश गुण माने हैं। इनके आविष्कारक भरत अथवा उनके पूर्ववर्ती कोई झ्ाचाय हैं। पर भामह' ने अपने पंथ में इनमे से फंवत्त तीन ही गुणों के भाम लिखे हैं, श्र आगे जाकर काव्यप्रकाशकारादिकों ने प्राचीनों के सब गुणों का
१--श्लेप. प्रसाद: समता समाधिमांधुयमेजः पद्साकुमायम्र । अथैस्य च व्यक्तिददारता च कान्तिश्व कान्या्थंगुणा दशेते ॥-- नाव्यशात्र ।
२---'माधुयस भिवान्डुन्त, ध्रसाठ॑ च सुमेघलः | समासवन्ति भूयांसि न॒पदानि श्रवुक्षते। केचिदेजेडमिघधित्सन्तः समस्यन्ति घहुल्मपि (? ( भामह का 'काव्यारुडूार )
[ #$ ] इन्हीं मे समावेश कर दिया है; वे हैं माघुये, ओेज और प्रसाद । से इस सबका सारांश यह हुआ कि दशगुणवाद के आवि- प्कारक हैं भरत और त्रिगुणवाद के हैं भामह। प्राचीनों के मतभेद
यद्यपि प्राचीनों को दशगुणवादी कद्दा जाता है, तथापि उनमे परस्पर बढ़ा मतसेद है। सच पूछिए ते काव्यप्रकाश- कार के पहल्ले इस विषय में अराजकता ही रही है प्लौर जिसकी जैसी इच्छा हुई, उसने उसी प्रकार के क्कक्षण बनाकर उतने ही गुण मान लिए हैं। उस झराजकता के समय का भी कुछ दिग्दशन यहाँ कराया जाता है ।
शुणों के विषय मे प्राचोनों के पॉच मत विशेषतः प्रसिद्ध हैं पऔर उनके प्रवर्तक क्रशः भरत, अप्रिपुराण, दंडी, वामन और भोज हैं। उनमे से भरत के गुण हम गिना चुके हैं|
अभिपुराण ने श्लेष' , छातित्य, याम्भीय, सौकुमाये, उदा- रता, सती (? ) भर यैगिकी ( ९ ) इस तरह सात शब्द- गुण; माधुये , संविधान, कोमज्षता, उदारता, प्रौढ़ि और सास- यिकत्व इस तरह छः अर्थगुण; भर प्रसाद, सौभाग्य, यथा-
१--शल्षेषो ल्वालित्यगाम्भीयें सैकुमायमुदारता। सत्येव (१) यैगिकी (१) चेति युणाः शब्दस्य सप्चा ।
२--माछुय संविधान च कोमलत्वमुदारता । प्रौढिः सामयिकत्व॑ च तदूसेदाः पट चकासतति ।
,. रै--तस्य असादः सैभाग्य' यथासंख्यमुदारता । पाको राग इति
भाशेः पद (अ)पन्न (१ ४ ) प्रपन्लिताः।
[ ञचं४ ] संख्य, उदारता, पाक और राग इस तरह छ: उभयगुण---भर्थात् शब्द और अ्थे दोनों के गुण; यों सब मिलाकर “न्नोस गुण गिनाए हैं। पर इनमें से कुछ भरतादि के गुणों में समाविष्ट, कुछ अप्रचलित कौर शुद्ध पुस्तक की अप्राप्ति के कारण अस्पष्ट से श्रत: उन्हे प्रपंचित करके हम इस' भूमिका का आकार बढ़ाना नहीं चाद्दते | दंडी ने नाप और संख्या ते भरत की ही रखी है; पर उनके क्रम और लक्षणों में बहुत कुछ फेर-फार फर दिया है | पर उनमे से भी कुछ अप्रचलित और अधिकांश वामन के गुयों में समाविष्ठ हो जाते हैं; अत: उनका विस्तार भी निरधेक है । वामन ने इन गुणों का बहुत द्वी विशद विवेचन किया है और “काव्यप्रकाश'कार भ्रादि ने उसे ही प्राचीनों का मत माना है। थद्द तो नहीं कद्दा जा सकता कि भरत पर दंडी के लक्षित गुणों का उनमे सर्वीश मे संग्रह हो जाता है, पर इसमें संदेह नहीं कि श्रधिकाँश में वे उनमे समाविष्ट दे जाते हैं | रसगंगाधर मे जो भ्रत्यंत प्राचोनों के दस शब्दगुण और दस अधेगुण लिखे हैं, वे बामन के मत से ही संग्रहीव किए गए हैं। से उनके लक्षणों प्लौर उदाहरणों का आप देख द्वी लेगे। अब रहे सोजराज' | उन्होंने वामन के देख शब्द- गुणों के अतिरिक्त उदात्तता, ऊर्जितता, श्रेयान, सुशब्दता,
१--रलेपः प्रसाद: समता माधुय सुकुमारता । अर्थव्यक्तिसथा कान्तिरुदारत्वम्लुदात्तता
[ <४ ] सूच्मता, गंभीरता, विस्तर, संक्षेप, संमितत्व, भाविक, गति, रीति, उक्ति भर प्रौढि इस तरह चैदह प्रन्य गुण मानकर इनकी संख्या चैबीस कर दी है। पर इन सब का समावेश प्राय: वामन के गुणों मे हे जाता है, अतः इसे आप केवल नाम-भेद सा ही समक्तिए । इन सबके अनंतर वाग्भट ने दंडी के, और पीयूषवर्ष ने भरत के, मत का पुनः स्पशे किया है। उनमे से वाग्भट ने ते प्राय: दंडी के शु्यों का अनुवाद कर दिया है, से उसे ते अतिरिक्त मत कटद्दा ही नहीं जा सकता। हा, पीयूषवर्ष ने भरत के दस गुणों मे से कांति को झूंगार-रस में और अधथे- व्यक्ति का प्रसाद-गुण मे समाविष्ट करके उन्हे आठ ही रख लिया है, और एकाघ गुय के लक्षण में भेद भी कर दिया है; पर कोई नई बात उसमे भी नहीं है । इस सबका तात्पये यह हुआ कि भरत ने दस गुण माने, अग्निपुराण ने उन्नीस, भामह ने तीन, दंडी ने पुनः दस, वामन ने वीस, भोजदेव ने चेबीस, वाग्भट ने पुनः दस और पीयूषबर्ष ने आठ । इसके अतिरिक्त प्रत्येक आचाये ने इनके लक्षणों मे
ओजस्तथाअन्यदौजित्यं प्रेयानथ सुशब्ूता ।
तद्वत् समाधिः सैक्ष्म्यंच गास्भीयसथ विस्तरः ॥|
संक्षपः संमितत्व॑ च भाविकत्व' गतिखथा ।
शीतिरुक्तिस्तथा श्रोढिः .. ...., ...-- -«»- ॥ --सरस्वतीरकदाभरण ।
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भी इच्छाउुसार फेर-फार कर दिया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचोनों ने अपने पूर्ववर्तो आचायों के विचारों पर यथोचित विमशे नही किया और जिस समय जिसे जो कुछ सूफ पड़ा, तदनुसार बे गुशो मे अधिकता, न््यूनता अथवा लक्षय-भेद करते चले गए। पर इन सबने अधिकांश में गुग्ों का नामकरण भरत के अनुसार ही रखा है; अत: इन्हे दश- गुणवादी अथवा भरत के श्रन्मयायी कद्दा जा सकता है ।
मतभेदो की निववत्ति
बारहवी शताब्दी मे काव्यप्रकाशकार महामति मम्मट का यह भ्रराजकता खटकी । उन्होंने खूब विमशे करके भामह का पक्ष लिया, और उन्हीं तीन शुणयों मे, उस' समय मे सर्वा- घिकरूपेण प्रचलित, वामन के गुणों में से अधिकांश का समा- वेश कर दिया और शेष को काट-छॉटकर ठीक-ठाक कर दिया । यह काट-छॉट प्रस्तुत पुस्तक मे आा चुकी है, सो आप उसे देख ही लेगे । परिणाम यह हुआ कि भ्रग्निपुराण का सत ते पहले से ही प्रचलित नहीं था, और भरत से क्षेकर भेज तक के सब गुण प्राय: वासन के मत मे संग्ृहीत हो चुके थे, सो सबके सब उड़ गए श्र उन्हीं तीन गुयों का प्रचार रह गया । इसके बाद भी वाग्भट ने दंडी के मत से और पीयूषवर्ष ने भरत के मत से गुणों के लक्षणादि लिखे; पर वे काव्यप्रकाशकार की युक्तिपूर विवेचना के सामने न टिक
[ <७ ] सके और साहित्यदर्पणकार एवं रसगगंगाधघरकार ने इसी पक्ष को विस्ृष्ट करके स्थिर कर दिया।
४ गुणों का स्थान
यह ते हुईं मत-भेद की बात । अ्रव यह सोचिए कि साहित्य-शाञ्र मे शु्ों का स्थान क्या है ? इस विषय मे वासन और भेजदेव दोनों कहते हैं--
युवतेरिव रूपमञ्ञ ! काव्य स्वदते शद्धगु्ण तदप्यतीव ।
विद्वितप्रणयं॑ निरन््तरासिः सदलद्डारविकल्पक्ल्पनामिः ॥
यदि भवति वचर्च्युद गुणेम्यो वपुरिव यै।वनवन्ध्यमड् नायाः।
अपि जनदयिताबि टुसंगत्द नियतमछक्कुरणानि सपश्रयस्ते ॥
अर्थात् काव्य युवती के रूप के समान है; क्योंकि वह भी प्रच्छे गुणों ( ज्ञावण्य श्रादि माधुये आदि ) से युक्त झऔर एक के बाद एक भाए हुए अनेक अलंकारों की कल्प- नाओं से संबद्ध देकर भानंद देता है। इसका तात्पये यह है कि जिस तरह स्रो के रूप के लिये ल्ञावण्यादि की ग्लौर आभूषणों की प्रावश्यकता है, उसी प्रकार काव्य मे भी गुणों भ्रार अलंकारों की भ्रावश्यकता है। पर यदि कवि की उक्ति गुर्णा से रहित द्वो तो कामिनी के यैवन-रहित शरीर की तरह होती है; प्तः गुर्णा का होना काव्य के त्िये अत्यावश्यक है! इसके अतिरिक्त भाजदेव ने ते यह भी लिखा है कि--
छ
[ ८ ] झअल्कृतमपि अ्रन्य' न काब्य' गुणवजितम | गुणये।गस्तयेसुख्ये। गुणालुछारयेगयेः ॥
अर्थात् श्रत्कारों से युक्त भी गुणों से रहित काव्य सुनने के योग्य नहों होता; अतः काव्य के गुणों और अल॑कारों से थुक्त होने की अपेक्षा गुणों से युक्त होना मुख्य है।
काव्यप्रकाशकारादिकों का भी यही मत है कि गुण सीधे रसें को उत्कृष्ट बनाते हैं और अल्तंकार शब्दों और पअर्थों के द्वारा, अतः गुण अल्लंकारों से अ्रधिक अपेक्षित हैं ।
इस तरह यह सिद्ध हुआ कि साहित्यशास्त्र में गुणों का स्थान अलंकार से ऊँचा और रसादि व्यंग्यों से नीचा है, और वे अलंकारो की अपेक्षा अधिक आवश्यक हैं |
गुण क्या वस्तु है
झब हस इस बात का विचार करेंगे कि शुण हैं क्या वस्तु; उन््द्दे लोग अब तक किस किस रूप मे समभते शआ्राए हैं ।
महामुनि भरत देषो का वर्णन करने के अनंतर कहते हैं कि “गुणा विपयेयादेषाम!?”। अर्थात् दोषों के विप- रीत जो कुछ वस्तु है, वे गुण हैं ।
शग्निपृराण मे लिखा है कि “जा' काव्य मे बड़ी भारी शोभा को अनुग्ृहीत करता है, अर्थात् पदावली को शोभा
१--थ काब्ये महतीं छायामनुय्रहत्यसो गुण” ।
[ *डई ]
प्रदान करता है, वह शब्दगुश द्वोता है; जो शब्द से प्रति- पादित की जानेवाल्ली वस्तु को उत्कृष्ट बनाता है, वह अधे-गुण होता है; और जे।' शब्द और प्रथ दोनों को उपकृत करता है, वह उम्यगुण द्वोता है ।
दंडी ने इन्हें “विशिष्ट' रचना के प्राण” भाना है; श्रौर घासन का कहना है कि-- काव्य मे जो शोभा होती है--जिसके कारण कान्य को काव्य कहा जाता है, उस शोभा के उत्पादक धर्मों का नाम गुण है”
इस सबका तथा इन सब भ्रंथों में विवेचित गुणों फे लक्ष- णादि का निष्कर्ष यह है कि जे! वत्तु शब्द को, अथे को अथवा उन दोनों फो उत्कृष्ट बनाती है, उसका नाम गुण है ।
अब इस बात का विवेचन आरम्भ हुआ कि--जब गुण भी शब्द और अर्थ को उत्कृष्ट बनाते हैं श्रे।र अलंकार भी, तब इन देनों में भेद क्या है ? क्यों न गुणों को भी अलंकार ही समझ लिया जाय ९ इसका उत्तर दंडी ने यों दिया कि गुण रचना के प्राण हैं और अलंकार काव्य में शोभा को उत्पन्न करनेवाले; अर्थात् गुशों से काव्य मे काव्यत्व भाता है;
अब. न
१--उच्यमानस्य शब्देन यस्य कस्यापि वस्तुनः । उत्कषमावहलर्थों गुण इत्यमिधीयते ।?
२--+श्रद्धार्थावु पकुवांणो नाज्नोभयगुणः स्मृतः ।
३---एते वैदममागंस्य प्राणा दृश गुणा: स्खताः (--काब्यादर्श ।
४--काव्यशेभायाः कर्तारो धर्मा गुणा/--अलंकारसूत्र ।
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और अलंकार उसे शोमित' करते हैं---उसे उत्कृष्ट बनाते हैं। इसी बात को वामन ने स्पष्ट शब्दों मे यों लिखा है कि “काव्य- शेभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणा; तदतिशयहेतवस्ववल्न्टारा:”; अर्थात् फाव्य की शोभा फे जनक -- काव्य में काव्यत्व लाने- वाल्े--धर्मों का नाम गुण है, और उस शे।भा फो--उस काव्यत्व को--उत्छृष्ट बनानेवाज्ञे धर्मों का नाम है अलंफार |
पर, जब ध्वनिकार! ने काव्य के झात्मा' ध्वनि (व्यंग्यों) का और उनमे से भी प्रधान रस का प्रन्वेषण करके उसका स्वरूप स्पष्ट कर दिया, तब लगे के विचारों में परिवत्तेन हुआ ।
१--काव्यशेभाकरान् धर्मानखट्डारान् ग्रचक्षते ।!--काव्यादुर्श ।
२--काव्यप्रकाश के अनुसार इस सूत्र की यही व्याख्या है।
३--काव्य की आत्मा के विषय मे यद्यपि हमें द्वितीय भाग में विचे- चन करना है; तथापि यहाँ कुछ मनों का जरलेखमान्न किया जाता है। अग्निपुराण में लिखा है कि “कान्य की आत्मा रस है।” पघामंव कहते हैं कि “पढ़ो की विशिष्ट रचना काच्य की भआात्मा है।” झआानंदवर्धेन का सिद्धांत है कि “काम्य की आत्मा ध्वनि (व्यंग्य) है” यही बात विद्यानाथ ने भो मानी है और 'व्यक्तिविवेक'- कार भी इसी से सहमत है। कुंतक ( वक्रोक्तिजीवितकार ) ने 'बड़ी चतुराई से बात के भ्रतिपादन कर देने! के कान्य की आत्मा कहा है। खाहिलद्द्प॑णकार “असंलक्ष्यक्रम-ब्यंग्योे को काब्य की आत्मा मानते है। चोमेद्र का कथन है कि “काव्य का जीवन ओऔचित्य है।' इनमें से कुछ कथन आक्ंकारिक भी हैं, वे वासव से फक्राव्यात्मा? के अन्वेषण में चहीं लिखे गए हैं। पर इस एचायत को हम इस समय नहीं छेड़ना चाहते ।
[ १०१ |] काव्यप्रकाशकार भम्मट ने प्राचीनें के विचारों पर विप्रतिपत्ति की और कहा कि यदि शआप गुणों को ही काव्य मे काव्यत्त लानेघाले मानते हैं, ते! जिन काव्यों में ओज आदि गुण ते हों और रसादिक न दे, उन्हें भी काव्य कद्दा जा सकेगा। उदाहरण के लिये कस्पना कीजिए कि कोई मनुष्य 'इस पहाड़ पर घड़ो राग जल्ल रद्दी है, यह बहुतेरा धुआ निकत् रहा है? इस बात को ज्लोक बनाकर यों वेले कि-- अद्रावन्र प्रज्वकत्यग्निरुचेः प्राज्यः ग्राथन्नुछसत्पेष घूमः ।!
ते इस वाक्य में आपके हिसाब से श्रेज गुण ते हुआ हो; क्योंकि भाप रस के साथ तो गुणों का कोई संबंध मानते नहीं, फेवल् रचना के साथ मानते हैं, से। यहाँ गाढ़ रचना है ही। अतः यह भी काव्य हे।ना चाहिए; क्योंकि जे वध्ततु काव्य में काव्यब लाती है, वह ( ओज गुण ) यहाँ भी विय- मान है। पर, बताइए, कौन सहृदय ऐसा हैया जो केबल रचना के कारण ही इसे काव्य मानने लगे ? अतः यों मानना चाहिए कि काव्य में काव्यत्व लानेवाब्ी चोज्ें ते! रपादिक व्यग्य हैं, भर उन्हें उत्कृष्ट बनानेवाज्े जो धर्म हैं, उनका नाम है गुण; जैसे कि मलुध्य को जीवित बनानेवाला प्रात्मा है, प्रौर उसे उत्कृष्ट बनानेवाले हैं शुरवीरता आदि गुण' |
१--े रसस्थाद्लिने धर्माः शैर्यांदय इवात्मनः । उत्कष देतबस्ते स्थुर- चल्लस्थितयो गुणा: ।! (काव्यप्रकाशः:); ( रसरपेति--प्रलक्षपक्रोप- जचणम, इत्युयोते नागेशः ) ।
[ १०२ ]
ध्वनिकार के अनुयायिये। ने काव्य के आत्मादिक का विवरण आह्लंकारिक भाषा से यों किया है--'शब्द और भ्रथे काव्य फे शरीर हैं, रस आदि आत्मा हैं, गुण शूर-बीरता आदि की तरह हैं, देष कानेपन झादि की तरह हैं और अल्त- कार आभूपणों की तरह ।”' इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि रसें के साथ गुणों का अंतरंग संबंध है श्रौर अल्कारों का बाह्य; एवं गुण काव्य की आत्मा रस को उत्कृष्ट करते हैं, और अलंकार उसके शरीर रूप शब्द और भ्रथे को ।
साथ ही गुणों की वास्तविकता का पता लगाने के लिये इस बात का भी अन्वेषण हुआ कि प्राचीन लोग जिन्हे गुण शब्द से व्यवह्ृव करते आए हैं, उन बीसों मे से, यदि नवीन प्रणाल्षी से जिन दोषों का विवेचन किया गया है, उनके अभाव रूप गुणों का प्रथक् कर दिया जाय, ते कया बच रहता है। सेचने पर विदित हुआ कि शेष सब गुण कोमल, कठोर ओऔर स्पष्टाथेक तीन प्रकार की रचनाओं में विभक्त किए जा सकते हैं। इस तरह वे बीस के तीन हुए और उनके नाम भामह की प्रणाली से माधुय, श्रेज और प्रसाद रखे गए |
इसके अनेतर यह भी सोचा गया कि कान सी रचना किस रस के अनुरूप है ? विमश करने पर विदित हुआ कि आँगार, करुण और शांत रसें फ॑ लिये कामक्त रचना की; वीर
१---काच्यस्थ शब्दायों शरीरस, रत्यादिश्चात्मा, ग्रुणाः शोयां दिचत्, अलड्टारा कटककुण्डलादिवत्” इति।
[ १०३ | शैद्र और बीभत्स रसेों के लिये कठार रचना की श्रावश्यकता है; और स्पष्टाथेक रचना का द्वाना ते सभी रसें मे अपेक्षित है। जब यह निणेय हो गण, तत्र यह खोज हुई कि इन रचनाओं से युक्त उन उन रसों के आास्वादन से श्रत:करण पर क्या प्रभाव होता है ? अनुभव से ज्ञात हुआ कि कोमल रचना से युक्त रसें के आस्वादन से चित्त पिघलता है, कठोर रचना से युक्त रसों के आररवादन से चित्त उह्योप्त होता है-- उसमें जोेश आ जाता है, और स्पष्टाथेंक रचना से युक्त रसें के आरवादन से चित्त विकसित होता है। थोडा भर सोचने पर यह्द भी पता क्षगा कि यह काम वास्तव में रसे| से दाता है, रचनाओं से नहीं; क्योंकि यदि मधुर रचना से ही चित्त हुत द्वोता हो, ते बैसी रचना से वीर आदि रसें मे चित्त की द्रुति क्यों नहीं दवाती। अतः यह निणेय हुआ कि गुण रचना से विल्क्षण वस्तु हैं श्रौर उनका रसें के साथ संबंध है, रचनाओं के साथ नहीं। झंतते गत्वा काव्यप्रकाशकार से यह निर्णय किया कि झूंगार, करुण और शात रखें में जे एक प्रकार की आह्यादकता रहती है, जिसके कारण चित्त दुत दो जाता है, उसका नाम माधुय है; वीर, रद भर बीभत्स रसें मे जे उद्दीपकता रहती है, जिसके कारण चित्त जल्ल उठता है, उसका नाम श्रोज है; और जे सूखे' घन
न न-++>-...,
१--चह दृष्टांत ओजस्वी रखें के किये है ।
[ १०४ ] ।
मे आग की तरह श्रौर खच्छ शकेरा भ्रथवा वल्तादि में जल की तरह चित को रस से व्याप्त कर देवा है, उत्त विका- सकत्व का नाम प्रसाद है। प्रत: यों समकना चाहिए कि शुण सुख्यतया रस के धर्म हैं, और इन्हें जे रचना आदि के धर्स कद्दा ज.ता है, से श्रौपच।रिक है।
पर, साहिलद्दपंणकार ने काव्यप्रकाशकार के आशय को विना समझे ही उसका खंडन कर दिया। उन्होंने पहले ते काव्य- प्रकाशकार की इसी बात को लिख दिया कि गुण ' शै्यादिक की तरह रस के धर्म हैं; पर आगे जाकर यद्द निश्चित किया कि द्वुति, दीप्ति श्रार विकासरूपी चित्तवृत्तियों का नाम ही भाषुय, ग्रेज और प्रसाद है, तथा अपने इस सिद्धांव के अनुसार काव्यप्रकाशक्ार के विषय में यह कह डाल्ला कि माघुर्य ' को जो हरुति का कारण बताया जाता है, वह ठोक नहीं; क्योकि द्ुुति स्वय रसरूप भ्राह्मद से अभिन्न है, इस कारण, जैसे रस कार्य नहीं हे सकता, वैसे वह भी कार्य नहीं हो सकती । पर उन्होने यह सोचने का कष्ट नही उठाया कि काव्यप्रकाशकार ने द्रुति को माधुय माना कब है ? वे ते आंगारादि से जे। दुति-जनकता ( प्रयोजकता ) रहती है, उसे
१--थद्द रृष्टात सधुर रसों के लिये है । २--रसस्वाद्वित्वमाप्तस्य धर्मा' शौयांदये! यथा । ग्रुणाः... ...! । ३--यत्त केनचिदुक्तम--'माधुये द्वुतिकारणम! इति तज्ञ। हूची- भावस्यास्वादस्वरूपाह्वादा भिन्नत्वेन का््येत्वाभावाद् [?? -
[१०४ ]
माधुय कहते हैं। आपने पहले ते गुणों को रस का धर्म बताया झौर अब उन्हें चित्ततृत्तिऱप कद रहे हैं। ज़रा सेचिए ते सही कि रति ( जे एक प्रकार की चित्तवृत्ति है ) रूप रस का धर्म द्ुतिरूप चित्तवृत्ति कैसे हे सकती है! क्या एक चित्तवृत्ति का दूसरी चित्तवृत्ति धर्म होती है ? भतः यह सब अविचारितामिधान है।
इसके बाद पंडितराज ने गुणों के खरूप का प्रामाणिक रूप से निर्णय करके यह स्थिर कर दिया कि वास्तव मे द्रुति, दीप्ति प्रैर विकास नामक चित्तवृत्तियों के नाम ही माधुये, प्रोज भौर प्रसाद हैं; भार रूंगारादिक रस उनके प्रयोजक हैं, भ्रतः उन्हे मधुर आदि क्षह्ा जाता है। से यह मानना चाहिए कि गुण रसे| के धर्म नहीं कितु खतंत्र चित्तवृत्तियाँ हैं, भार वे उन उन शब्दों, भ्रथों, रखों श्लौर रचनाओं से प्रयुक्त होकर रस को उत्कृष्ट बनाती हैं ।
भाव प्रस्तुत पुस्तक के इस भाग मे केवल्न व्यभिचारी भाव रह नाते हैं; पर उनके विषय में इस समय कुछ बिशेष वक्तव्य नहीं है; क्योंकि उनके विषय मे विशेष मत-म्ेद नहीं है; वे भरत के समय से प्लाज-दिन तक तेंतीस के तेंतीस ही हैं, न किसी ने उन्हें घटाया, न बढ़ाया | प्रक्तुत पत्तक में लचण, खरूप तथा कार्य-कारण भादि सब बातों
[ १०६ ] का स्पष्टरूपेण विवरण कर दियां गया है। हाँ, इतना कह देना आवश्यक है कि इस वरह से प्रत्येक भाव को प्रथकू-पृथक् समभने के लिये उनके भेदक धर्म प्र कार्य-कारण अन्यत्र नहीं समभाए गई हैं।
इति शुभम् ।
संचत् १६८९ जयपुर
बे थ्पू शाख शक्ला ८ शुक्रवार पुरुषात्तसशर्मा चतुचंदी ता० २७ श्रप्नेल सन् १8२८
विषय-सूची
विषय पृष्ठाडू | विषय पृश्ठाडू मडुलाचरण ३' में समझना चाहिए? ४४ गुरुवन्दना ४ , भ्रधम काव्य ४< प्रबन्ध-प्रशंसा भू. अ्रधमाधम भेद क््यें नहीं झतन्य निबन्धों से विशेषता ७ भाना जाता पू० निर्माता श्रौर निबन्ध का प्राचीनें के मत का खण्डन ४० परिचय ८ | शब्द अथे दाने चमत्कारी शुभाशंसा ८. हों ते किस भेद मे
' काव्य का लक्षण. ८, समावेश करना चाहिए! ४२ काष्य का कारण. ९४ | वनिकाव्य के भेद १४ काथ्ये के भेद २५ ' रस का स्वरूप और उत्तमोत्तम फाव्य १६ | उसके विषय भें
उत्तम फाव्य ४२ , ग्यारह मत १४३ उत्तमेत्तम पौर उत्तम | गघान लक्य ५५ में में क्या भ्रन्तर है? ४५. १-अमिनव गुप्ताचाय और चित्र-मीमासा के उदा- '.. सम्मट भट्ट का मंतत २४ हरण का खंड ४५, (कक) ५४ सध्यम काव्य धप | (ख) भू
बाच्यचित्रों को किस भेद | (ग) ६१
५ कक 5)
विषय पृर्ठॉक , विषय पृष्ठांक २-भट्टनायक का सत_ ६३ | स्थायी भाव ८४ ३-नवीन विद्वानों का मत ६७ | रसें झर स्थायी भावों
४-अन्य मत ७३... का भेद प्
२-एक दल (भट्ट लोक्ट... ये स्थायी क्यों कहलाते हैं ? ८५ इयादि ) का मत ७६ | स्थायी भाषें। के
६-कुछ दिद्वानों (श्रो.| लक्षण ष्ट शंझुझछ प्रश्नति ) का १ रति प्प्प मत है ७७ २ शोक ष्प ७-किदने दी कहते हैं ७७ “ ३ निर्वेद प्स्ड ८-चतहुतेरों का कथन है ७७ । ४ क्रोध पड <“इनके अतिरिक्त कुछ | ५ उत्साह न लग कहते हैं ७७ | ६ विस्मय ० १०-दूसरे कहते ह. ७८ | ७ हास 5? ११-तीसरे कहते हैं. छ८द | ८ भय ० पृर्वोक्त मतों के अनुसार... «& जुगुप्सा हे
भरतसूत्र की व्याख्याएँ ७८ | विभाव, अनुभाव और विभावादिकों मे से प्रत्येक | ज्यमिचारी भाव ्र् का रस-व्यखरू क्यों विभावादि के कुछ उदाहरण <१₹
नहीं माना जाता ८० रखें के अवांतर भेद
: रस कौन-कौन और सौर उदाहरण कितने हैं परे श्रादि ढ॑ ३
( विषय पूष्ठांक खबर रख न्ड्रे फरुणरस ््छ शान्तरस द्छ रौद्॒स्स १०० वीर-रस १०४ अद्भुत रस ११७ हांसरस ११८ हास्य के भेद १५२० भयानक रस १९२ बीभत्स रस १२३ “हास्य” और '“जुगुप्खा? का
आश्रय कौन दवोता है! १२४ रसाक्षट्टार १२५ ये 'पअ्रसंलक्ष्यक्रमव्य॑ग्यः
क्यों कहलाते हैं ? १२६ रस नी ही क्यों हैं! १२६ रसे का परस्पर अ्रवि-
रोध भार विरोध. १९८ विरुद्ध रसें का समावेश १२७ अन्य प्रकार से विरोध
दूर करने की युक्ति १३४
डे)
विषय पृर्ठाक विरोधी रस के वर्णन
की झ्रावश्यकता. १४७ रस-बणन सें देय १३८ ग्रनाचिय १४२ अ्रनैचिय से रस की
पुष्टि १४६ गुण १४७ घत्यन्त प्राचोन आचायं
का मत १५३ शब्द-गुण १५३ शेष १४३ असाद् १५४ समता श्प््प् साधुये १५५ घुकुमारता श्ध्र्द्ू अधेव्यक्ति १५६ उदारता १५७ भ्रेज श्प्द कान्ति १५८ समाधि १पू८ अधगुण १६०
( ४)
विषय पृष्ठांक ' विषय पृष्ठांक श्लेष १६० | कांव २०२ प्रसाद १६१ | भाव का लक्षण २०२ समता १६२ | भाव किस तरह ध्वनित साघुये १६३ | दोते हैं ९ २०६ सुक्ुमारता १६४ भावो के व्यंजक कौन हैं? २०७ भ्रधव्यक्ति १६४ | भावों की गणना श्ण्८ डदारता १६६ | (वात्सल्यः रस नहीं है २०८ श्रेतज १६६ | ९--हर्ष २०४ कान्ति १७१ २--हम्ृति २१० समाधि १७१ ' ३--ब्रोडा ( कछष्जा ) २१४ अन्य आचायों ४--मेह २१६ का भत १७२ | ५--ध्ृृति ९१८ शुण २० न सानकर ३ ६--शह्ढग २१७ ही मानने चाहिए १७२ | ७-लानि २२० माधुये-व्यजक रचना १७६ ' ८--दैन्य २२२ ओजे[-व्यखक रचना १७८ --चिन्ता श्२४े प्रसाद-व्यज्षक रचना १७६ १०--मद श्र रचना के दोष श्एर ११--श्रम २२-८६ साधारण देष १८रे १२--गर्ष २३१ विशेष दोष १८८४ (१३--निद्रा श्शेर
संग्रह १६४ (१४--मति हे २३३
विषय १५--व्यांधि १६--.त्रास १७--सुप्त १८-विबोध १<--अ्रमर्ष २० “--प्रवहित्य २१--उम्रता २२०-उन्मसाद २१३--मरश २४--वितके २५---विषाद २६--आ त्सुक्य २७--आवेग श्ए--जड़वा २४--भ्रा्नस्य ३००--असूया ३१--श्रपस्मार ३२--चपत्षता ३३--निर्वेद
३४--देवता श्रादि फे रस भाव आदि अलत्य
विषय मे रति
( १२ )
पृष्ठांक | विषय पृष्ठाक २३४ ' भाव ३४ ही क्यों हैं? २६५ २१५ | रसासभास १२६४ २३७ | रसाभास रस ही है
२३८ | अ्रथवा उससे मिन्न ! २७०
२४२ । विप्रत़्स्भाभास श्७द २४३ | भावाभास श्७्८ २४५ , भावशान्ति र्ए० २४७ | भावादय २८१ २८ | भाषसन्धि श्पर २४० , भावशबल्षता रेए३ २५१ , शबह्ञता के विषय में
२५३ | विचार श्पछ
२५४ | भावशान्ति भ्रादि की २५४५ | ध्यनियों मे भाव अधान २५७ | होते हैं, भ्रथवा शान्ति २१४७ | आदि ९ श्पद २६२ | रसेों की शान्ति श्रादि २६३ | की ध्यनियां क्यों नहीं २६१ | होतीं! , २४१
२६६ | क्रम ही हैं अथवा लक्ष्य
(हु 3
विषय पृष्ठांक ' विषय पृष्ठांक क्रम भी २४८१ | प्रबंधध्वनि २-5
ध्वनियों के व्यंजकक २८६ | पदैकदेशध्वनि २<€<
पदध्वनि २<६ | रागादिकों की भी
वर्ण, रचना ध्वनि. २४७ | व्यंजकता ३००
वाक्यध्वनि २४८४ । एक विचार ३००
श्रीहरिः हिंदी-रसगंगाधर प्रथम भाग
( प्रथम आनन )
निमग्नेन वलेशैमेननजलधेरन्तरुदरं मयोज्नीते। ठोके ललितरसगल्ञाधरमणि; ।
हरत्नन्तथ्वोन्तं हृदयमधिरूदे गुणवता- मलझ्टारान् सर्वानपि गलितगर्वान् रचयतु ॥ कै है ् पर
अति-कलेस ते' मनन-जरूधि के उदर-माँस दे गोत घनी । मैं जग में कीन्ही प्रकटित यह “'रसगंगावर”” छूित-मनी ॥ से हरि अधकार अतर के हिय शोमित है शुनि-गन के। सकल भअलंकारन के, करि दे गढित, गरब्र॒ उत्तमपन के ||
पुरुषोत्तम शर्मा चतुर्वेदी
* श्रीहरिः हिंदी-रसगंगाधर प्रथम भाग
तरनि-तनूजा-तटन्तरुन तरुनीवुन्द समार । जे विहरत, ते करहु सुद-मन्नछ चन्दुकुमार ॥ अंगलाचरण स्मृताईपि तरुणातपं करुएया हरन्ती वणा- मजरतनुत्विषां वरूय्रिता श्तैविद्यताय् । कलिन्दगिरिनन्दिनीतटसुरुमालम्बिनी मदीयमतिचुम्बिनी भवतु काडपि कादम्बिनी ॥ ० ध् ४ ध्क सुमिरत हू जो हरत नरन को तरुनातप करुना करिके। घेरी शत-शत बिजुरिन ते' जो मदन रद्दित तन-दुति धरिकें ॥ कल कलिन्द्तनया के तट के सुरतरु जाके हैं आश्रय । से मेघन की साल अलैकिक सम मति चुम्बन करहु सदय ॥ जो केबल स्मरण करते ही मनुष्यों के तीत्र आतप ( संसार के ताप ) को, दया करके दर॒ण कर लेती ह, जो, जिनकी शरीर-
( ४) कांति मे भप्त होने का खभाव ही नही है, उन सैकड़ों बिज- लियों ( गोषपागनाओं ) से परिव्रुत है और जिसका श्रीकालिदी के तट के सुरतरु ( कदंब ) आलंबन हैं, बह अनिर्वेचनीय मेघ- माला ( श्रीकृष्णचंद्र की मूत्ति ) मेरी बुद्धि का चुंबन करनेवाली बने--मेरी बुद्धि मे विराजमान रहे । गुरु वन्दना श्रीमज्ज्ञानेन्द्रभिक्षोरधिगतसकलब्रह्म विद्यापपश्च: काणादीराक्षपादीरपि गहनगिरो ये! महेन्द्रादवेदीत्। देवादेवाध्ध्यगीष्ट स्मरहरनगरे शासन जैमिनीयस् शेषाइप्राप्तशेषामलभणितिरभूस्सव॑विद्यापरो यः ॥ पाषाणादपि पीयूष॑ स्थन्दते यस्य छीलया । त॑ वन्दे पेरुभट्टार्यं लक्ष्मीकान्तं महागुरुम ॥ ध्छ कक ध् ध्ः जिन ज्ञानेन्द्र भिद्ठ ते सीखी सविधि बअहा-विद्या सगरी । गुरु महेन्द्र ते कणझुज-गौतम-गहन-गिरा अध्ययन करी ॥ शास्बर जैमिनी को जिन सीख्ये खण्डदेव ते' शिवनगरी । पाह शेष ते महाभाष्य जिन हृदय सकल विद्यान घरी ॥ जिनकी ढीढछा ते भरत शुचि पियूष पाषान । लक्ष्मीपति ते पेरुमंट वन््दी गुरु सु-महान ॥ जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मविद्या का विस्तार ( वेदांत शास्त्र ) श्रीमान ज्ञानेद्र मिज्षु से श्राप्त किया, कयाद और गौतम की
( ५१ ) गंभीर वाणियों ( वैशेषिक और न्याय शास्त्र ) महंद्रशास्त्री से समझकी--न कि रट लो, काशीजी में रहकर परम प्रसिद्ध खेड- ढेव पंडित से जैमिनीय शास्त्र (पृ्वंभीमासा) का अध्ययन किया और शेप कृष्णोपनामक वीरेश्वर पंडित से पतंजलि की निर्मल उक्तियाँ ( महाभाष्य ) प्राप्त की, इस तरह जा सब विद्याओ के निधान थे, जिनकी लीला से पापाण ( मेरे जेसे जड़ ) से भी अमृत ( सरस कविता ) भर रहा है, उन लक्ष्मी-( मेरी माता ) पति अथवा विष्णुरूप पेरुमट्ट नानक पूज्य पितृदेव को मैं अमिवादन करता हैँ । प्रबंध-अशंसा निमगनेन क्लेशैमननजलपेरन्वरुद्रं मयान्नोता छेके छलितरसगह्मावरमणिः । हरन्नन्तथ्वान्तं हृदयमधिरूों गुणवता- पलझ्भारान् सर्वानपि गलितार्वान् रचयतु ॥ ध्ड ध्क छठ ध्
अति-कलेंस ते मनन-जलूधि के उदर-माम्त गोत घनी ।
मैं जग से कीन्दी अकटित यह “रसगेगाघर” छलित-मनी ॥
से हरि अधकार अंतर को हिय शोभित द्वै गरुनि-गन के।
सकल अक्ंकारन के, करि # गढित, गरव उचमपन के ॥
मैंने सननरूपी जल्धि के उदर के अंदर न कि वाहर ही
ह%
बाहर, वड़े क्लेशो के लाघथ--न कि मनमैजीपन से, गोता
( ६ )
लगाकर---अथात्त् पूणेतया सोच समझकर, यह “'रसगगाघर”? रूपी सुंदर मणि निकाली है। से। यह ( रसगंगाघर मणि ) ( साहित्य शास्त्र विषयक ) भीतरी अंधकार को हरण करती हुईं और गुणवानों के हृटय पर आरूढ़ होती हुई सभी अलंकारोा (अलंकार शास्त्रो + आभूषणों ) को, (इसके प्रभाव के कारण ) अपने आप ही दूर हो गया है गवे जिनका: ऐसे बना दे | अर्थात् « इसमे अन्य सब अलंकार शास्त्रो से उत्कृष्ट होने की योग्यता है ।
परिप्कुवन्वथान् सहृदयघुरीणाः कतिपये
तथापि क्लेशो मे कथमपि गताथे न भविता | तिमीन्द्राः संक्षोम॑ विदधतु पयाधे! पुनरिमे किमेतेनायासे! मधति विफल मन्दरगिरे! ॥ ध्ड ध्े धः ध्
करे परिप्कृत गहरे, अथैनि, सहृदयतम बुघजन केते !
किन्तु कलेस न सस यह कैसेहु होय व्यर्थ ये। करिवे ते ॥
करत छुमित्त जलनिधि को सब दिन मगर मच्छु भारी भारी।
पैसे मन््दर गिरि के श्रम के है न सके निष्फलकारी ॥
सहृदय पुरुषों के अग्रणी कुछ विद्वाद लोग अर्थों का परिष्कार करते रहे, उन्हे गंभीर विचारों से भूषित करते रहे, पर ऐसा करने से मेरा यह क्लेश--यह अत्यधिक अ्रम, किसी प्रकार भी, गताथे नहीं हो। सकता । भल्लें ह्वी बड़े बड़े मगर- मच्छ समुद्र को अच्छी तरह क्ुव्ध करते रहे; पर क्या इससे,
( ७ ) अलौकिक रक्नों का उत्पादन करनेवाला, मंदराचल का परिश्रम व्यर्थ हो। सकता है ? भ्रर्थात् इन पंडितों का परिष्कार करना शास्त्र को निरा क्षब्ध करना है; पर मैंने उसे मथकर, उसमे से, यह मणि निकाली है; अत. उनका परिश्रम निष्फल है और मेरा सफल | झन्य निबंधों से विशेषता
निर्माय नूतनमुदाहरणालुरूप॑ काव्य' मयाउत्र निहितं न परस्य किश्ित् ।
कस्तूरिकाजननशक्तिभृता मगेण कि सेव्यते सुमनसां मनसाऊपि गनन््धः ॥ क् क क कक
घरी बनाह नवीन उदाहरनन की कविता | परकी कह हु छुई न, दृहा मै, पाह सुकवि-ता ॥ सग कस्तूरी-जननशक्ति राखत जो निज तन। कहा करत वह सुमन-गन्ध-सेवन हित सुजतन।॥ मैंने, इस अंथ मे, उदाहरणो के अनुरूप--जिस' उदाहरण मे जैसा चाहिए वैसा--काव्य बनाकर रक्खा है, दूसरे से कुछ भी नही लिया, क्योकि कस्तूरी उत्पन्न करने की शक्ति रखने वाला म्ृग क्या पुष्पों की सुगंध की तरफ मन भी लाता है ? अपनी सुगंध से मस्त उसे क्या परवा दै कि वह पुष्पों के गंध की याद करे ।
( ८) निर्माता और निबंध का परिचय
मननतरितोर्ण विद्याएवे। जगन्नाथपण्डितनरेन्द्र) । रसगड़ाधरनास्नीं करोति कुतुकेन काव्यमीमांसाम ॥ ,3] कि (० पक सनन तरी तरि विध्वा-जलनिधि जगन्नाथ पण्डित-नरनाथ । “रसगड्भाघर”? नाप्रक काष्या नाचल करत कुबृहल-साथ |! जिसने मनन-हूपी नौका से विद्यारूपी समुद्र को पार कर लिया है, वह पंडितराज जगन्नाथ, झुतूहल के साथ काव्यों की वह भ्राल्लोचना कर रहा है, जिसका नाम है “रसगंगाधर?? |
शुभाशसा रसगड्डाधरनामा सन्दर्भोज्यं चिरज्ञयतु | किश्व कुलानि कवीनां निसगंसम्यश्वि रक्नयतु ॥ छः कः धड डा रसगब्ााघर नाम यह ग्रथ सरबदा जय छ्ह्ड्ु । सहज सुमगश कविराज-कुल याहि पाइ प्रमुदित रह | यह “'रसगंगाधर”” नामक अथ वहुत समय के--सदा के
लिये विजय प्राप्त करे और स्वभाव से ही उत्तम--जिनको उत्तम बनाने के लिये यत् की आवश्यकता नहीं, उन कविवरो के समाजो को सुखी करता रहे |
अथारभ काव्य का लक्षण
जिस काव्य के, यश, परम-आनंद, शुरु, राजा और देवताओ की प्रसन्नता आदि अनेक फल्ष हैं, उस काव्य की व्युत्पत्ति दे! व्यक्तियां के लिये आवश्यक है। उनमें से एक है कवि-- अर्थान् काव्य वनानेवाला और दूसरा है, उससे आनंद प्राप्त करनेवाला--उसके मर्तों को समभ्तनेवाला, सहृदय। सच पूछिए ता, काव्य से आनंद उठाने के लिये, सहृदयता ही मुख्य साधन है। कवि भी यदि सहृदय हुआ / यद्यपि अच्छे कवियों की सहृदयता अनिवाय है ), ते उसे कविता-गत आनंद की प्राप्ति है सकती है, अन्यथा नहीं। इस कारण, गुण, अलंकार आदि से जिसका निरूपण किया जाता है, वह काव्य क्या वस्तु है--किसे काव्य कहना चाहिए ओ्रोर किसे नहीं-- इस वात का, पूर्वोक्त दोनों व्यक्तियां को, समझाने के लिये पहले उसका लक्षण निरूपण करते है।
रमणीय अथे के प्रतिपादन करनेवाल्ले--अर्थान् जिससे रमणीय अथे का वोध हो, उस शब्द को काव्य कहते हैं ।
रमणीय अथे वह है, जिसके ज्ञान से--जिसके बार वार अनुसंधान करने से--अलैकिक आनंद की प्राप्ति हा । यद्यपि
( १०9 )
हमसे कोई आकर कहे कि “आप के लड़का पैदा हुआ है" “आपका इतने रुपए दिए जायेंगे” ( अधवा यों समक्तिए कि “आपको लाटरी में इतने रुपए प्राप्त हुए हैं” ) ते! उन वाक््यां के ज्ञान से --उनके बार बार अन्नुसंधान से--भी हमें आनंद प्राप्त होता है; पर वह आनंद अलौकिक नही, लैकिक है, इस कारण, उन वाक्यों को हम काव्य नहीं कह सकते । ( तब नव्य-नैयायिका की रीति से जे! बाल की खाल खीचो गई है, उसे छोड़कर, यादें इस लक्षण का सार समझते तो यह हुआ कि ) “जिस शब्द अथवा जिन शब्दों के अधे के बार वार अनुसंधान करने से किसी अलौकिक आतंद की प्राप्ति हा, उसका अघवा उनका नास काव्य है? ।
यह तो है पंडितराज का काव्य-लक्षण। अब साहित्य- शाब्ष के प्राचीन आचायों के साथ उनकी जो दलोले हैं, उन्हे भी सुनिए । काव्य-प्रकाशकार आदि साहिंत्य-शास्त्र के प्राचोन आचायाँ ने लिखा है कि “दिाष-रहित, गुण एवं अलंकार सहित शब्द और अधथे का नाम काव्य है?” | अब इस विषय में सबसे पहले वे। यह विचार करना है कि--काव्य शब्द का प्रयोग केवल शब्द के लिये किया जाता है अथवा शब्द और अधथ दोनों के लिये। अच्छा, इस विषय में पंडित- राज के विचारो को ध्यान से लीजिए । वे कहते है--
“शब्द और अर्थ”? देनों काव्य नही कहे जा सकते; क्योंकि इसमे कोई प्रमाण नहीं! प्रत्युत यदि विचारकर देखे ते
( ११ )
“काव्य जार से पढ़ा जा रहा है?! “काव्य से अथे समझा जाता है”? “काव्य सुना, पर अथे समझ में न आया?! इत्यादि साव॑जनिक व्यवहार से एक प्रकार का शब्द ही काव्य सिद्ध होता है, अर्थ नही । आप कहेगे कि ऐसे व्यवहार के लिय, जिसमे कि काव्य शब्द का प्रयाग “केवल शब्द?” के विषय से किया गया हो, लक्षणा वृत्ति से काम चला लो । हम कहते हैं-..हॉँ, ऐसा हे। सकता है; पर तव, जब कि आप किसी दृढ़ प्रमाण से यह सिद्ध कर दें कि काव्य शब्द का मुख्य प्रयोग 'शब्द और अथे”” दाने के लिये ही होता है। वहीं ते हमे दिखाई नही देता। आप कहेगे--शब्द प्रमाण से यह वात सिद्ध है; क्योकि काव्यप्रकाशकारादिकों ने इस वात को लिखा है । हो, ठीक, पर महाराज, जिस पर अभियाग चलाया जाय उसी के कथन के अनुसार निर्णय नही किया जा सकता। उन्हीं से ता हमारा मत-भेद है, अ्रत: उनका कथन प्रमाण रूप से उपस्थित करना उचित नहीं । इस तरह यह सिद्ध हुआ कि शब्द और अथे दोनों का नाम काज्य है, इस वात मे कोई प्रमाण नहीं;
तव हमारे उपस्थित किए हुए पृर्वोक्त व्यवहार के अनुसार “एक प्रकार के शब्द का नाम ही काव्य है?” इस वात को कौन मना कर सकता है। इसी से, “शब्दमात्र के काव्य मानने मे कोई साधक युक्ति नहीं है, इस कारण दोनों को काव्य मानना चाहिए?” इस दल्लील का भी जवाब हो जाता है; क्योंकि उससे किक व्यवहार को हम अमाण रूप मे उपस्थित कर चुके हैं।
|
( १२ )
से। इस तरह एक प्रकार के शब्द का नाम ही काव्य सिद्ध हुआ, अत; उसी का लक्षण बनाने की आवश्यकता है, न कि अ्रपनी तरफ से कल्पित किए हुए शब्द और अथे के लक्षण बनाने की। यही वात वेद, पुराण आदि के ज्क्षणा मे भी समभनी चाहिए, अर्थात् उनका भी शव्दरूप समभककर ही उनका लक्षण वनाना चाहिए, नहीं ते यही दुदंशा उनमे भी होगी ।
कुछ लोग एक और दलील पेश करते हैं। वे कहते हैं कि--क्वाव्य शब्द का प्रयोग उसके लिये होना चाहिए, जिससे रस का उद्बोध होता हो---जिससे हमारे झंतरात्मा मे एक प्रकार का श्रानंदास्वाद जग उठे । यह बांत शब्द और भ्रथ देनो में समान है, इस कारण दोनों को काव्य कहना थुक्ति-सगत है। पंडितराज कहते हैं--यह आपकी दल्लील ठीक नही । यदि आनंदास्वाद को जगा देनेवाली वस्तु का नाम ही काव्य हो, तो आप राग को भी काव्य कहिए; क्योंकि ध्वनिकार प्रभूति सभी साहित्य-मर्मज्ञो ने राग को रसव्यंजक ( आनंदा- स्वाद का जगानेवाला ) माना है। बहुत कहने की आवश्य- कता नहीं, यदि आप रसन्यजक को ही काव्य मानने लगे ते। जितने नाख्य के अंग हैं---नृत्य-बाय आदि, सबको आप काव्य मान लीजिए। ऐसी दशा में आपको यह झगड़ा हटाना कठिन हो जायगा । इस कारण, जो रसेद्वोघन में समर्थ हा---जिससे आलंदास्वाद जग उठे--उसे ही काव्य मानना चाहिए, यह दलील पाच सिद्ध हुई।
( १३ )
इस विषय मे हम आपसे एक वात और पूछते है--शब्द और अर्थ दानां मिलकर कान्य कहलाते हैं, अथवा प्रत्यंक पृथक् पृथक ? यदि आप कहेगे कि देनों सम्मिलित रूप में काव्य के नाम से व्यवहृत किए जाते हैं, तव ते जिस तरह एक और एक मिलकर ( अथात् दो एको का यागफल्ञ ) ढा होता है--दे। सम्मिलित एको का नाम ही दो हैं; दो के अवयव प्रत्यक एक को दे। नहीं कह सकते उसी प्रकार श्लेक के वाक्य के आप काव्य नहीं कह सकते; क््यांकि वह उसका एक अवयव कंवल शब्द हैं। से इस तरह पूर्वोक्त व्यवहार -सर्वेथा उच्छिन्न हो जायगा । अब यदि आप कहेगे कि प्रत्येक को प्रथक् प्रथक काव्य शब्द से व्यवहार करना चाहिए, ता “एक पद्म मे दे काव्य रहते हैं?” यह व्यवहार होने छगेगा। सा है नही।
इस कारण, वेद, शास्त्र और पुराणों के लक्षणों की तरह काव्य का क्षण भो शब्द का ही होना चाहिए। अर्ांत् शब्द का ही काव्य मानना चाहिए, शब्द-अथ देनें का नहीं «»«
* इन दुलीलें का खडन नागेश भट्ट ने, इसकी टीका मे, बहुत थाड़े मे, बहुत अच्छे ढंग से किया है । अच्छा, आप वह भी सुन लीजिए--
नागेश कहते है--जिस तरह “काव्य सुना”? इत्यादि व्यवहार है, उसी प्रकार “काव्य समझा” यह भी न्यव॒हार है, ओर सममना अर्थ का होता है, शब्द का नहीं; अत काब्य शब्द का प्रयोग शब्द और अधे दोनों के सम्मिक्षित रूप के ढिये ही होता है, यह मानना चाहिए। वेदादिक भी केचह शब्द का नाम नहीं है, कितु शब्द-अर्थ दोनों के
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यह ते हुआ ' शब्द!” को काव्य मानना चाहिए, अथवा “शब्द-अथ”? दाला का, इस वात का विचार । अब दूसरी बात लीजिए। प्राचोन आचारयों ने काज्य के खज्ञशष से, शब्द ओर अर्थ के साथ एक विशेषण लगाया है 'गुण एवम् अलकार सहित”? | सा यह भी ठोक नहीं। क्योंकि “डुद्त' मण्डल विधेष:” इस संरकृत वाक्य अथवा “चन्द्र उग्ये। नल सांहि?? इस हिंदी वाक्य का, काई नायक के सकेत स्थान पर जाने क॑ लिये इस अमिप्राय से कहे-- प्रकाश हो गया अब कहा कॉटा खील्ला लगने का डर नहीं; अथवा काई अमिसारिका दृती से, यह समभककर क्रि--अ्रव प्रकाश हा गया, कोई ठेख लेगा, निषेध करने के लिए कहे, यद्ठा काई विरहिएी अपने सुड़द्र्ग को चह सुभाने के लिये कहे कि अब मैंन्जी सक्गी तो भी आपके हिसाव से वह काव्य न होगा, क््याकि न उसमे कोई गुण है, न अल्कार | संस्मिछत रूप का हा वास हूँ, अत एच जा सहाभाप्यकार भगवात्र् पर्तेज्षक्ति ने 'सदधीनते तद्ोदः इस पाणिनीय सूत्र की व्याज्या करते हुमु णजद्ध-अर्थ ? दे।ना को वेदादि रूप माना हैं व्रद संगत हो समता है। रही आपकी दूसरी दखोढ--जिस तरह हस एक का डे। नहीं ऋह सकते, उसी तरह दानां का नाम यदि काव्य हो तो अत्यक के लिये इस शब्द का च्यवहार नहीं हो सकता ) सा कुछ नहीं ह। एल स्थल पर हम रूट छक्तणा से काम चत्ठा सकते है---ठसके हारा अत्येक के लिये भी काच्य शक्त का प्रयोग हो सकता हैं। इस कारण “ शक्द-अर्थ” दानां को काव्य-शब्य से व्यवदन करने में काई दोप नहा ।
( १४ )
पर आप यह नहीं कह सकते कि वह काव्य नही है; क्यांकि यदि उसे आप काव्य न साने तो जिसे आप काव्य कह रहे हैं, उसे भी काव्य मानने क॑ लिये कोई उद्यत न हागा | कारण यह है कि जिस ““चमत्कारीपन” को काव्य का जीवन माना जाता है, वह इन दोनों मे समान ही है। दूसर, गुणत्व ओर अलंकारत का अनुगम नही हे--अथोॉन् आज दिन तक चह सिद्ध न हो सका कि गुणत्व और अलेकारत्व जिनमे रहते हैं, वे गुण और अलंकार अमुक अमुक ही हैं। उनकी संख्या अभी तक नियत ही न हो सकी; जिस आहल्लक्रारिक का जब जैसा विचार हुआ उसने, उसके अनुसार, उन्हे घटा दिया अश्चवा वढ़ा दिया। श्रतः गुणां और अलंकारों का क्षण ने समावेश करना उचित नही: क्योंकि जो खर्यं ही निश्चित त्तही
हैँ, उनके द्वारा लक्षण क्या निम्।ित है। सकेगा ! एर यदि आप कहे कि काज्य अधघवा रस के धर्मों का नान गुण है और काव्य में शासा उत्तन्न करनेवाले अथवा काव्य के धर्मो' का नाम अलंकार है, इस तरह युशलर आर अलंकारत्व का अबनुगम हो जाता है--अर्थात् जिनमे थे ज्लख दिखाई दें उन्हे गुण आर अलंकार समझ लीजिए, उनकी संख्या नियत न दो सकी ते क्या हुआ। तथापि हम कहेगे कि लक्षण से “दाप रहितः कहना ता अ्रयाग्य ही है; क्योकि लाक में “अनुक काव्य देषयुक्त है?” यह व्यवहार देखने से आता है। अर्थात् काव्य-पद का दोष रहित के लिये ही नही- दाष सहित के लिये
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(् ) भी प्रयाग किय जाता है | आप कहे कि वहाँ आप लत्षणा रू क्राम चला तीजिए--समभझ लीजिए कि काञज्य-- जैसा पदग्रथन उस ( दापयुक्त ) में भो है, इस कारण गाणी लक्षण के द्वारा उसे भी काव्य समझ लेना चाहिए; ते यह भी अनुचित है क््याकि जब तऊ कोई सुख्याथ का वाधक कारण उपन्धित न हा, तव तक ल्ाजणिक कहना ही नही वन सकता , लजत्जणा तभी हाती है, जब कि सुख्यार्थ का बाघ, भुख्याय से संवध और रूदि अधवा प्रयाजन ये तीनों निमित्त हाँ ,>
हाँ, एक दूसरी युक्ति आर हैं। आप कह सकते हैं कि
जैंसे एक पेड की जड पर पन्नी वैठा है, पर डाली पर नहीं, वन उस पेड़ में एक स्थान पर ( जड़ में ) पक्षी का संयोग हैं ओर दूसरे स्थान पर ( शाखा में ) संचाग का अभाव | तथापि सर्वत्र संचाग रहित हाने पर भी, एक स्थान पर संयाग होते के कारण, उस वृज् का संचोगी कह सकते हैं। ठीक इसी तरह अन्य सव स्थाना पर दाष रहित होने क॑ कारण वह काव्य कहला सकता हे आर एक स्थान पर दोष युक्त हाने क॑ कारण दोषी भी । से यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जेंसे जड़ पर पत्नी का चैठा देखकर, सब मनुष्यां का, यह प्रवीति हाठी है--कि इस वृक्ष की जड़ से पत्नी का संयाग हैं: पर शार्घा में नहीं, छत्षणा का विशेष विवरण द्वितीय भाग में होगा अत्त' दमन
यहां विशण प्रण्च नहीं क्या हैं ।
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उस तरह किसी को भी इस बात का ठीक ठीक श्रनुभव नहीं होता कि यह पद्म पूर्वाधे मे काव्य है और उत्तराध मे नहीं । अतः यह दृष्टांव यहा नही लग सकता | दृष्टात के द्वारा अनु- भव का अपलाप असंभव है---जे बात हमे प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है, वह दृष्टाव से नहीं हटाई जा सकती |
एक और भो वात है कि जिसके कारण गुण एवं अत्तंकार काव्य लक्षण मे प्रविष्ट नही किए जा सकते। वह यह है कि जिस तरह शूर-वीरता आदि आत्मा के धर्म हैं, वैसे ही गुण भो काव्य के आत्मा रस के धर्म हैं, और जिस तरह हारादिक शरीर को शोमित करनेवाज्ञी वस्तुएँ हैं, उसी तरह अलंकार भी काव्य को अलंकृत करनेवाले हैं । श्रतः जिस तरह वीरता अथवा हारादिक शरीर के निर्माण मे उपयोगी नही है, इसी तरह ये भी काव्य के शरीर को सिद्ध करने--- उसके स्वरूप का लक्षण बनाने--मे उपयुक्त नही दा सकते |
यह ते हुई प्राचीनों की बात। अब नवीनों मे से “साहित्य-दर्पशकार”” बहुत अ्सिद्ध हैं। अच्छा, 'आइए, उनके “ काव्यल्षण”” की भी परीक्षा कर डाले। उन्होने वाक्य रसात्मक काव्यम?ः यह लक्षण बनाकर सिद्ध किया है कि “जिसमे रस दे वही काव्य है?? । पर यह बन नहीं सकता; क्योंकि यदि ऐसा माने ते जिन काव्यों मे वस्तु-ब्णन अथवा अलंकार-वर्णन ही प्रधान हैं, वे सब काव्य काव्य ही न रहेगे । « आप कहेगे कि हमका यह खीकार है---हम उनको कांव्य २००२
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मानना दी नहीं चाहते । से यह उचित नहीं, क्योकि महा- कवियों का जितना संप्रदाय है, उनकी जो प्राचीन परिपाटी चली आई है, वह बिलकुल गड़बड़ा जायगी। एन्हेने स्थान-स्थान पर जल के प्रवाह, वेग, गिरने, उछलने और भ्रमण, एव बंदरों और बालकों की क्रोड़ाओें का वर्णन किया है। क्या वे सब काव्य नही हैं? आप कहेगे कि उन बशेनों मे भी किसी न किसी तरह रस का रपशे है ही, क्योंकि ऐसे वर्शन भी उद्दोपन आदि कर सकने के कारण रस से संबंध रख सकते हैं। पर यदि याँ मानने जगा ते “बैल चलता है” “हरिण दौड़ता है? आदि वाक्य भी काव्य होने लगें; क्योंकि जगत् की जितनी वस्तुएं हैं, बे सब विभाव, अनुभाव अ्रथवा व्यमिचारी भाव कुछ न कुछ हो सकती है। इस कारण प्राचीने एवं नवीने के-- देनों के-- काव्य लक्षण”? ठीक नही है ।#
“- थर्दहा हमे छुछ लिखना है । यद्यपि पंडितराज ने “काव्य छक्षण” के विषय मे उतना सूक्ष्म विचार किया, तथापि वे इसके बनाने मे सफल न हुए। इसका कारण हम पहले नागेशभट्ट की आलेचना, टिप्पणी मे, देकर सममा चुके है। उसका सारांश यह है कि केवछ शब्द को काब्य मानना ठीक नही, “शब्द और अथे” दोनो को काध्य मानना चाहिए। पर तु प्राचीन आचायों के रूच्षण मे भी “दोषरद्ित” कहना ते खंडित है, और यदि “गुण एवं अलंकार सहित शब्द और झअथ” को काव्य माने , तथापि वह उत्कृष्ट काव्य का छक्षण हो सकता है, साधारण काव्य का नही, क्योकि सभी काव्यों से गुण और अढूंकार नही रहते । इस कारण मेरे विचाराजुसार “ऐसे शब्दों और अर्थो" को
( १ ) काष्य का कारण
भ्च्छा, अब यह भी सोचिए कि काव्य का कारण--जिसके होने पर ही काव्य बन सकता है, अन्यथा नहीं--क्या वस्तु है? इस विषय मे भी पंडितराज का प्राचोनों से मतभेद है; आप उनके इस विषय के विचार भी सुनिए । वे कहते हैं-.
काव्य का कारण केवल प्रतिभा है, और प्रतिमा शब्द का अ्रथे है---काव्य बनाने के लिये जे शब्द एवं अथे अनुकूल हों, जिनसे काव्य बन जाय, उनकी उपस्थिति; अर्थात् काव्य बनाने के लिये जहाँ जिस शब्द की श्रौर जिस अथे की आब- श्यकता हो, वहाँ उसका तत्काल उपस्थित हो जाना, ऐसा नहीं कि कविजी काव्य बनाने के लिये अक्लुज्ञा रहे हैं; परंतु न ते उसमे जोड़ने के लिये कोई सुंदर पद ही मिलते हैं और न कोई ऐसी वात ही याद आती है कि जिससे उनका कारये सिद्ध हो
काव्य मानना चाहिए, जिनके सुनने एवं समझने से अलैकिक आनंद की आप्ति हो” । तभी इश्य काव्य कहना भी साथ्थंक हो सकता है; क्योकि देखने में अर्थ आा सकते है, शद्ध नही। यह्दी बाद श्र्थाढकार आदि के विषय से भी समझे । यद्यपि नाटक के पान्नादिकों का बनाने- वाढा कवि नहीं है, तथापि उस सव सामग्री को उस रूप में उपस्थित करनेवाला उसे मानने मे कोई संदेह नहीं । इस कारण उस अर्थ का निर्माता भी वह हे सकता है। “केवछ शब्द” को ही काव्य मानने के कारण “साहिल्द्पेणकार” का भी रूचण हमे सम्मत नहीं, वे “रखात्मक वाक्य” को काव्य कहते है, और वाक्य भी शब्द का ही नाम है। --अनुवादक
( २० )
जाय । उस प्रतिभा के दे! कारण है--एक ते, किसी देवता अथवा किसी महापुरुष की प्रसन्नता होने के कारण, किसी ऐसे भाग्य का उत्पन्न है! जाना कि जिससे काव्यधारा अविरत चलती रहे, श्रार दूसरा--विज्क्षण व्युत्पत्ति और काव्य बनाने के अभ्यास का होना। कितु ये तीनों सम्मिलित रूप मे कारण नही हैं; क्योंकि कई बालकों तथा अबोाधें को भी केवल महापुरुष की कृपा से ही प्रतिभा उत्पन्न हो गई है ( जैसे कि कवि करणपूर के विषय से किंवदंती है )। आप कहेंगे कि वहाँ हम उस कवि फे, पूर्वजन्म के, विलक्षण ( जैसे दूसरों मे नहीं होते ) व्युत्पत्ति और काव्य करने का श्रभ्यास मान लेंगे । भ्र्थात् उसने पूर्वजन्म से इन बातों को सिद्ध कर लिया है, अब किसी महापुरुष की कपा होते ही वे शक्तियाँ जग उठी । पर यों मानने मे तीन देष हैं--
१--गैरब अर्थात् जब उन दोनों के कारण न मानने पर भी कंवल अदृष्ट (भाग्य) से काम चल्न सकता है, ते क्यों उन दोनों को उसके साथ लगाकर कारणों की संख्या बढ़ाई जाय ।
२--मानाभाव अर्थात् इसमे कोई प्रमाण नहीं कि, ऐसे स्थान पर भी, इन तीनों को सम्मिलित रूप मे ही प्रतिभा का कारण मानना चाहिए |
३--कार्य का बिना तीनों के कारण मानने पर भी सिद्ध हो जाना ।
5,
जब कि वेदादिक किसी प्रबल प्रमाण से यह सिद्ध किया गया हो! कि अमुक वस्तु असुक वस्तु का कारण है; पर हम संसार में कुछ स्थानों पर ऐसा देखते हों--उस वस्तु ( कारण ) के रहते हुए भी वह वस्तु ( काये ) उत्पन्न न हो, अथवा उसके न रहने पर भी वह उत्पन्न हे जाय, तब हमको, विवश होकर ( क्योंकि वेदादिक भ्ूूठे तो हो। नहीं सकते ), यह मानना पड़ता है--इसका कारण, उस व्यक्ति का-- जिसको कारण के बिना भी कार्य की प्राप्ति हे! रही है अथवा कारण के होने पर भी काये की प्राप्ति नही हो रही ऐ--पूर्व-' जन्म में किए हुए, घर्म-अधर्म आदि हैं। पर यदि वेदादिक प्रबल प्रमाण के द्वारा कारण न घताए जाने पर, हमारे निश्चित किए हुए कारणो मे भी, हम किसी वस्तु को किसी वस्तु का कारण बताकर जहाँ गड़बड़ आने लगे, कह दे कि--इस बात को उसने पूर्बजन्म मे कर लिया है, अतः ऐसा हो गया, ते अम होने लगे---ज्लोग किसी को भी किसी वस्तु का कारण बताने लगे । अतः पूर्वोक्त स्थल मे पूर्व जन्म के व्युत्पत्ति और अभ्यास को कारण मानना उचित नही; क्योंकि व्युत्पत्ति और अभ्यास के बिना कविता हो ही न सके यह बात कुछ वेद मे थोड़े ही लिखी हुई है कि जिसके लिये यह पंचायत करनी पड़े ।
'अब यदि आप कहें कि हम इस गड़बड़ मे पड़ना नहीं चाहते, हम ते केवल अदृष्ट को ही कारण मान लेगे। से भी ठीक नही; क्योंकि बहुतेरे मनुष्य ऐसे देखने मे आते हैं कि
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वे बहुत समय तक काव्य करना जानते ही नहीं, पर कुछ दिनो के अनतर जब उनको किसी प्रकार व्युत्पत्ति और अभ्यास हो जाता है, तब उनके, प्रतिभा उत्पन्न है| जाती है--वे काज्य बनाने शगते है। यदि वहाँ भी अद्ृष्ट को कारण मानने लगो वे व्युत्पत्ति और अभ्यास के पहले ही उनमे प्रतिभा क्यों न उत्पन्न हे गई ? आप कहेगे--थोड़े दिन के लिये उनका कोई बुरा अदृष्ट मान लीजिए, जिसने प्रतिभा की उत्पत्ति को रोक दिया; ते हम कहेगे कि प्राय: व्युत्पत्ति और भ्रभ्यास होने पर ही कविता बनानेवाले अधिक देखने मे आते हैं, इस कारण अनेक स्थानों पर दे दे। ( भ्रच्छे और बुरे ) अद्ृष्ट मानने की अपेक्षा, कविता के रोक देनेबाले अदृष्ट के नाश करने के लिये, आपको, जिन व्युत्पत्ति और अभ्यास की कल्पना करनी पड़ती है-- जिनके उत्पन्न होने से प्रतिबंधक अ्रदृष्ट नष्ट हो जाता है, उन्ही को कारण मान लेना उचित है। इस कारण हम जो पहले वता आ्राए है कि इन तीनो को ( अर्थात् अद्ृष्ट को प्रथक् और व्युत्पत्ति-अस्यास को प्रथयक् ) कारण मानना ही सीधा रास्ता है । अब एक और शंका होती है--यदि अ्रद््ट से भी प्रतिभा उत्पन्न होती है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास से मी, और काव्य दोनों से बन सकता है, ते दे भिन्न मिन्न कारणों से एक ही प्रकार का काम (प्रतिभा ) उत्पन्न होने के कारण दोनों के कामे। मे गोटाला हो जायगा। और यह उचित नही,
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क्योकि प्रकृति का नियम है कि भिन्न सिन्न कारणों से कार्य भी मिन्न सिन्न ही उत्पन्न हे । इसका उत्तर यह है--यद्यपि प्रतिमा देनो का नाम है, तथापि अदृष्ट से उत्पन्न होनेवाली प्रतिभा दूसरी है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास से उत्पन्न होने- वाली दूसरी, अतः अद्ृष्ट और व्युत्पत्ति--अभ्यास के कामे मे गाटाल्ा नहीं हो सकता । (इस बात को हम उदाहरण देकर स्पष्ट कर देतें हैं--जैसे गन्ने से भी शक्षर बनती है और चुकंदर से भी, और लड्डू देनों से वन सकते हैं, पर दोनों शक्कर भिन्न भिन्न प्रकार की होती हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त दे मिन्न भिन्न कारणों से उतपन्न होनेवाली देनों प्रतिभाएँ मिन्न सिन्न हैं और उन देनो से काव्य वन सकता है। ) बस, काव्य बनने के लिये किसी प्रकार की प्रतिभा होने की आवश्यकता: है। तात्पय यह कि दोनो प्रकार की प्रतिभाओं से एक ही प्रकार का काव्य बनता है, काव्य मे कोई भेद नहीं होता । दूसरा पक्ष यह है--देनें प्रतिभाओं से काव्य भी भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं--अर्थात् अद्ृष्ट से जे प्रतिभा उत्पन्न होती है, उससे बना काव्य दूसरे प्रकार का द्ोता है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास से उत्पन्न हुई प्रतिभा से बना दूसरे प्रकार का। अतः उन दोनों कारणों के कार्यों का कही भी मिलान नहीं होता, वे दोनों ठेठ तक भिन्न ही भिन्न रहती हैं ।
इसके अनंतर एक वात और रह जाती है। वह यह कि-. जिन भलुष्यो मे व्युत्पत्ति और अभ्यास दोनो होते हैं, उनमे भी
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प्रतिभा क्यों नही उत्पन्न होती ? इसके विषय में हम पहले हो कह चुके हैं कि वे व्युत्पत्ति और अभ्यास विज्कक्षण ( विशेष प्रकार के ) होते हैं। उन लोगो मे वे वैसे नहीं होते; अतः उनसे काव्य नहीं वनाया जा सकता। अथवा, किसी बिशेप प्रकार के पाप को उनकी प्रतिभा का प्रतिबंधक मान लेना चाहिए। आप कहेगे कि आपको यह भूगड़ा नया उठाना पड़ा, ते हम कहते है--यह नया नहीं है, यह ते तीनो को इकट्ठे कारण माननेवाले श्र केवल प्रतिभा अथवा शक्ति को कारण माननेवाले--देने के लिये समान ही आवश्यक है, क्योंकि प्रतिवादी जब मत्रादिका से, कुछ दिनों के लिये किसी अनेक काव्य वनानेवाल कवि की भी वाशी को रोक देता है, तो उससे काव्य नहीं वनाया जाता, यह देखा गया है ।+
» यहाँ महौमद्ापाध्याय श्रीगगाघर शास्त्रीजी की टिप्पणी है, जिसका सारांश थह हे-प्रतिभा, व्युत्पत्ति ओर अभ्यासत--वीनें को सम्मिलित रूप में ही विशिष्ट कान्य का कारण मानना उचित है । विशिष्ट काव्य का अर्थ है अक्ौकिक वर्णन श्री निषुणता से युक्त कवि का कार्य । अब देखिए, शक्ति दो प्रकार की देती है--एक काज्य को उत्पक्ष करने- चाढी और दूसरी ( कवि को ) च्युत्पज्ञ करनेवाली । उनमें से दूसरी-- ब्युत्पादिका-शक्ति का नाम ही निषुणता है। और अभ्यास से काव्य में अलेकिकता आती है । पहली शक्ति से पद जोड़ देने पर भी दूसरी शक्ति के न होने पर विछक्षण वाक्यार्थ का ज्ञान न होते के कारण कवि मे श्रक्ोकिक वर्णन की निषुणता न हो। सकेगी । अत यही उचित है कि प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अम्यास तीनो के--सम्मिलित रूप
--काब्य का कारण साना जाथ ।
( २४ ) काव्यों के भेद
जिस काव्य के विषय में इतना विवेचन किया गया है, चह काव्य चार प्रकार का होता है। १--उत्तमोत्तम, २--- उत्तम, ३--मम्यम और ४--अघम ।
इस पर हमे कुछ छिखना है । सुनिए आचीन और नवीन सभी आचायों के मत से काव्य उसी रा नाम है, जो चमत्कारी हो, केवल तुकबदी-मात्र के किसी ने भी काच्य नहीं माना । अर्घातू जिसे आप विशिष्ट काव्य कहते है, उसी का नाम तो काव्य है। तब यह सिद्ध होता है--जिप्ते आप उत्पादिका शक्ति मानते है, वह काव्य की उत्पादिका तभी ह। सकती है, जब कि उसमें पूर्वोक्त कवि कर्म को उत्पन्न करने की योग्यता है, न कि केवल तुकबंदी करवा ढेने की । अत- एव काव्यप्रकाशकार का “शक्तिनिषुणता' ” इस हछोक की व्याख्या करते हुए, शक्ति के विषय मे यह लिखना सगत द्वोता है कि “शक्तिः कवित्ववीजरूप: संध्कारविशेषः, याँ बिना कान्य न श्रप्तरेत्, प्रसव वो- पहसनीय' स्थात् ।” ( अथांत् शक्ति एक प्रकार का सह्कार है, जो कि कविता का घीजरूप है, जिसके विना काव्य फेल नही सकता अथवा यों कहिए कि फेढने पर भी उण्हसनीय होता है। अन्यथा विना शक्ति के बनाए हुए काव्य के उपहसनीय लिखना कुछ भी तात्पय नरख सकेगा, क्योकि बिना शक्ति के काव्य उत्पन्न ही नही दाता, तब उपहास किसका होगा ? अतः यह सानना चाहिए कि काच्यप्रकाशकार के हिसाब से अनुपहसनीय अथवा आपके हिसाव से विशिष्ट काव्य के उत्पन्ष करनेवालो शक्ति का नाम ही, शक्ति है और उसे ही कहते है प्रतिभा । अतएूव जब किसी की रचना चमत्कारी नहीं होती तो हम कहते है कि कवि में अतिभा नहीं है। साधारण पढयेजना की शक्ति को प्रतिभा
( २६ ) उत्तमोत्तम काव्य
“/उत्तमोत्तम?” काव्य उसे कहते है, जिसमें शब्द और अथ्थ दोनो अपने को गाण ( अप्रधान ) बनाकर किसी चमत्कार- जनक अथ को अ्रभिव्यक्त करे--व्यजनाबत्ति से समझ्कावे |
इस लक्षण मे 'किसी चमत्कार-जनक अथे को व्यक्त करे?” इस कथन से यह सिद्ध हुआ--जिसमे व्यग्य अत्यंत गूढ़ है| अथवा गत्य॑त स्पष्ट हो, वह काव्य उत्तमेत्तम नही हो सकता, क्योकि ऐसे व्यंग्यो की चमत्कारजनकता नष्ट हो जाती है। यही वात जिसमे व्यग्य सुंदर न हो, उसके विपय में भी समझे । अपरांग ( अर्थात् किसी दूसरे अथे का अंग ) और वाच्यसिद्धय ग (अर्थात् जिसके बिना वाच्य अथे सिद्ध ही न हो) व्यंग्य भी चमत्कारी होते है; अतः इस लक्षण से उन्तका भी प्रहण न हा जाय, इस कारण, लक्षण मे “अपने को गैश वना- कर”? कहद्दा गया है; जिसका यह अश्रमिप्राय है कि शब्द ओर अथे ( वाच्य ) देनों से व्यंग्य की प्रधानता होनी चाहिए, से। उन देनें मे नही होती, अत. वे भी उत्तमात्तम काव्य नहीं हो सकते |
के रूप मे परिशत करना च्युत्पत्ति और अभ्यास का काम है। अत' उनको प्रतिमा का कारण सानना ही युक्तिसगत है, सहकारी मानना नहीं । सो तीनों के सम्मिलित रूप में कारण मानने की अपेक्षा अतिम दोनें के अ्रतिसभा का कारण सानना और केवल प्रतिभा को काज्य का कारण मानना, जैसा कि पंडितराज का मत है, उचित जेंचता है ।
( २७ ) उद्ाहरण-- शयिता सविधेज्प्यनीश्व॒रा सफलोकत्तमहे मनारथान् | दयिता दयिताननाम्बुज॑ दरमीलन्नयना निरीक्षते ॥ कै |] ध्े क् साई सविध, सकी न करि सफल सनेग्थ मश्ल् । निरखति कछु सीचे नयन प्यारी पिय-सुखकज्ञ ॥
प्रियवमा अपने प्रियतम के समीप साइ है; पर आश्चये है कि वह अपने मनारथे को सफल करने मे असमथ्थे है--- उसकी शक्ति नहीं है कि वह अपनी अभिल्लाषाओ के पूर्ण कर सके, अतः नेत्रो को कुछ कुछ सुकुलित करती हुई प्रियतम के मुख-कमल को देख रही है।
इस श्लोक मे नायिका की रति के आलंवन नाण्क कं, पति-पत्नो के समीप सोने के कारण प्राप्त हुए एकांव-स्थान आठि उहीपन के, कुछ कुछ सुकुलित नेत्रो से देखने रूपी अनुभाव के, और देखने के कुछ कुछ होने के कारण व्यक्त हानेवाली लज्जा तथा देखने के कारण व्यक्त हानेवाले औत्सुक्य रूप व्यमिचारी भावो के संयोग से रति ( स्थायी भाव ) की अभि- व्यक्ति होती है--अथवा यों कहिए कि पति-पत्नी का पार- स्परिक प्रेम प्रतीत होता है। आलंवन आदि पदार्थों का स्वरूप ( अर्थात् वे क्या वस्तु हैं, यह ) आगे वर्णन किया जायगा |
अब यहाँ एक शका उत्पन्न होती है--इस पद्य मे “रति की अभिव्यक्ति होती है?” यह न मानकर “ यदि यह से गया हो,
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ते मैं इसका मुँह चूम लूँ?” इस नायिका की इच्छा की ही अमि- व्यक्ति क्यों न सान ली जाय । इसका समाधान यह है---पद में लिखा है कि “बह अपने मनोारथों को सफल करने में असमर्थ है?” , जिससे यह सिद्ध होता है कि उसके हृदय मे सब मनेरथ विद्यमान हैं, और चुंबन की इच्छा भी एक प्रकार का सनारथ ही है---मने।रत्र शब्द से ही सामान्य रूप से उसका भी वर्णन हो जाता है; इस कारण वह वाच्य है, व्यंग्य नही । पर आप कहेगे कि सनोरथ शब्द से सामान्य इच्छा के वाच्य होने पर भो “चुंबन करूँ?” इस विशेष विषय से युक्त इच्छा के व्यंग्य होने मे क्या वाधा है? इसका उत्तर यह है कि--चमत्कार नहीं रहेगा, वस यहीं बाधक है; क्योंकि जे पदार्थ विशेष रूप से व्यंग्य हो, वह भी यदि सामान्य रूप से वाच्य हो जाय, ते उसकी सहृदयों के हृदय से चसत्कार उत्पन्न करने की, शक्ति नष्ट हो जाती है। अलंकार शास्त्र के ज्ञाताओं ने उसी व्यंग्य को चमत्कारी स्वीकार किया है, जे किसी तरह भी अमिधादृत्ति का स्पशे न करे। दूसरे, चुबन की इच्छा को जब रति का अनुभाव माने तभी वह सुंदर हे। सकती है; अन्यथा जिस प्रकार “चुंबन करता हूँ?” यह कहने मे कोई चमत्कार प्रतीत नहीं होता, उसी प्रकार उसमे भी कोई चमत्कार न हो सकेगा , अतः वह रति की अपेक्षा गौण ही है, प्रधान नहीं |
इसी तरह इस श्लोक मे ल्जा सी (यद्यपि व्यग्य है, तथापि) मुख्यतया व्यंग्य नही हे! सकती । इसका कारण यह है कि
( २८ )
“्ेत्रो को कुछ छुछ मुकुलित करती हुई” इस नायिका के विशेषश से लज्ञा भ्रमिव्यक्त होती है। श्लोक मे उस विशे- पण का सिद्ध वात क॑ झअनुवादरूप से बर्णन किया गया है, विधेयरूप मे नहीं--अर्थात् उसका विधान नहीं है। तब उस विशेषण से पूर्णतया संवंध रखनेवालों जज ही इस श्लोक का प्रधान अथ है, यह नहीं कहा जा सकता । आप कहेंगे कि-- नही, श्लोक मे लिखा है कि ''नित्रो को कुछ कुछ सुकलित करती हुई'''“**देख रही है?”, इस कारण यह ते आपको भी मानना पड़ेगा कि श्लोक मे इस प्रकार देखने का विधान है, अत. वह अनुबाद्य अथे से ही पूर्णतया संवंध रखती है यह नहीं कहा जा सकता । हम कहते है कि ठोक; पर इस तरह भी लजा का कार्य आँखां का मीचना हे! सकता है, देखना नहीं। श्लोक मे आँखें के कुछ कुछ मीचने के साथ ही देखने का वर्णन किया गया है झौर देखना विना रति (आंतरिक प्रेम) के हे। नहीं सकता । यदि इस श्लोक से लजा को ही व्यक्त करना होता, ते “आँखे' मुकुलित कर रही है?” यही लिख देत, देखने की बात उठाने का कोई विशेष प्रयाजन नही रह जाता । श्रव सोचे! कि जिस प्रकार, अभिधादृत्ति के द्वारा, र॒ति के अनुभाव ( कार्य ) “देखने?” की अपेक्षा लब्गा का अनुभाव “आँखें का मीचना?” गौण हे रहा है, वह देखने का विशे- पण वन रहा है, उसी प्रकार, व्यजनावृत्ति के द्वारा, लज्जा का भी रति की अपेक्षा गौण होना ही उचित है ।
( ३० )
यह ते है रस ( सभोग खगार ) का उदाहरण--अर्थात् इस पद्म के शब्द और अथे गौण होकर रति को व्यक्त करते हैं। इसी प्रकार भाव ( हर्ष आदि व्यमिचारी भाव ) भी अभिव्यक्त होते है। अच्छा, इसका भी उदाहरण लीजिए---
गुरुमध्यगता मया नताज्ञी निहता नीरजकेरकेण मन्दस् | दरकुण्डलताण्डव॑ नतश्न लतिक मामवलोक्य धृर्णिता5ब्सीव्॥ ध् ध् ड्ः ध् हनी ग़ुरूुन बिच नतम्ुखी कमलू-मुकुछ ते कूमि। कुण्डल कछुक नचाइ, सै नाइ, निरखि गइ घूमि॥
नायक अपने मित्र से कह रहा है--सास-ननद आदि गुरुजनों के वीच मे बैठो हुई अतएव ल्ज्जा के सारे नम्न प्रिय- तमा को, मैंने, हलके हाथ से, कमल की डोडी से मार दिया। उसने कुंडलो को कुछ नचाकर एवं सांहे नीची करके सुझे देखा और फिर (दूसरी तरफ) घूम गई--सुँह फेर लिया ।
इस पद्म मे “घूम गई” इस वाक्य से “ऐ। बिना सेचे समझे कर गुजरनेवाले | तेंने यह अलुचित कार्य क्यों कर डाला?! इस श्रथ से युक्त “अमष”? भाव प्रधानतया ध्वनित होता है; और उसकी अपेक्षा श्लोक के शब्द और अर्थ गौण हे। गए है--अर्थात् उनमे वह मजा नहीं है, जो श्रमप॑ भाव की अभिव्यक्ति मे है ।
अब एक दूसरे विचार से उत्तमोत्तम काव्य का एक उदा- हरण और देते हैं। वह विचार यह ऐ--अवब तक जितने
( ३१ )
अलंकार शास्त्र के आचाये हुए हैं, उन सबने रस भाव भआदि को असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य माना है--प्र्थात् इनके प्रतीत होने के पूरे विभावादिकों की उपस्थिति आवश्यक है और उनकी अभिव्यक्ति के अ्रनंतर ही रस भाव आदि की अमि- व्यक्ति द्वोती है; पर बीच के समय के भ्रति सूक्ष्म होने के कारण उनका क्रम ( पूर्वांपरभाव ) हमे ल्क्षित नहीं होता। यह एक नियत बात है, इससे विरुद्ध कभी नहीं होता | पंडित- राज का सिद्धात है कि रस भाव आदि संलक्ष्यक्रमव्यंग्य भी होते हैं--अ्र्थात् उनके पूर्व विभाव आदि की प्रथक् प्रतीति होकर, उसके अनंतर भी उनकी प्रतीति होती है। उदा- हरण लीजिए---
तल्पगता5पि च सुतनु। र्वास[सद्भ न या सेहे। सम्प्ति सा हृदयगरत प्रियपाएं मन्दमाक्षिपति ॥ भर ३ १ सेज सुद्दे हु सुतनु जो सांस परसि अकुछाय । वह अब पिय-कर हिय घर-थो हरुए रद्दी उठाय ॥ जे! सुकुमारी नववधू , पलंग पर सोई हुईं भी, श्वास के लगने मात्र से अद्ों का सिकाड़ने लगती थी--बही इस समय ( पति के परदेश जाने की पहली रात्रि मे ) हृदय पर धरे हुए शंकायुक्त पति के हाथ को हटा रही है, पीछे अपनी जगह पहुँचा रही है; पर धीरे-धीरे ।
( ३२ )
यहाँ “धोरे घीरे हटा रही है?” इस कथन से रति नामक स्थायी भाव संलक्ष्यक्रम होकर व्यक्त हो रहा है। स्थायि- भावादिक भी संलक्ष्यक्रम व्य'ग्य होते है, यह भ्रागे सिद्ध किया जायगा | काव्य फे इसी (उत्तमात्तम) भेद को “'ध्वनि- काव्य”? कहा जाता है , अप्पय दीक्षित के विवेचन का खंडन यहाँ पर, अप्पय दीक्षित ( जो अलंकारशास्त्र के सुम्सिद्ध विद्वाब थे ) ने “चित्रमीमासा?” नामक ग्रंथ मे जे। एक ध्वनि- काव्य के उदाहरण का विवेचन किया है, उसका खेडन पंडित- राज ने, लिखा है। भ्रच्छा, आप वह भो सुन लीजिए-- - वह उदाहरण यों है । किसी नायिका ने एक दूती को श्रपने नायक के पास भेजा कि वह उसे बुल्ला त्वावे; पर वह स्वयं ही उससे रमण करके लैटी, और लगी इधर उधर की बाते बनाने । विदग्ध नायिका को यह बाव बहुत खटकी, पर बह इस बात की स्पष्ट कैसे कह सकती थी, अतः उसने उससे यों कहा-- निःशेषच्युतचदनं स्तनतर्ट निम हरागोज्यरो नेत्रे दूरमनखने पुछकिता तन्वी तवेय॑ तनु! । मिथ्यावादिनि दूति | वान्धवजनस्याज्ञावपीडागमे बापीं स्नातुमिते! गताउसे न पुनस्तस्याउधमस्या5न्तिकम्॥ है मूठ वालनेवाली दूती |! तू अपने बाँधव ( नायिका ) के ऊपर जो वीत रही है--उसे जो दुःख हो रहा है--उसे
( ३३ )
नहीं जानती अतएव तू यहाँ से बाबवड़ी नहाने गई थी, उस अधम ( नायक ) के पास नहीं। यह तेरी दशा से सूचित हो रहा है। देख तेरे स्तनों के ऊपर के भाग का चंदन हट गया है, नीचे के होठ का रंग ( तांबूल का ) बिलकुल साफ हो गय है, नेत्र पूर्णतया ( पर आंतरिक भ्रमिप्राय यह है कि प्रांत भागो मे ) अंजन-रहित हो गए हैं और यह तेरा दुबला- पतला शरीर रोमांचित ही रहा है। इस पर शभ्रप्पय दीक्षित यों विवेचन करते हैं। वे कहते हैं कि “स्तनों का चंदन साड़ी की रगड़ से भी हट सकता है, इस कारण नायिका ने “सब” कहा; जिससे यह सिद्ध होता है कि सब चंदन ( बिना मर्दन के ) साड़ी की रगढ़ से नहीं हट सकता। पर नहाने से भी सब चंदन हट सकता है, इस कारण “ऊपर के भाग का? कहा; जिससे यह सिद्ध होता है कि तूने स्नान नही किया; क्योंकि यदि तू स्नान करती ते सब स्थान का चंदन उड़ जाता; पर तेरे ते केवल ऊपर के भाग का ही छड़ा है, ऐसा आलिगन से ही हे। सकता है। इसी प्रकार तांबूल लेने मे यदि देरी हे जाय ते द्वोठ का रंग फीका हो ' सकता है; से नही है, यह समझाने के लिये उसने “बिलकुल साफ हो गया है? कहा; क्योंकि ऊपर के होठ के रौँगे हुए रहने पर नीचे का होठ बिना चुंबन के श्रेर किस तरह साफ हो सकता है ९” यहाँ से लेकर यह भी ध्वनि का उदाहरण है?” यहाँ तक के अंथ से यह सिद्ध किया गया है कि जो
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( ३४ )
“ऊपरी भाग?”--आदि शब्दों से बने हुए वाक््यों के अर्थ हैं, वे संभाग के अंग--आलिगन, चुंबन आदि के प्रतिपादन के द्वारा प्रधान व्यंग्य (संभाग ) के व्यक्त करने में सहायता करते हैं। भ्र्थात् इस प्रकार के कथन से यह प्रकट होता है कि दूती की यद्द दशा संभोग से ही हुई है, अ्रन्य किसी भ्रकार नहीं ।
पंडितराज कहते हैं कि अप्पय दीक्षित का यह विवेचन अलंकारशास्त्र के तत्व को न समभने के कारण है; क्योंकि ऐसा करना--इन बातें का अन्य सब वस्तुओं से हटाकर केवल संभेग मे ही लगाना--सब पुराने अ्ंथों से एवं युक्ति से विरुद्ध है । देखिए---
काव्यप्रकाशकार! ने पंचम छल्बलास के अंत मे इसी उदा- हस्ण का विवेचन करते हुए कहा है-- पूर्वोक्त उदाहरण मे जे “चंदन का हटना? आदि लिखे हैं, वे दूसरे कारणों से भी हो सकते हैं, कंबल संभाग के द्वारा ही नहीं; क्योंकि इसी श्लोक में उनका स्नान का कार्य बताया गया है; इस कारण वे कार्य एक ही वस्तु से संबंध रखते हों ऐसे नही हैं, दूसरी वस्तुओं से भी हो सकते हैं?” और वहीं उन्हींने व्यक्ति- विधेक!”-कार का जे। यह मत है कि-- भम# धम्मिअ ! वी सत्थे से सुणओ अज्न मालिदे देश | गोलाणईकच्छकुड्ड्वासिणा दरी असीहेण ॥
८ किसी नायिका ने गोदावरी नदी के तीर-वर्च्ती एक कुज को अपना संकेतस्थान बना रखा था, पर वहाँ एक महात्माजी नित्य पुष्प लेने के
( ३५ )
इत्यादिक स्थलों मे हेतु से कार्य-ज्ञान होता है, और “हेतु से कार्य के ज्ञान होने का नाम अनुमान है, और व्यंजना से भी यही वात होती है, अतः व्यंजन और अनुमान मे कोई भेद नहीं !? इसका खंडन करते हुए, “व्यभिचारी (अन्यगासी) और असिद्ध होने का जिन देतुओं मे सन्देह है, उनसे भी अथे ध्वनित हो सकता है, पर अनुसान नहीं हो सकता” यह खीकार किया है। इसी प्रकार “ध्वनि? ( व्यंजनावृत्ति और व्यंग्यों के प्रतिपादन के मूलअंथ ) के कर्चा ( राजानक आनंदवर्धनाचार्य) ने भी माना है । तव यह सिद्ध हुआ कि “जिन शब्दों भ्रथवा अर्थों से अन्य अथे ध्वनित होते है, वे ज्यंजक अर्थ साधारण ही होते हैं,--अर्धात् वे व्यंग्य से भी संबंध रखते हैं, और अन््यां से भी अनुमान की तरह असाधारण नहीं?” इस बात को प्रतिपादन करनेवाले प्रामाणिक विद्वानों के अंघों के साथ, उन व्यंजकों को अ्रसाधारण--किसी विशेष बस्तु से ही संबंध रखनेवाले---बतानेवाले तुम्हारे अंध का, विरोध स्पष्ट है | ' लिये जाया करते थे; इस कारण संकेत का भंग होते देखकर उससे. उससे कहा-- हे धर्मचारिन् ! अब आप विश्वस्त द्वोकर फिरते रहिए, क्योंकि जिस कुत्ते से आप डरा करते थे, उस कुत्त को, आज, गेदावरी नदी के जलूप्राय प्रदेश के कुंज मे रहनेवाले मत्त सिंह ने मार दिया। तातय थह है कि घर मे कुत्त से ढरनेवाले पंडितजी |! थदि आप कुंज भे पहुँचे तो फिर प्रायों का कुशछू नहीं है--उन्हें विदाई देनी ही पड़ेगी ) इस से यह अभिव्यक्त द्वाता है कि “आप वहाँ न जाइपएया [??
( हेई )
यह तो हुई पुराने अंथो से विशाध की बात। अब हम आपसे पूछते हैं--आप जो “सब चंदन हट गया है? इत्यादि वाक्या्थों' को बाबड़ी मे नहाने से हटाकर केवल संभोग के ही सिद्ध करने से क्वगा रहे हैं, से! क्यों लगा रहे हैं ? इससे व्यंग्य अथे निकल सके इसलिये १ सो ते है नही; क्योंकि व्यग्य अथे निकल्लने के लिये “उसको व्यक्त करनेवालों वस्तुएं उसी से संबंध रखनेवाली होनी चाहिएँ, वे और किसी से संबंध न रखे?” इस बात का होना आवश्यक नहीं है। देखिए, दूती नायक से संभोग करके नायिका के पास आई है। उसकी दशा देखकर नायिका उससे कहती है-- ओण्णिद दोब्बक्न' चिन्ता अलसत्तण स्णीससिअम् । मह मन्द भाइणीए केरं सहि | तुद वि अहह ! परिहव३ ॥ है सखि ! हाय | मुझ मंदभागिनी के लिये तुझे भी जागरण, दुबेलता, चिंता, आलस्य और दम भरजाने ने दवा रखा है, तू भी इनसे दुःखित हो! रही है। यहाँ जागरण आदि बाते" जैसी संयेगिनी (दूती) मे हैं, वैसी ही वियेशगिनी ( नायिका ) मे भी हैं, एव ये ही बाते" रोगादि से भो हो सकती है; अतः ये सर्वथा साधारण बाते' हैं। पर इन्हीं बातों पर जब यह विचार करते है--इनकी कहनेवाली कान है और वह इन बातें को किससे किस अवसर पर कह रही है तो स्पष्ट हो जाता है कि वह उसके संभाग को लक्ष्य करके कद्द रही है। अतः यह सिद्ध हुआ कि किसी बात का साधारण अथवा झसा-
( डे७ )
धारण होना उस बात से कोइ व्यंग्य नहीं निकाल सकता, किंतु उसका कहनेवाला कौन है, वह बात किससे कही जा रही है इत्यादि के साथ उसको समभने पर, व्यंजक साधारण हो अथवा असाधारण, व्यंग्य समझ मे आ सकता है । प्रत्युत यदि वह बात ऐसी हो। कि जे! किसी विशेष वस्तु से ही संबंध रखती हो, ते! बह अनुमान के अनुकूल देगी और व्यंजना के प्रतिकूल--- अर्थात् उससे व्यजना नहीं, अपितु अनुमान होगा। अब यदि आप कहे कि ऊपरी भाग?” आदि शब्दों से रचित होने पर भी “सब चंदन उड़ गया है?” इत्यादि वाक्याथे असा- धारण न हुए; क्योंकि गीले कपड़े से पुँछ जाने आदि से भी वे बाते" हो सकती हैं; तो हम आपसे पूछते हैं कि बावड़ी के स्नान के हटा देने से क्या फंत्ञ हुआ, उसके लिये क्यों इतना परिश्रम किया गया ? क्योंकि जिस तरह एक स्थान पर व्यसि- चरित हेोना--संभोग के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु से संबंध रखना--अलुमान के प्रतिकूल है प्रौर व्यंजना के नहीं, उसी प्रकार अनेक स्थानों पर व्यभिचरित होना भी। शअ्रत: यह सब प्रयास व्यथ है।
यह ते। हुई एक बात | भ्रब एक दूसरी बात और लीजिए। नायिका के इस कथन से यह व्यंग्य निकलता है कि “तू उसके पास' ही रमण करने गई थी” । विचारकर देखने से ज्ञात होगा कि यह व्यंग्य दे बातों से वता हुआ है। उनमे से एक बात है “उसके पास हीं गई थी” यह, और दूसरी है
( रै८ )
वहाँ जाने का फल्ल रमण”? । इनसे से “उसके पास ही गई थी”? इस अंश को व्यंग्य सिद्ध करना, तुम्हारे हिसाब से, कठिन है। तुमने जो रीति बताई है, उसके अनुसार “सब चंदन हट गया?” इत्यादि विशेषण वाक्यों के भ्रथ बाबड़ी के स्नान मे तो लग नही सकते; क्योंकि तुमने वैसा करने मे बाधा उपस्थित कर दी है; समझता दिया है कि वे वापी-स्नान मे नही लग सकते, अतः वाच्याथ में सब वाक्य के जे! प्रधान अथे हैं कि “बावड़ी नहाने गई थी, उसके पास नहीं ग३”? इन शब्दों मे विपरीत लक्षणा करनी पड़ेगी, तब उनका यह प्रथ होगा कि “बावड़ी नहाने नही गई?”?, “उसके पास ही गई थी” । अर्थात् वाच्य अर्थ मे जहाँ “गई थी?” कहा है, वहाँ “नहीं गई थी”? अथे करना पड़ेगा और जहाँ “नहीं गई थी”? कहा है, वहाँ “गई थी?” अथे करना पड़ेगा, भ्रन्यथा बात हीन बनेगो । और वाच्यार्थ के बाधित दोने पर जो अथे प्रकट होता है, वह व्यंजना से बेधित द्वोता है अथवा व्यंग्य होता है, यह कहना उचित नहीं; क्योंकि वह लक्षणा का ही विषय है व्यंजना का नही । जैसे “अटे पूर्ण” सरो यत्र ह्ुठन्तः स्नांति मानवा:---अर्थात् झ्राश्चर्य है कि यह सरोचर पूरा भरा हुआ है, जिसमे मनुष्य लेटते हुए नहा रहे हैं?! इस वाक्य मे नहानेवाले मनुष्यों का विशेषण जो “'लेटते हुए”? है, उससे प्रकट होता है कि “ताल्ाव भरा हुआ नहीं है?! इस अथ को कोई भी व्यंग्य नहीं बदा सकता, यह लक्ष्य ही है। वव सिद्ध हुआ
( रेड )
कि पूर्वोक्त व्यंग्य का एक अंश “उसके पास गई थो””? यह तो, आपके हिसाब से, व्यंग्य है नहीं, लक्ष्य है।
अब यदि आप कहे कि “उसके पास ही गई थी”? इस झअश के लक्ष्य होने पर भी जे! जाने का फल है “रमण”, वह ते व्यंग्य ही रहा; क्योंकि वह ते लक्षणा से ज्ञात हे! नही सकता। से भी नही, क्योंकि आपने ही ““चित्रमीमांसा” मे लिखा है-- /“अधम शब्द का भ्रथ हीन है, और हीन दे प्रकार से हो! सकता है--एक जाति से, दूसरे कर्म से। से उत्तम नायिका भ्रपने नायक को जाति से हीन ते बता नहीं सकती......... हे इत्यादि | तब यह सिद्ध हुआ कि “रमण” भी अर्थापत्ति प्रमाण से स्पष्ट प्रतीत होता है; क्योंकि जे। बात किसी दूसरी रीति से उपस्थित हे। जाय, उसे शब्द का अथे नहीं माना जाता। पर यदि समझ लो कि “अर्थापत्ति?? कोई प्रथक् प्रमाण नहीं है, जैसा कि कई एक दशेनकारों ने माना है, ते! वहों जाने का फल “रमण”? व्यंग्य हो सकता है, पर तथापि जो बात तुम चाहते हो, वह सिद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि ' स्तनों के ऊपरी भाग का चंदन हटना” आदि एवं नायक की ''अ्रधमता”, ये जो वाच्य हैं, वे, तुम्हारे हिसाव से, केवल दूती के संभोग से ही सिद्ध हे सकते हैं, अन्य किसी प्रकार--अर्थान् वावड़ी मे नहाने आदि--से नही; इस कारण यह काव्य गुणीभूत व्यग्य है| जायगा; क्योंकि बेचारे व्यंग्य को ही उन वाच्य अर्थों को सिद्ध करना पड़ेगा, से वह वाच्यों की अ्रपेत्षा गौण हो जायगा।
( ४० )
तब तुमने जे! इसे '“ध्वनि-काव्य?”? माना है से न हे। सकेगा। इस तरह युक्ति के द्वारा भी तुम्हारा सव आड्डंबर व्यथे ही सिद्ध होता है। से अत्यंत चतुर नाणिका के कहे हुए इन विशेषणो का वाच्य अ्रथे (वापीस्नान) और व्यंग्य अथे (संभोग) देनों मे साधारण होना--दोनों मे बराबर क्ृग जाना--हीं उचित है, न कि एक ( संभोग ) ही मे लगना।
तब उनको या लगाना चाहिए----''हे बांधव जन के ( मेरे ) ऊपर आई हुई पीड़ा को न जाननेवाली खाथ मे तत्पर दूती ! तू स्नान का समय न चूक जाय इसलिये, नदी और मेरे प्रिय देनें के पास न जाकर, मेरे पास से स्नान करने के लिये सीधी बावड़ी चली गई, उस, दूसरे की पीड़ा को ( जानते हुए भी ) न जानकर दुःख देनेवाले, अतएव अ्रधम के पास नहीं। यह तेरी दशा से सूचित होता है। देख, बाबडी मे बहुतेरे थुवा ज्ञोग नहाने के लिये भ्राया करते है, उनसे लज्ित होने के कारण, तूने अपने हाथों को कंधे पर धरकर और उनमे आऑटी लगाकर स्तनों को मला है; अतः ऊँचा होने के कारण स्तनों का ऊपरी भाग ही मल्ा जा सका और छाती का चंदन लगा ही रह गया । इसी वरह, जल्दी मे, अ्रच्छो तरह न धोने के कारण ऊपर के होठ का रंग पूरा न उड़ सका, पर नीचे के होठ मे कुछो के जल, दाँत साफ करने की अंगुली आदि की रगड़ अधिक लगती है, इस कारण वह बिल्कुल साफ है गया। नेत्रों मे जल केबल लग ही पाया, अतः ऊपर ऊपर
( ४१ )
से ही काजल हट सका। इसी प्रकार तू दुब॒ली है और ठंड पड़ रही है, से शरीर रोमांचित हो गया है ।?” इस तरह चतुर नायिका की वक्ति के अभिप्राय का छिपा हुआ होना हो उचित है, नही ते! उसकी सब चतुराई मिट्टी में मिल जायगी ।
इस प्रकार जव इन वाक््यों के अथ साधारण होंगे, वे। मुख्य भ्रथे मे कोई वाधा न अवबेगी; अतः यहाँ लक्षणा के छिये स्थान ही न रहेगा। वाच्याथे समझते के अनंतर जब यह सोचेंगे कि यह बात कान किससे कह रहो है, वात नायक फे विषय की है; तब यह प्रतीत होगा--दुःख देने के कारण नायक को “अ्रधम” कहा जा रहा है। और देखिए, वह अधम शब्द वाच्य और व्यंग्य दोनों अथथों मे समान रूप से अन्वित हो जाता है। फिर, “नायक ने, पहले, जे किसी प्रकार की बुराइयाॉँ की थी, उसके हिसाव से, नायिका ने उसे दुःखदायी वताया है?” , वाच्य अथे मे इस प्रकार समझता हुआ अधम शब्द व्यंजना-शक्ति के द्वारा “दूती से संभाग करने के कारण जो उसका दुःखदायित्व हुआ है” उस रूप में परिणत हो जाता है---उस शब्द से यह सिद्ध हो जाता है कि “नायक ने दूती से संभोग किया है|?” यह है अलंकारशास्त्र के ज्ञाताओं के सिद्धांत का सार |
इससे “अधम-शब्द का अथे हीन है, और हीन दे। प्रकार से हो सकता है--एक जाति से, दूसरे कमें से। से उत्तम नायिका अपने नायक को जाति से हीन ते वत। नहीं सकती | अब रही कर्म से हीनता, से। उसे भी, दूती के संभोग आदि,
( ४२ ) जे अपने ( नायिका के ) अपराध बन सकते हैं, ऐसे कर्म के अतिरिक्त अन्य ते बता नहीं सकती । और वैसे कम भी जो दृती के भेजने के पहले हुए थे, वे ते! सब सह ही लिए गए हैं, सो उनका उघाड़ने की आवश्यकता नहीं। तब अंतसे- गला, सब बखेड़े के हटने के बाद, दूती का संभाग ही सिद्ध हवा है।? यह जो आप ( अप्पय दीक्षित ) ने लिखा है, वह भी खंडित हो। जाता है | क्योंकि चतुर और उत्तम नायिका सखियों के सामने, उसी ( दूती ) से संभाग करना जो अपने नायक का अपराध है, उसे स्पष्ट प्रकट करे, यह सर्वेधा अलु- चित है; अतः जिन पुराने अपराधों को धह सह चुकी है, वे बड़े असह्य थे, इस कारण उसे दूती के सामने उन्ही का भ्रति- पादन करना अभीष्ट था । बस, इतने मे सब समझ लीजिए | उत्तम काव्य ह
जिस काढय सें व्यग्य चसत्कार-जनक ते है। पर प्रधान न हो, वह “उत्तम काव्य होता है ।'
जो व्यंग्य वाच्य-अ्थ की अपेक्षा प्रधान हो! भ्ौर दूसरे किसी व्यंग्य की अपेक्षा गौण हो, उस व्यंग्य मे अतिव्याप्ति न हे। जाय, इसके लिये “प्रधान न हो?” लिखा है, और जिन वाच्य-चित्र-काव्यों मे व्यंग्य लीन हो जाता है--उसका कुछ भी चमत्कार नहीं रहता--कितु केवल अर्थालंकारों--उपमा- दिकां--की ही प्रधानता रहती है, उनमे अतिव्याप्ति न हो जाय, इसलिये लिखा है कि ““चमत्कार-जनक हो” ।
( ४३ ) यहाँ एक विचार श्रार है। काव्यप्रकाश के टीकाकारों ने “अतादइशि गुणीभूतव्य॑ग्य॑ व्यंग्ये तु सध्यमम?” इस गुणी- भूत व्यंग्य के लक्षण की व्याख्या करते हुए लिखा है कि “'गुणी- भूत च्यंग्य उसी का नाम है, जो “चित्र ( अलंकारप्रधान ) काव्य”? न हे। पर यह उनका कथन ठोक नहीं; क्योंकि पर्यायोक्ति, समासाक्ति आदि अलंकार जिनमे प्रधान हों, उन काव्यों मे अव्याप्ति हे जायगी--अर्थात् उनका यह लक्षण न हो सकेगा । और होना चाहिए अवश्य, क्योंकि सभी अल्लंकार- शास्त्र के ज्ञाताओं ने उनको गुणीभूत व्यंग्य और चित्र दोनों माना है। प्तः जो चित्र-काव्य हो, वह गुणीभूत व्यंग्य न हो सके यह कोई बात नहीं। अच्छा, अब उत्तम काव्य का उदाहरण लीजिए-- राघवविरहज्वालासंतापितसह्यशैलशिखरेषु | शिक्षिरे सुख शयाना। कपयः कुप्यंति पदनतनयाय ॥ ध्ड कै कक छ रघुवर-विरद्दानल तपे सहा-शेल के श्रत । सुख सों साए, शिशिर से कपि कलोपे हनुम॑त ॥ भगवान् रामचंद्र के विरहानल की ज्वालाओं से संतप्त सद्याचल के शिखरों पर, ठंड के दिनों मे, सुख से साए हुए बंदर हनुमान पर क्रोध कर रहे हैं । इस श्लोक का व्यंग्य भ्रथे यह है कि “जानकीजी की कुशलता सुनाकर हलुमान् ने रामचंद्र को शीतल कर दिया,
( ४४ ) उनका विरह-ताप शांत हो गया” और वाच्य-अथे है 'हनु- मान् पर बंदरों का अकस्मात् उत्पन्न होनेवाला क्रोध” | से यह वाच्य-अथे व्यंग्य के द्वारा ही सिद्ध होता है, क्योंकि पहले जब व्यंग्य के द्वारा यह समझ ज्लेते हैं--रामचंद्र का विरह शांत होने से सल्याचल के शिखर ठंडे हो गए, तब यह सिद्ध होता है कि--इसी कारण, ठंड के मारे, बंदरों ने हनुमान पर क्रोध किया ! अतः यह व्यग्य गौण हो गया, प्रधान नहीं रहा; क्योंकि वाच्य-अथे को सिद्ध करनेवाला व्यंग्य गौण हो। जाता है, यह नियम है। पर इस दशा मे भी, जिस तरह दुर्भाग्य के कारण कोई राजांगना किसी की दासी बनकर रहे, तथापि उसका अलुपम सौंदय मल्तकता ही है, ठीक उसी प्रकार इस व्यंग्य मे भी अनिरवेचनीय सुंदरता दृष्टिगोचर हो रही है।
यहाँ एक शंका होती है--इसी तरह “तत्पगता($पि च सुतनुः... .. !? इस पूर्वोक्त ध्वनि-काव्य के उदाहरण से “हाथ का धोरे घीरे हटाना” भी नह दुलहिन के खभाव के विरुद्ध है; क्योंकि नवोढा के खभाव के अलुसार ते उसे कट हटा लेना चाहिए था; इस कारण वह वाच्य भी व्यंग्य ( प्रेम ) से ही सिद्ध किया जा सकता है--अर्धाव धीरे धीरे उठाना तभो सिद्ध है सकता है, जब हम यह समझ ले कि उसे पति से प्रेम होने लगा है, सो उसे उत्तमोत्तम काव्य कहना ठीक
०.
नहीं। इसका उत्तर यह है--प्रतिदिन के सखियों के
( ४५ ) उपदेश आदि, जे कि विशेष चमत्कारी नहीं हैं, उनसे भी “धीरे घीरे उठाना?” सिद्ध हा सकता है, अतः उसके सिद्ध करने के लिये प्रेम ही की विशेष आवश्यकता हो, सो वात नही है। पर सहृदयों के हृदय मे जे पहले ही से यह वात उठ खड़ी होती है कि “यह वियाग के समय का प्रेम है”? उसे ध्वनित किए विना “धीरे धीरे उठाना??, खतंत्रता से, परम आनंद के आस्वाद का विषय बनने का सामथ्य॑ नही रखता | इसी तरह '“निःशेषच्युतचंदनम्. . .... .. ” आदि पद्चों मे भी “अधमता?? आदि वाच्य, व्यंग्य ( दूती-संभाग आदि ) के अतिरिक्त अर्थ के द्वारा तैयार किए गए है, और व्यंग्य अधथ को खय॑ प्रकट करते हैं, से वहाँ भी व्यंग्य के गाण होने की शंका न करनी चाहिए । उत्तमोत्तम और उत्तम सेदें मे कया अत्तर है ९
यद्यपि इन दोनों ( उत्तमोत्तम और उत्तम ) भेदों मे व्य॑ग्य का चमत्कार प्रकट ही रहता है, छिपा हुआ नहीं, तथापि एक मे व्यंग्य की प्रधानता रहती है और दूसरे मे अग्रधानता, इस कारण इनमे एक दूसरे की अपेक्षा विशेषता है, जिसे सह- दय पुरुष समझ सकते हैं ।
चित्र-मी्मांसा के उदाहरण का खंडन
अच्छा, अब एक ““चित्रमीमांसा?? के उदाहरण का खंडन भी सुन लीजिए; क्योंकि इसके विना पंडितराज को कल्न नहीं. पड़ती । वह उदाहरण यह है--
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प्रहरविरतोा मध्ये बाहहृस्ततेडपि परेण था
किम्रुत सकले याते वाउह्नि प्रिय त्वमिहेष्यसि ! इति दिनशतमप्राप्यं देश प्रियस्थ यियासते
हरति गमन॑ वालाउंलापै! सवाष्पगलज्जले) ॥
“प्यारे | क्या आप एक पहर के बाद लौट आावेगे, या भध्याह् मे, अथवा उसके भो बाद ९ किंवा पूरा दिन बीत जाने पर ही लौटेगे ??, अश्रुधारा सहित, इस तरह की बातों से चालिका ( नवोढा ), जहाँ सैकड़ों दिनों मे पहुँचनेवाले हैं, उस देश मे जाना चाहते हुए प्रेमी के जाने का निपेध कर रही है-..उसे जाने से रोक रही है ।
इस पद्य मे “सारा दिन पूरी अ्रवधि है, उसके बाद मैं न जी सकूंगी” यह व्यंग्य है, और वाच्य है “प्यारे के जाने का निवारण” । अ्रव सोचिए कि “प्यारे का न जाना?” तभी हे! सकता है, जब कि वह यह समझ ले कि “यह एक दिन के वाद न जी सकेगी”; से। यह वाच्य-अशे पूर्वोक्त व्यंग्य से सिद्ध होता है, इस कारण यह काव्य “गुणीभूत व्यंग्य! ( मध्यम ) है। यह है चित्रमीमांसाकार का कथन |
अब पंडितराज के विचार सुनिए। वे कहते हैं--गुणी- भूत व्यंग्य का यह उदाहरण ठीक नही ; क्योंकि अश्रुधारा सहित “क्या आप एक पहर के वाद लौट आवेगे ??” इत्यादि कथन ही से “प्यारे का न जाना” रूपी वाच्य सिद्ध हो जाता है,
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इस कारण ,व्य॑ग्य के गौण होकर उसे सिद्ध करने की कोई झाव- श्यकता नहीं । “बातो से. .,जाने का निवारण कर रही है”? इस कथन मे “बातों से?? यह ठतीया करय-अ्रथे मे है; अतः स्पष्ट है कि वे ( बाते' ) जाने के निवारण की साधक हैं। पर यदि आप कहें कि--व्यंग्य भी तो वाच्य को सिद्ध कर सकता है, इस कारण हमने उसे गुणीभूत लिखा है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि यदि ऐसा करोगे तो ““निःशेषच्युतचंदनमू.,.”? आदिकों में भी दृती-संभाग?” आदि व्यंग्य भी नायक की अ्रधमता को सिद्ध करते हैं, इस कारण थे भी गुणीभूत हो जायेंगे। हाँ, यदि आप कहें कि “अश्रुधारा सहित ..बातो”” की तो “जाने के बाद बहुत समय तक न ठहरना”” यह सिद्ध कर देने से भी चरिता्थता हो सकती है; अतः व्य॑ग्य-सह्दित होने पर दही उनसे “जाने का निवारण” सिद्ध है सकता है; तो पंडितराज कहते हँ--अच्छा, “उसके बाद न जी सकूं गी”? इस व्यंग्य को वाच्यसिद्धि का अंग मानकर गौश समझ लीजिए; पर नायक-आदि विभाव, अश्रु-आदि अनुभाव एवं चित्त के आवेग भ्रादि संचारी भावों के संयोग से ध्वनित होनेवाले विप्र- लंभ-( गार के कारण इस काव्य को थध्विनि-काव्य” कहा जाय दो कौन मना कर सकता है# ।
«- इस बहस में पंडितराज भ्रप्पय दीक्षित को परास्त न कर सके; क्योंकि मध्य में प्रतीत होनेवाल्ले व्यंग्य के द्वारा भी ध्वनि एवं गुणीभूत व्यंग्य का व्यवहार होना काव्यप्रकाशकारादि साहिल के प्राचीन
( ४८ ) मध्यम काव्य , जिस काव्य सें वाच्य-सथ का चमत्कार व्य ग्य अथ के चमत्कार के साथ न रहता हे।--उससे उत्कृष्ट हे।, अर्थात् व्यग्य का चमत्कार स्पष्ठ न है। आर वाच्य का चमत्कार स्पष्ट श्रतौद्ठ होता हे। वह मध्यम काव्य हाता है। जेसे यमुना के वर्णन मे लिखा है कि--- तनयमैनाकगवेषणलर्म्च,कतजलघिजटरप्रविष्ट हिमगि रिशुजायमानाथा भागीरथ्या। सखी... .. । ( यह यमुना ) उस भागीरथी की सखी है, जे, माना, अपने पुत्र मैनाक को हूंढ़ने के लिये लंबी की हुई एवं समुद्र के उदर में घुसी हुई हिमालय पव॑त की भुजा है । यहाँ संस्क्ृत से 'क्यडः ? प्रत्यय से और हिदी मे मानो? शब्द से वाच्य उत्प्रे्ञा ही चमत्कार का कारण है। यद्यपि यहाँ पर, गंगाजी में हिमालय परत की भुजा की उत््रेज्ञा की गई है, इस कारण “श्वेतता?” और “पुत्र मैनाक को हूं ढ़ने के लिये. . ,समुद्र के उद्र मे घुसी हुई!” इस कथन से “पाताज्ञ की तह तक पहुँचना?! व्यंग्य है, और उनका किसी अंश मे चमत्कार आधचार्यों को सम्मत है, अतः अत में विप्ररुृंभ-शगार के ध्वनित होने से इस काव्य को गुणीमूत व्य'ग्य न मानना कुछ भी अमभिग्राय नही रखता,
अन्यथा काव्यप्रकाशकारादि के दिए हुए “आ्रामतरुण तरुण्या ” थ्रादि उदाहरण भी श्रसंगत हो जारूंगे, क्योकि थ्ेततोगत्वा विप्रद्॑ंभ
की ध्वनि तो वे भी है ही ।
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भी है ही; तथापि वह चमत्कार उत्प्रेत्ञा के चमत्कार के अंदर घुसा हुआ सा प्रतीत होता है, जैसे किसी ग्रामीण नायिका का गोरापन केसर-रस के ल्ेप के अंदर छिपा हुआ दिखाई देता हो। हॉ, इस बात मे कोई संदेह नही कि कोई भी वाच्य-अ्रथे ऐसा नही है, जो व्यंग्य अथे से थोड़ा वहुत संबंध रखे विना खत: रमणीयता उत्पन्न कर सके--अ्र्थांव् वाच्य-अथे मे रम- णीयता उत्पन्न करने के लिये व्यंग्य का संवंध आवश्यक है !
वाच्य चित्रों को किस भेद मे समझना चाहिए ९
इन्हीं दूसरे और तीसरे ( उत्तम और मध्यम )भेदो मे, जिनमे से एक मे व्यंग्य जगमगाता हुआ होता है और दूसरे मे टिमटिमाता, सव अलंकारप्रधान काव्य भ्रविष्ट हो जाते हैं अर्थात् वाच्यचित्र” काव्यों का इन्हीं दोनों भेदों में समाबेश है।
अधम काव्य
जिस काव्य में शब्द का चमत्कार प्रधान है। और झय्य का चमत्कार शब्द के चमत्कार के शोमित करने के लिये हा, वह “अधम काव्य?” कहलाता है;
मित्रातिपुत्रनेत्राय त्रयीशात्रवशत्रवे । गोत्रारिगोत्रजत्राय गात्रात्रे ते नमो नमः |
भक्त कहता है--सूये और चंद्र जिनके नेत्र हैं, जो बेदो के शत्रुओं ( असुरों ) के शत्रु हैं और इंद्र के वंशजो ( देव-
२०-०४
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ताओं ) के रक्षक हैं, उन---गोपाल् अथवा बृषभवाहन ( शिव )-- आपको बार-बार नमस्कार है।
इसमे स्पष्ट दिखाई देता है कि अथे का चमत्कार शब्द मे लीन हे! गया है--हछोक सुनने से शब्द के चमत्कार की ही प्रधानता प्रतीत होती है, अथे का चमत्कार कोई वस्तु नहीं।
अधमाधम भेद क्यों नहीं माना जाता ।
यद्यपि जिसमे अथे के चमत्कार से सवेधा रहित शब्द का चमत्कार हो, वह काव्य का पॉचवॉ भेद “अधसाधम?? भी इस गणना में आना चाहिए; जैसे--एकाक्षर पद्य, अर्धाइत्ति यमक और पद्मबंध प्रश्नति। परंतु आनंदजनक अथे के प्रतिपादन करनेवाले शब्द का नाम ही काव्य है, और उनमे आनंद- जनक अथे होता नहीं, इस कारण “काव्यलक्षण”? के हिसाब से वे वास्तव मे काव्य ही नही हैं। यत्ञपि महाकवियों ने पुरानी परंपरा के अनुरोध से, स्थान स्थान पर, उन्हे लिख डाला है, तधापि हमने उस भेद को काव्यों मे इसलिये नहीं गिना कि वास्तव मे जो बाव हो उसी का अलुरोध होना उचित है, आँखें मींचकर प्राचीनों के पीछे चलना ठीक नहीं ।
प्राचीनों के मत का खंडन
कुछ लोग काव्यों के ये चार भेद भी नहीं मानते; वे-- उत्तम, मध्यम एवं अधम--तीन “प्रकार के ही काव्य मानते हैं। उनके विषय मे हमे यह कहना है कि अथथे-चित्र और शब्द-चित्र दोनों को एक सा--अधम--ही बताना उचित नहीं
( ५१ ) क्योंकि उनका तारतम्य स्पष्ट दिखाई देता है। कान ऐसा सहृदय पुरुष होगा कि जे-- बविनिगेत॑ मानदमात्ममन्दिरा- द्रवत्युपश्रुत्य यदच्छया5पि यम । ससंभ्रमेन्द्रहुतपातितार्ग छा निरमीलिताक्षीव भिया5्परावती ||# एवस्
सच्छिन्नमूलः प़तजेन रेगु- स्वस्पे।परिष्टात्पवनावधूत; । अड्डारशेषस्य हुताशनस्य पूर्वोत्यितों धूम इवाउप्यभासे ॥
“- यह हथग्रीव राक्स का वर्णन है। इसका श्र्थ यों है--मित्रो के सम्मानदाता अथवा शत्रुओं के दपेनाशक जिस हयग्रीव का, स्वेच्छा- पूथेंक भी ( न कि किसी चढ़ाई आदि के लिये ), घर से निकछ॒ना सुन- कर, धबड़ाए हुए इंद्र के द्वारा शीघ्रता से डलछ॒वाई गई हैं अगले जिसमे ऐसी अ्रमरावती ( देवताओं की पुरी ), माना, दर के मारे आँखे भीच लेती है।
यह रण-वर्णन है | इसका अधे यो है--वैड़ों की ठापों आदि से जो रज उडी थी, उसकी जड़ ( पृथ्वी से सदा हुआ भाग ) रुघिर ने काट दी, भार वह उस रुघिर के ऊपर डी ऊपर उड़ने छगी । वह ( रज ) ऐसे शोभित होती थी, माने।, आग के केवल शैँगारे शेष रह गए हैं और उससे जो पहले निकल चुका था, वह छुर्म्रा ( ऊपर उड़ रहा ) है ।
( भर ) इत्यादि काव्यों के साथ
खच्छन्दोच्छलद॒च्छकच्छकुदर च्छातेतरा म्बुच्छटा-
मूच्छेन्मोहमहपिं हषेविहितस्नानाहिकाज्हाय व! ।
भिन््यादुच्य दुदारददुरदरी दीघांदरिद्रहुम-
द्रोहों कमहेर्मिमेदुरमदा मंदाकिनी मंद्तास् ॥# इत्यादि काव्यों की, जिनका केवल साधारण श्रेणी के मनुष्य सराहा करते हैं, समानता बता सकता है। और यदि तारतम्य के रहते हुए भी दोनो को एक भेद बताया जाता है, ते! जिनमे बहुत ही कम (व्यंग्य की प्रधानवा और अप्रधानता का ही ) अंतर है, उन “ध्वनि” और “गुणीभूतव्यंग्य”ः को प्रथक् प्रथक भेद मानने के लिये क्यों दुराप्रह है ? अतः काव्य के चार भेद मानना ही युक्तियुक्त है।
शब्द-अर्थ दोनों चमत्कारी हों, तो किस भेद मे समावेश करना चाहिए ?
* बह गन्जा आपके अज्ञान को शीघ्र नष्ट करे, जिसके स्वतंत्र उछ- छते हुए और स्वच्छ जलम्राय प्रदेश के खट्डों के प्रबल जक की परंपरा महपियों के अ्रश्ञान का नाश करनेवाली है और जिस जलूपरम्परा मे थे छोग स्नान एवं नित्यनियम किया करते हैं, जिघ्तकी कंदराओं में, तरंगो की चोट से ऊपर का भाग गिर जाने के कारण, बडे बढ़े मेढठक दिखाई देते है और विस्तृत एव' सघन बृक्षो के गिराने के कारण अधिकता से युक्त लहरे ही जिसका गहरा मद है ।
( ४३ )
जिस काव्य में शब्द और अथे दोनों का चमत्कार एक ही साथ हो, वहाँ यदि शब्द-चमत्कार की प्रधानता हो, ते अधम और अ्रधे-चमत्कार की प्रधानतां हो, ते मध्यम कहना चाहिए। पर यदि शब्द-चमत्कार और अधे-चम- त्कार दोनों समान हों, ते! उस काव्य को मध्यम ही कहना
चाहिए। जेसे--
उल्लास; फुल्पड्न रुहपटलपतन्मत्तपुष्पन्धयानां
निस््तारः शेकदाबानलबिकलहदां केकसीमन्तिनीनाम् ।
उत्पातस्तामसानामुपहतमहसां चश्षुषां पष्पातः
संपातः काउपि धाम्नामयमुद्यगिरिप्रांततः प्रादुरासीत् ॥
खिले हुए कमलो के मध्य से निकलते हुए (राव भर मधघु-
पान करके ).मत्त श्रमरों का उल्लास ( आनंददाता ), शोकरूपी दावानल से जिनका हृदय विकल हो रहा था, उन चक्रवाकियों का निस्तार ( दुःख मिटानेवाला ), जिन्होने तेज को नष्ट कर दिया था, उन अंधकार के समूहों का उत्पात (नष्ट करनेवाल्ञा) आर नेत्रो का पक्षपात (सहायक) एक तेज का पुज उदयाचल के प्रांत से प्रकट हुआ |
इस छछ्ोक में शब्दों से वृत्त्यनुप्रास की अधिकता और झ्रेजगुण के प्रकाशित होने के कारण शब्द का चमत्कार है, और प्रसाद-गुण-युक्त होने के कारण शब्द सुनते दी ज्ञात हुए “हूपक?? अथवा “हेतु”? अल्टार रूपी अर्थ का चमत्कार है।
( २४ ) से क्ोक मे देनों--शब्द और अथे के चमत्कारों--के समान होने के कारण दोनों की प्रधानता समान ही है; इस कारण इसे मध्यम काव्य कहना ही उचित है। हिंदी मे,«इस श्रेणी मे, पद्माकर के कितने ही पच्च आ सकते हैं ।
धवनि-काव्य के भेद
काव्य का उत्तमोत्तम भेद जे। “ध्वनि” है, उसके ययपि असंख्य भेद हैं, तथापि साधारणतया झुछ भेद यहाँ लिखे जाते हैं। ध्यनि-काज्य दे प्रकार का होता है---एक अमिघधामूलक और दूसरा लक्षणामूलक । उनसे से पहला भर्थात् अमिधा- मूलक ध्वनि-काव्य तीन प्रकार का है--रसध्वनि, वस्तुप्वनि और अलट्टारध्वनि । “रसध्वनि?? यह शब्द यहाँ असंलक्ष्य- क्रम-ध्वनि ( जिसमे ध्वनित करनेवाले और ध्वनित होने के मध्य का क्रम प्रतीत नहीं होता ) के लिये लाया गया है, अतः “/रस-ध्वनि?? शब्द से रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशांति, भाषोदय, भावसंधि और भावशबल्॒ता सबका प्रहण समझना चाहिए। दूसरा ( लक्षणामूलक ध्वनि-काव्य ) दे! प्रकार का है--अ्थोतरसंक्रमित वाच्य और अत्यंत- तिरस्कृत वाच्य। इस तरह ध्वनिकाव्य के पाँच भेद हैं। उनमे से “रस-ध्वनिःः सबसे अधिक रमणीय है, इस कारण पहले रस-ध्वनि का आत्मा जे “रस” है, उसका वर्णन किया जाता है!
रस का स्वरूप और उसके विषय में ग्यारह मत
प्रधान चत्तषण
(१) अमिनवशुप्ताचाये और मम्मट भट्ट का सत (क) - सहृदय पुरुष, संसार मे, जिन रति-शोक आदि भावों का अनुभव करता है, वह कभी किसी से प्रेम करता है और कभी किसी का साच इत्यादि, उनका उसके हृदय पर संस्कार जम जावा है--वे भाव वासनारूप से उसके हृदय में रहने लगते है। वे ही वासनारूप रति आदि स्थायी भाव, जो एक प्रकार की चित्तवृत्तियोँ हैं और जिनका वर्णन आगे स्पष्ट रूप से किया जायगा, जब खत: प्रकाशमान और वास्तव में विधमान आत्मानंद के साथ अनुभव किए जाते हैं, ते। “रस” कहलाने लगते हैं| पर उस आलनंदरूप आत्मा के ऊपर अज्ञान का आव- रुण आया हुआ है--वह अज्ञान से ढेंक रहा है; और जब तक उस आत्मालंद का साथ न हो, वब तक वासनारूप रतति आदि का अनुभव किया नहीं जा सकता। अ्रतः उसके उस आवरण को दूर करने के लिये एक अलौकिक क्रिया उत्पन्न की जाती है। जब उस क्रिया के द्वारा अज्ञान, जे उस आनंद का आच्छादक है, दूर हे! जावा है, ते! भ्रतुभवकर्ता मे जो अर्पज्ञता रहती है,